धीरे-धीरे
अपनी ही उपस्थिति से भरता कमरा
मुझे देखता है
जैसे मैं कोई वस्तु नहीं,
एक अधूरा उच्चारण हूँ।
दोपहर
काँच की सतह पर टिककर
बहुत देर तक
अपनी ही चमक सुनती रहती है।
बाहर
पेड़ों की परछाइयाँ
धरती पर नहीं गिरतीं अब —
वे हवा में ठहरी रहती हैं
किसी अनकहे निर्णय की तरह।
मैं मेज़ पर रखी
खुली हुई पुस्तक के पास बैठा हूँ
जहाँ शब्द
अपना अर्थ छोड़ चुके हैं
और केवल आकृतियाँ रह गए हैं।
घड़ी की सुइयाँ
समय नहीं बतातीं,
वे सिर्फ़
एक ही वृत्त को
बार-बार पूरा करती हैं।
मेरे भीतर
कोई बहुत पुरानी आवाज़
धीमे स्वर में
मेरा नाम दोहराती है,
मानो स्मृति भी
अब विश्वास के बिना बोलती हो।
रोशनी
दीवार पर एक सफ़ेद दरार खोलती है
और मैं अचानक
अपने ही चेहरे के भीतर
एक और चेहरा देख लेता हूँ —
न शांत,
न व्याकुल,
बस उपस्थित।
फिर सब कुछ
वैसा ही रह जाता है।
केवल मैं
थोड़ा कम वास्तविक होकर
कुर्सी पर बैठा रहता हूँ,
जैसे किसी विचार ने
क्षण भर के लिए
मनुष्य का आकार ले लिया हो।
मुकेश ,,,,,,,
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