आँख खुली तो
देखा
न कुआँ था,
न उसकी जगत,
न गहराई का कोई अँधेरा।
न चाँद पानी में टूटा हुआ,
न दीवारों में साँप की धीमी सरकन,
न जंग लगी बाल्टी,
न रस्सी की कोई उम्मीद।
बस एक कमरा था —
सीधा, साधारण,
जहाँ हवा
अपनी जगह पर खड़ी थी।
और मैं
अपनी ही शांति के सामने
कुछ देर तक
पहचान नहीं पाया खुद को।
फिर धीरे-धीरे समझ आया
जो डूबना था
वह कहीं बाहर नहीं था।
वह तो
नींद और जागरण के बीच
बहुत चुपचाप
बनता और मिटता रहा था।
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