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Wednesday, 20 May 2026

आँख खुली तो देखा

 आँख खुली तो

देखा 

न कुआँ था,
न उसकी जगत,
न गहराई का कोई अँधेरा।

न चाँद पानी में टूटा हुआ,
न दीवारों में साँप की धीमी सरकन,
न जंग लगी बाल्टी,
न रस्सी की कोई उम्मीद।

बस एक कमरा था —
सीधा, साधारण,
जहाँ हवा
अपनी जगह पर खड़ी थी।

और मैं
अपनी ही शांति के सामने
कुछ देर तक
पहचान नहीं पाया खुद को।

फिर धीरे-धीरे समझ आया 
जो डूबना था
वह कहीं बाहर नहीं था।

वह तो
नींद और जागरण के बीच
बहुत चुपचाप
बनता और मिटता रहा था।

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