“कुछ दर्द उम्र भर आवाज़ नहीं करते…”
कुछ दर्द
उम्र भर आवाज़ नहीं करते।
वे बस
अंदर कहीं बैठे रहते हैं
बहुत ख़ामोश,
बहुत गहरे…
जैसे किसी पुराने मकान में
बरसों से बंद पड़ा एक कमरा।
मैंने भी
अपने भीतर
ऐसे कई कमरे बना रखे हैं।
एक कमरे में
तुम्हारी हँसी रखी है,
दूसरे में
तुम्हारी आख़िरी ख़ामोशी।
एक कमरे में
वो ख़त हैं
जो कभी भेजे नहीं गए,
और एक में
वो आँसू
जो किसी ने देखे नहीं।
लोग कहते हैं
“तुम अब पहले से ज़्यादा समझदार हो गए हो।”
उन्हें क्या मालूम,
कुछ चीज़ें
समझदार नहीं बनातीं,
बस इंसान को
थका देती हैं।
अब मैं
बहुत कम बोलता हूँ।
क्योंकि मैंने देख लिया है
हर बात को
शब्द नहीं चाहिए होते।
कुछ तकलीफ़ें
सिर्फ़ महसूस की जाती हैं,
जैसे
रात के आख़िरी पहर में
अचानक आँख खुल जाना
और बिना वजह
दिल का भारी हो जाना।
तुम्हारे बाद
मैंने लोगों से मिलना तो जारी रखा,
मगर
किसी के पास बैठकर भी
अंदर से अकेला रहा।
अजीब हुनर है ना
मुस्कुराते हुए टूटते रहना।
अब कभी-कभी
आईने के सामने खड़ा होकर
मैं ख़ुद से पूछता हूँ
“क्या सचमुच
तुम वही आदमी हो
जो कभी छोटी-सी बात पर
पूरा आसमान महसूस कर लेता था?”
आईना
कुछ नहीं कहता।
बस मेरी आँखों में
थोड़ी और थकान रख देता है।
और मैं समझ जाता हूँ
कुछ दर्द
उम्र भर आवाज़ नहीं करते,
वे सिर्फ़
इंसान को धीरे-धीरे
बदलते रहते हैं।
मुकेश ,,,,,,
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