अब कुछ भी वैसा नहीं लगता…”
अब कुछ भी
वैसा नहीं लगता।
सुबहें आती हैं—
मगर उनके हाथों में
पहले जैसी रोशनी नहीं होती।
खिड़की पर रखी धूप
अब कमरे को नहीं,
बस दीवारों को छूकर लौट जाती है।
और मैं…
मैं भी शायद
दीवार ही होता जा रहा हूँ।
मिरे अंदर कई एहसास पत्थर हो रहे हैं…
पहले
मैं लोगों की आँखों में छुपे हुए डर पढ़ लेता था,
किसी की हँसी में छुपा अकेलापन
मुझे बेचैन कर देता था।
अब कोई रोता भी है
तो मैं चुप रहता हूँ
जैसे भीतर का समंदर
बहुत पहले मर चुका हो।
अजीब है ना?
इंसान जब बहुत ज़्यादा टूटता है,
तो आवाज़ नहीं करता—
बस धीरे-धीरे
महसूस करना छोड़ देता है।
तेरी याद अब भी आती है,
मगर पहले जैसी नहीं।
अब वो
दिल पर दस्तक नहीं देती,
बस किसी पुराने कमरे की तरह
अंदर खुलती है…
जहाँ धूल बहुत है,
और रौशनी बहुत कम।
तेरी ख़ामोशियों के वार ख़ंजर हो रहे हैं…
मैंने कई रातें
अपने ही सीने पर सिर रखकर काटी हैं,
जैसे कोई पिता
अपने घायल बच्चे को चुप कराता है।
मगर दर्द…
दर्द कभी नहीं सोया।
वो हर रात
मेरे अंदर उठकर बैठ जाता है,
और पूछता है
“क्या सचमुच
तुम अब भी उसी आदमी के भीतर रहते हो?”
मैं जवाब नहीं देता।
क्योंकि सच ये है
जिस आदमी को तुम जानते थे,
वो शायद अब यहाँ नहीं है।
उसकी जगह
एक थका हुआ चेहरा है,
कुछ बुझी हुई आँखें,
और एक लंबी चुप्पी…
जो हर दिन
थोड़ी और गहरी हो रही है।
मुकेश ,,,,,,
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