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Sunday, 10 May 2026

ऐतरेय उपनिषद - प्रथम अध्याय - प्रथम खंड - दूसरा मंत्र लोक-सृष्टि और चेतना की ब्रह्माण्डीय संरचना

 लोक-सृष्टि और चेतना की ब्रह्माण्डीय संरचना

२. मन्त्र (संस्कृत मूलपाठ)

स इमाँल्लोकानसृजत। अम्भो मरीचीर्मरमापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठा। अन्तरिक्षं मरीचयः। पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः॥२॥

पाठभेद

कुछ पाठों में “मरम्” के स्थान पर “मरः” तथा “आपः” के पूर्व “ता” अथवा “अधस्तात्ता” का पाठ मिलता है। शांकरभाष्य में “पृथिवी मरः” रूप प्रमुख है।

३. पदच्छेद / संधि-विच्छेद

सः = वह (परमात्मा)

इमान् = इन

लोकान् = लोकों को

असृजत = रचा, उत्पन्न किया

अम्भः = ऊर्ध्वस्थ जलमय लोक

मरीचीः = किरणरूप/अन्तरिक्षगत लोक

मरम् (मरः) = मर्त्यलोक अर्थात् पृथ्वी

आपः = अधोलोकस्थित जल

अदः अम्भः = वह अम्भः

परेण दिवम् = द्युलोक के ऊपर

द्यौः प्रतिष्ठा = स्वर्ग उसकी प्रतिष्ठा/आश्रय है

अन्तरिक्षम् = मध्य आकाश

मरीचयः = किरणें, प्रकाश-पुंज

या अधस्तात् = जो नीचे स्थित हैं

ताः आपः = वे जल हैं

व्याकरणिक विश्लेषण

असृजत — √सृज् (सृष्टौ) धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।

लोकान् — “लोक” शब्द का द्वितीया बहुवचन।

मरीचयः — “मरीचि” (किरण) शब्द का बहुवचन।

मरः — “मर्त्य” से सम्बद्ध; जहाँ मृत्यु है।

४. अन्वय (गद्यक्रम)

सः आत्मा इमान् लोकान् असृजत। अदः अम्भः परेण दिवम्। द्यौः तस्य प्रतिष्ठा। अन्तरिक्षं मरीचयः। पृथिवी मरः। या पृथिव्याः अधस्तात् ताः आपः।

५. शब्दार्थ एवं हिंदी अर्थ

प्रमुख शब्दार्थ

शब्द अर्थ

अम्भः ऊर्ध्वलोकस्थ जलमय सत्ता

मरीचयः प्रकाश-किरणमय अन्तरिक्ष

मरः मर्त्यलोक, पृथ्वी

आपः अधोलोकस्थित जल

लोक अनुभव-क्षेत्र, अस्तित्व-स्तर

असृजत उत्पन्न किया

भावपूर्ण हिंदी अर्थ

उस परमात्मा ने इन लोकों की सृष्टि की। द्युलोक के ऊपर स्थित जलमय क्षेत्र “अम्भः” है। मध्य का प्रकाशमय अन्तरिक्ष “मरीचि” कहलाता है। पृथ्वी “मर” अर्थात् मृत्युशील लोक है। और पृथ्वी के नीचे स्थित जलमय अधोलोक “आपः” है।

यह मन्त्र केवल भौतिक ब्रह्माण्ड की रचना नहीं बताता, बल्कि चेतना के विभिन्न स्तरों और अनुभव-क्षेत्रों की भी ओर संकेत करता है।

६. आदि शंकराचार्य का भाष्य (मूल संस्कृत)

एवमीक्षित्वालोच्य स आत्मा इमान् लोकान् असृजत सृष्टवान्। यथेह बुद्धिमान् तक्षादिरेवंप्रकारान् प्रासादादीन् सृजतीक्षित्वानन्तरं तथा।

ननु सोपादानस्तक्षादिः प्रासादादीन् सृजति, निरुपादानस्त्वात्मा कथं लोकान् सृजति? नैष दोषः। सलिलफेनस्थानीय आत्मभूते अव्याकृते नामरूपोपादाने स्थित्वा सर्वज्ञः आत्मा जगन्निर्मिमीते।

अथवा यथा विज्ञानवान् मायावी आत्मानमेव अन्यत्वेन प्रकाशयति तथा सर्वज्ञः देवः आत्मानमेव जगद्रूपेण निर्मिमीते।

अम्भो मरीचीर्मरमाप इति। अम्भः परेण दिवम्। द्युलोकस्योपरिष्टादुदकात्मकः लोकविशेषः। अन्तरिक्षं मरीचयः। मरीचिभिर्वा रश्मिभिः सम्बन्धात्। पृथिवी मरः। म्रियन्ते अस्मिन् भूतानि इति मरः। या अधस्तात् ताः आपः।

७. शंकरभाष्य का हिंदी अनुवाद

शंकराचार्य कहते हैं कि आत्मा ने विचार करके इन लोकों की रचना की। जैसे कोई बुद्धिमान शिल्पी पहले योजना बनाता है और फिर भवन का निर्माण करता है, वैसे ही परमात्मा ने जगत् की रचना की।

यदि प्रश्न उठे कि शिल्पी तो बाह्य पदार्थों से निर्माण करता है, पर आत्मा बिना किसी बाहरी सामग्री के जगत् कैसे रच सकती है—तो शंकराचार्य उत्तर देते हैं कि समस्त नाम-रूप अव्यक्त रूप में आत्मा में ही स्थित हैं। उसी आत्मस्वरूप से जगत् प्रकट होता है।

वे एक और उदाहरण देते हैं—जैसे मायावी अपने ही भीतर से अनेक रूप प्रकट करता है, वैसे ही परमात्मा स्वयं को जगद्रूप में व्यक्त करता है।

“अम्भः” का अर्थ

द्युलोक के ऊपर स्थित जलमय, सूक्ष्म, ऊर्ध्व क्षेत्र।

“मरीचयः” अन्तरिक्ष क्यों?

क्योंकि अन्तरिक्ष प्रकाश-किरणों और ऊर्जा-प्रवाह का क्षेत्र है।

“मर” पृथ्वी क्यों?

क्योंकि यहाँ प्राणी मृत्यु को प्राप्त होते हैं—यह परिवर्तनशीलता और नश्वरता का लोक है।

अधोलोकस्थ “आपः”

भौतिक आधार, आद्य द्रव्य या अवचेतन गहराई का प्रतीक।

८. दार्शनिक विश्लेषण

(क) लोक-सृष्टि का तात्त्विक अर्थ

यह केवल खगोलीय भूगोल नहीं है। उपनिषद् यहाँ अस्तित्व के स्तरों (planes of being) का निरूपण कर रहा है। “लोक” चेतना के विभिन्न आयाम हैं।

(ख) “लोक” की उपनिषदिक अवधारणा

“लोक” का मूल अर्थ है — “अनुभव का क्षेत्र”।

अतः लोक केवल स्थान नहीं, बल्कि अनुभूति की अवस्थाएँ हैं।

जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय — ये भी चेतना के “लोक” हैं।

(ग) चेतना और ब्रह्माण्डीय संरचना

यह मन्त्र ब्रह्माण्ड को “consciousness-structured cosmos” के रूप में प्रस्तुत करता है।

अर्थात्—

पहले चेतना,

फिर अनुभव,

फिर जगत्।

आधुनिक Consciousness Studies में भी यह प्रश्न उठता है कि क्या चेतना पदार्थ से उत्पन्न हुई है या पदार्थ चेतना की अभिव्यक्ति है। ऐतरेय उपनिषद् स्पष्टतः दूसरे पक्ष की ओर संकेत करता है।

(घ) अद्वैत वेदान्त की स्थापना

शंकराचार्य के अनुसार—

जगत् आत्मा से पृथक् नहीं,

लोक आत्मा की ही अभिव्यक्तियाँ हैं,

कारण और कार्य अन्ततः अभिन्न हैं।

यहाँ सृष्टि “परिणाम” नहीं, बल्कि “प्रकाशन” (manifestation) है।

(ङ) “मर” का दार्शनिक अर्थ

“मर” अर्थात् मृत्युशील जगत्।

पृथ्वी को “मर” कहना अत्यन्त गहन संकेत है—

यहाँ सब परिवर्तनशील है,

शरीर नश्वर है,

अनुभव क्षणभंगुर हैं।

यह मानव की existential condition का भी संकेत है।

९. लेखक की शोधात्मक टिप्पणी / आधुनिक विमर्श

Consciousness Studies

आधुनिक चेतना-अध्ययन में layered consciousness की अवधारणा मिलती है।

उपनिषद् के “लोक” को चेतना के स्तरों के रूप में देखा जा सकता है—

स्थूल चेतना,

मानसिक चेतना,

प्रकाशमय बौद्धिक चेतना,

पारलौकिक चेतना।

Cosmology से तुलना

आधुनिक Cosmology बहु-स्तरीय ब्रह्माण्ड (multilayered cosmos) की चर्चा करती है—

visible universe,

dark matter,

quantum vacuum,

higher dimensional models।

उपनिषद् इन सबका आध्यात्मिक प्रतिरूप प्रस्तुत करता प्रतीत होता है।

Phenomenology से सम्बन्ध

Edmund Husserl की Phenomenology अनुभव की संरचना को चेतना से जोड़ती है।

उपनिषद् का “लोक” भी वस्तुतः अनुभूति-संरचनाएँ (structures of experience) हैं।

अर्थात्—

जैसा चेतना का स्तर, वैसा जगत् का अनुभव।

Psychology / Existentialism

“मर” मानव के existential anxiety का प्रतीक है।

Martin Heidegger ने “Being-toward-death” की चर्चा की थी।

उपनिषद् इससे आगे जाकर कहता है—

मृत्युशीलता का ज्ञान आत्मा की खोज का द्वार बन सकता है।

अन्य उपनिषदों से तुलना

Chandogya Upanishad

“सदेव सोम्येदमग्र आसीत्”—सृष्टि का मूल सत् है।

Taittiriya Upanishad

अन्नमय से आनन्दमय कोश तक चेतना के स्तर।

Mundaka Upanishad

“यथोर्णनाभिः सृजते”—सृष्टि आत्मा से ही प्रस्फुटित होती है।

१०. साधना एवं आत्मचिन्तन संकेत

यह मन्त्र ध्यान में अत्यन्त उपयोगी है।

साधक “लोकों” को बाह्य भूगोल न मानकर—

चेतना की आन्तरिक अवस्थाओं,

मानसिक स्तरों,

सूक्ष्म अनुभव-क्षेत्रों

के रूप में अनुभव कर सकता है।

“मर” से “मरीचि” और “अम्भः” की यात्रा स्थूल से सूक्ष्म चेतना की ओर उन्नयन का प्रतीक बन जाती है।

११. निष्कर्ष

यह मन्त्र सिखाता है कि लोक-सृष्टि का मूलाधार आत्मा है। जगत् कोई आत्मा से पृथक् यांत्रिक संरचना नहीं, बल्कि चेतना की अभिव्यक्ति है। “अम्भः”, “मरीचि”, “मर” और “आपः” अस्तित्व के विभिन्न स्तरों के प्रतीक हैं। उपनिषद् का ब्रह्माण्ड-दर्शन केवल भौतिक Cosmology नहीं, बल्कि आध्यात्मिक Ontology है। अद्वैत वेदान्त के अनुसार समस्त लोक उसी आत्मा के विविध प्रकाश हैं—अतः आत्मा को जानना ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के रहस्य को जानना है।


मुकेश ,,,,,,,,,

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