“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
ज़िंदगी भी
कई बार
हमारी नींद के दौरान
चुपचाप
अपनी पटरियाँ बदल देती है।”
मुकेश ,,
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