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Wednesday, 13 May 2026

हर परछाई के साथ एक अधूरी कहानी

 शहरों में

लोग नहीं चलते
परछाइयाँ चलती हैं

और हर परछाई के साथ
एक अधूरी कहानी
चुपचाप लिपटी रहती है

सड़कों पर
जूतों की आवाज़ नहीं होती
बस थकी हुई साँसें
कंक्रीट पर गिरती रहती हैं
बिना किसी अर्थ के

कैफ़े की खिड़कियों में
चाय ठंडी हो जाती है
और बातचीत
मोबाइल स्क्रीन में
दफ़्न हो जाती है

यहाँ रिश्ते
हाथों से नहीं
नेटवर्क से बनते हैं
और टूटते भी हैं
बिना शोर के

मेट्रो की सीढ़ियों पर
चेहरे ऊपर-नीचे होते हैं
पर नज़रें कहीं नहीं रुकतीं
हर कोई
किसी अनदेखे स्टेशन की
तरफ़ भाग रहा है

और अंत में
जब रात शहर को ढक लेती है
तो पता चलता है—
यहाँ लोग नहीं रहते
सिर्फ़ उनकी परछाइयाँ
ओवरटाइम करती हैं

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