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Sunday, 31 May 2026

हाशिये पर ज़िन्दगी

 हाशिये पर ज़िन्दगी

शाम उतर रही थी।

वह ऐसी शाम थी जो शहर पर नहीं, लोगों के भीतर उतरती है। खिड़की के बाहर धूप का आख़िरी टुकड़ा सामने वाली दीवार पर अटका हुआ था, जैसे जाने से पहले एक बार पीछे मुड़कर देख लेना चाहता हो।

शकुन्तला उस दीवार को देख रही थी।

साठ वर्ष की उम्र में आदमी अक्सर भविष्य नहीं देखता, वह अतीत के कमरे खोलता रहता है। उसके सामने मेज़ पर चाय का कप रखा था। चाय ठंडी हो चुकी थी। जैसे कई बातें, जिन्हें कभी कहना था और जो अब कहे जाने के समय से आगे निकल चुकी थीं।

कमरे में सन्नाटा था।

ऐसा सन्नाटा जिसमें घड़ी की टिक-टिक भी किसी अजनबी के कदमों जैसी लगती है।

वह अकेली रहती थी।

पति को गुज़रे हुए सात साल हो गए थे। बेटा कनाडा में था। बेटी बंगलुरु में। दोनों फ़ोन करते थे। नियमित। स्नेह से। लेकिन फ़ोन पर मिलने वाला प्रेम वैसा ही होता है जैसे किसी पुराने घर की तस्वीर—उसमें घर दिखता है, घर की गर्माहट नहीं।

उस दिन उसने अलमारी खोली।

पुरानी साड़ियों के बीच एक नीला लिफ़ाफ़ा रखा था।

लिफ़ाफ़े पर धूल जमी थी।

उसे याद नहीं था कि यह कब से वहाँ पड़ा है।

उसने काँपते हाथों से उसे खोला।

अंदर एक पत्र था।

कागज़ पीला पड़ चुका था।

"प्रिय शकुन्तला,

यदि यह पत्र तुम्हें कभी मिले तो समझना कि मैं तुम्हें भूल नहीं पाया।"

वह ठिठक गई।

यह राघव की लिखावट थी।

पैंतालीस साल पुरानी।

राघव।

नाम जैसे किसी बंद कमरे की खिड़की खुल जाए।

कॉलेज के दिनों में वे दोनों साथ पढ़ते थे। प्रेम भी था। पर उन दिनों प्रेम जीवन का निर्णय नहीं होता था, केवल एक दुर्घटना होता था, जिसे परिवार वाले समय रहते ठीक कर देते थे।

राघव कहीं और चला गया था।

उसकी शादी कहीं और हो गई थी।

जीवन अपनी-अपनी पटरी पर चलता रहा।

पत्र छोटा था।

बस इतना लिखा था कि वह उसे भूल नहीं पाया, और यदि कभी मिलना हो तो पुराने रेलवे स्टेशन पर आ जाना, जहाँ वे पहली बार मिले थे।

नीचे तारीख़ थी।

1979।

शकुन्तला की आँखों में अजीब-सी मुस्कान उभरी।

जिस निमंत्रण की उम्र केवल कुछ दिनों की रही होगी, वह अब पैंतालीस साल बाद उसके सामने था।

वह देर तक पत्र को देखती रही।

फिर अचानक उसे लगा कि जीवन का सबसे बड़ा दुख यह नहीं कि इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं।

सबसे बड़ा दुख यह है कि कभी-कभी हमें पता ही नहीं चलता कि कोई इच्छा हमारे लिए प्रतीक्षा कर रही थी।

अगले दिन वह रेलवे स्टेशन गई।

स्टेशन बदल चुका था।

नई टाइलें, नए बोर्ड, नए लोग।

केवल प्रतीक्षा वही थी।

वह एक बेंच पर बैठ गई।

उसे मालूम था कि वहाँ कोई नहीं आएगा।

शायद राघव जीवित भी न हो।

लेकिन वह किसी आदमी का इंतज़ार नहीं कर रही थी।

वह उस लड़की का इंतज़ार कर रही थी जो कभी उसके भीतर रहती थी।

धीरे-धीरे अँधेरा उतरने लगा।

पास ही एक बूढ़ा आदमी बैठा था।

फटे कोट में।

हाथ में एक पुरानी डायरी।

वह बार-बार प्लेटफ़ॉर्म की तरफ़ देखता और फिर नज़रें झुका लेता।

कुछ देर बाद शकुन्तला ने पूछा,

"किसी का इंतज़ार है?"

बूढ़ा मुस्कुराया।

"हाँ।"

"कौन आएगा?"

"कोई नहीं।"

उसने सहजता से कहा।

जैसे यह कोई दुखद बात न हो।

"फिर भी आते हैं?"

"हाँ।"

वह बोला,

"क्योंकि आदमी कभी-कभी लोगों का नहीं, अपनी उम्मीदों का इंतज़ार करता है।"

शकुन्तला चुप हो गई।

उसे लगा जैसे यह वाक्य उसी के लिए कहा गया हो।

कुछ देर बाद बूढ़ा उठकर चला गया।

बेंच पर उसकी डायरी छूट गई।

शकुन्तला ने आवाज़ दी।

पर वह भीड़ में खो चुका था।

उसने डायरी खोली।

पहले पन्ने पर लिखा था

"जो लोग जीवन की मुख्य कहानी में जगह नहीं पाते, वे हाशिये पर लिखे जाते हैं।

लेकिन कभी-कभी पूरी कहानी का अर्थ उन्हीं हाशियों में छिपा होता है।"

शकुन्तला देर तक उन शब्दों को पढ़ती रही।

फिर उसकी आँखें भर आईं।

उसे अचानक अपने जीवन के सारे हाशिये याद आने लगे—

वह कविता जो उसने कभी नहीं लिखी।

वह प्रेम जिसे कभी नहीं जिया।

वह यात्रा जिस पर कभी नहीं गई।

वे सपने जिन्हें घर-परिवार की ज़िम्मेदारियों ने धीरे-धीरे तह करके किसी दराज़ में रख दिया।

लेकिन उसी क्षण उसे यह भी याद आया कि उन्हीं हाशियों में उसके बच्चों की हँसी थी।

पति का मौन स्नेह था।

बीमार माँ की सेवा थी।

रात-रात भर जागकर किए गए त्याग थे।

शायद जीवन कभी मुख्य कथा और हाशिये में बँटता ही नहीं।

हम जिसे हाशिया समझते हैं, वही किसी और के लिए पूरी किताब होता है।

घर लौटते समय उसने आसमान की ओर देखा।

एक तारा चमक रहा था।

बहुत साधारण।

बहुत अकेला।

लेकिन अँधेरे के बीच साफ़ दिखाई देता हुआ।

उसने पहली बार महसूस किया कि अकेलापन और व्यर्थता एक ही चीज़ नहीं हैं।

कुछ जीवन इतिहास नहीं बनते।

वे केवल किसी दूसरे मनुष्य के जीवन में थोड़ी-सी रोशनी छोड़ जाते हैं।

और शायद वही पर्याप्त है।

घर पहुँचकर उसने नीला लिफ़ाफ़ा वापस अलमारी में नहीं रखा।

उसे मेज़ पर रख दिया।

खिड़की के पास।

जहाँ सुबह की धूप आती थी।

रात गहरी हो रही थी।

लेकिन बहुत दिनों बाद उसे लगा कि उसके भीतर कोई छोटा-सा दीपक जल रहा है।

ऐसा दीपक जो अँधेरे को समाप्त नहीं करता

बस यह याद दिलाता है कि अँधेरे के बीच भी जीवन अपनी धीमी, विनम्र और लगभग अदृश्य लौ में जलता रहता है।

हाशिये पर।

और फिर भी, पूरी तरह जीवित।

मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

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