तुम्हारी आवाज़
जिस किसी भी शहर में मिलो
रेलवे प्लेटफ़ॉर्म, किसी पुरानी किताब की दुकान,
या शाम की थकी हुई किसी सड़क पर
ज़रा सुनाना अपनी आवाज़।
सुना है उसमें बारिश के बाद की मिट्टी रहती है,
और कुछ अधूरी यात्राओं की धूप।
सुना है जब तुम धीरे से किसी का नाम लेते हो,
तो वह नाम अपने अर्थ से थोड़ा बड़ा हो जाता है।
सुनाना अपनी आवाज़
किसी सूने पार्क की बेंच पर बैठकर,
जहाँ पेड़ों की छाया भी
अपने अकेलेपन से बातें करती हो।
मेरी चुप्पियों के किनारों पर
रख देना उसके दो-चार शब्द,
जैसे कोई थका हुआ मुसाफ़िर
रास्ते में पानी का छोटा-सा कटोरा रख दे।
और अगर कुछ न कहना चाहो,
तो बस पुकारना मुझे एक बार।
मैं पहचान लूँगा।
आख़िर हम दोनों
एक ही आसमान के नीचे रखे हुए
दो अधखुले ख़त हैं
हवा हमें
अलग-अलग दिशाओं में उड़ाती रही है,
पर किसी शाम,
किसी अनजानी रोशनी में,
हम फिर एक-दूसरे के पते पर
पहुँच ही जाएँगे।
मुकेश ,,,
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