वह आदमी जो टूटी हुई घड़ियाँ सँभालकर रखता था
दुकान और घड़ियाँ
अब जब उसके बारे में सोचता हूँ, तो सबसे पहले मुझे उसकी दुकान की गंध याद आती है।
हर आदमी की स्मृति का अपना एक मौसम होता है, अपना एक रंग, अपनी एक गंध।
उसकी स्मृति में धूल थी, पुरानी लकड़ी थी, मशीन के तेल की हल्की गंध थी और अनगिनत घड़ियों की टिक-टिक थी, जो एक-दूसरे से अलग समय बता रही थीं।
दुकान शहर के पुराने हिस्से में थी।
उस सड़क पर नए शहर की चमक कभी ठीक से नहीं पहुँची। बरसात में पानी भर जाता था। गर्मियों में धूल उड़ती रहती थी। और सर्दियों में धूप दीवारों पर देर से उतरती थी।
वहीं, एक तंग-सी दुकान में वह बैठता था।
लोग उसे घड़ीसाज़ कहते थे।
लेकिन वह केवल घड़ियाँ नहीं सुधारता था।
कभी कोई पुराना रेडियो आता।
कभी टेबल फैन।
कभी अलार्म घड़ी।
और कभी-कभी ऐसी चीज़ें, जिनकी मरम्मत करवाने का कोई व्यावहारिक कारण नहीं होता।
एक बार एक बूढ़ी औरत एक टूटी हुई टॉर्च लेकर आई।
टॉर्च का शीशा टूटा था। बैटरी का ढक्कन गायब था।
वह नई टॉर्च आसानी से खरीद सकती थी।
फिर भी वह उसे लेकर आई थी।
उसने टॉर्च को हाथ में लिया और पूछा
"कितने वर्षों से है?"
बूढ़ी औरत मुस्कुराई।
"मेरे आदमी की थी।"
बस इतना ही।
उसने फिर कुछ नहीं पूछा।
औरत भी कुछ नहीं बोली।
लेकिन दोनों के बीच जो बात होनी थी, वह हो चुकी थी।
उसने टॉर्च रख ली।
तीन दिन बाद जब औरत लौटी, तो टॉर्च ठीक थी।
जाते-जाते औरत ने कहा—
"भगवान तुम्हें सलामत रखे।"
वह मुस्कुरा दिया।
उसके चेहरे पर उस समय जो भाव था, वह मुझे बहुत बाद में समझ आया।
वह टॉर्च नहीं ठीक कर रहा था।
वह उस औरत के अकेलेपन को थोड़ा-सा सहारा दे रहा था।
शायद इसलिए कि वह स्वयं भी अकेला था।
उसकी पत्नी का नाम सोना था।
मैंने उसे कभी नहीं देखा।
जब तक मैं उस आदमी से मिला, सोना को मरे हुए लगभग बीस साल हो चुके थे।
लेकिन अजीब बात थी—
वह उसके बारे में ऐसे बात करता था जैसे वह अभी बाज़ार गई हो और थोड़ी देर में लौट आने वाली हो।
"सोना को लौकी पसंद नहीं थी।"
"सोना को ठंडी चाय से नफ़रत थी।"
"सोना को बरसात की पहली गंध बहुत अच्छी लगती थी।"
ये बातें वह किसी विशेष भावुकता के बिना कहता।
जैसे रोज़मर्रा की बातें हों।
लेकिन उन्हीं साधारण वाक्यों में उसकी पूरी दुनिया छिपी हुई थी।
एक दिन मैंने पूछा—
"फोटो है उसकी?"
वह बिना कुछ बोले भीतर गया।
एक पुराना एल्बम लाया।
फोटो धुँधली थी।
एक साधारण स्त्री।
साड़ी में।
हल्की मुस्कान के साथ।
मैंने तस्वीर कुछ देर देखी।
फिर उसकी ओर देखा।
वह तस्वीर नहीं देख रहा था।
वह शायद उस समय को देख रहा था जिसमें तस्वीर ली गई थी।
और आदमी अक्सर तस्वीरों में लोगों को नहीं, समय को खोजता है।
सोना और घर की वस्तुएँ
कुछ महीने बाद पहली बार मैं उसके घर गया।
घर दुकान से अधिक पुराना था।
बरामदा था।
सीलन लगी दीवारें थीं।
और एक ऐसी शांति थी जो पहली बार में अच्छी लगती है, लेकिन थोड़ी देर बाद भारी होने लगती है।
उसने चाय बनाई।
इलायची डालकर।
फिर अचानक बोला—
"सोना को इलायची बहुत पसंद थी।"
मैंने देखा।
रसोई में दो कप रखे थे।
हालाँकि घर में वह अकेला रहता था।
मैंने कुछ नहीं पूछा।
लेकिन जाते समय उसने स्वयं कहा—
"आदत छूटती नहीं।"
उसकी आवाज़ में हँसी थी।
पर पूरी नहीं।
घर में एक अलमारी थी।
लकड़ी की पुरानी अलमारी।
एक दिन उसने उसे खोला।
अंदर कुछ साड़ियाँ थीं।
बहुत करीने से तह की हुई।
जैसे किसी ने कल ही रखी हों।
मैंने कहा—
"अब तक संभाल रखी हैं?"
वह कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला
"फेंक दूँ?"
उस प्रश्न में व्यंग्य नहीं था।
सचमुच का प्रश्न था।
मानो वह स्वयं उत्तर खोज रहा हो।
मैंने कुछ नहीं कहा।
उसने भी अलमारी बंद कर दी।
लेकिन उस दिन लौटते समय मुझे पहली बार समझ आया कि स्मृतियाँ वस्तुओं में नहीं रहतीं।
हम वस्तुओं को इसलिए बचाते हैं क्योंकि स्मृतियों को सीधे छू नहीं सकते।
एक बार उसने आम काटे।
मैंने देखा, वह मुस्कुरा रहा है।
मैंने पूछा—
"क्या बात है?"
उसने कहा—
"सोना को आम खाना नहीं आता था।"
फिर हँसने लगा।
"रस हमेशा साड़ी पर गिरा लेती थी।"
उसकी हँसी कुछ देर तक रही।
फिर धीरे-धीरे रुक गई।
और कमरे में एक अजीब चुप्पी भर गई।
क्योंकि कभी-कभी हँसी और दुःख के बीच केवल एक साँस का फ़ासला होता है।
रुकी हुई घड़ी
सर्दियों की एक शाम थी।
दुकान लगभग बंद हो चुकी थी।
सड़क पर धुंध उतर रही थी।
मैं पहुँचा तो वह एक छोटी-सी कलाई घड़ी को खोले बैठा था।
उसका चेहरा बहुत ध्यानमग्न था।
जैसे कोई कठिन काम कर रहा हो।
मैंने पूछा—
"किसकी घड़ी है?"
उसने बिना सिर उठाए कहा—
"सोना की।"
मैंने पहली बार वह घड़ी देखी।
बहुत साधारण थी।
सुनहरे रंग की सस्ती-सी घड़ी।
ऐसी घड़ी जो हजारों औरतों के हाथ में हो सकती थी।
लेकिन उसके लिए वह अद्वितीय थी।
मैंने पूछा—
"चलती नहीं?"
"नहीं।"
"ठीक नहीं हो सकती?"
उसने इस बार सिर उठाया।
मुस्कुराया।
और बोला
"हो सकती है।"
"तो फिर कर क्यों नहीं लेते?"
वह कुछ देर तक मुझे देखता रहा।
फिर बोला—
"क्योंकि यह जिस दिन बंद हुई थी, उसी दिन वह गई थी।"
मैं चुप हो गया।
वह भी।
दुकान में केवल टिक-टिक की आवाज़ रह गई।
उसके बाद कई वर्षों तक मैं उससे मिलता रहा।
वह बूढ़ा होता गया।
बाल सफेद होते गए।
हाथ काँपने लगे।
लेकिन दुकान चलती रही।
और घड़ियाँ भी।
सिर्फ एक घड़ी नहीं चली।
सोना की घड़ी।
वह हमेशा उसी दराज में रखी रहती।
रुकी हुई।
एक निश्चित समय पर।
जैसे किसी ने समय के बहते हुए पानी में एक छोटा-सा पत्थर रख दिया हो।
फिर एक दिन उसके मरने की खबर मिली।
कोई बड़ी घटना नहीं हुई।
अखबार में खबर नहीं छपी।
शहर वैसे ही चलता रहा।
जैसे चलता है।
कुछ लोगों ने दो मिनट बात की।
फिर अपने कामों में लग गए।
दुनिया का यही स्वभाव है।
कई महीने बाद मैं उस दुकान के सामने से गुज़रा।
नया मालिक आ चुका था।
पुराना सामान बाहर फेंका जा रहा था।
मैंने यूँ ही कबाड़ के ढेर में देखा।
वहाँ एक छोटी-सी घड़ी पड़ी थी।
सुनहरे रंग की।
रुकी हुई।
मैंने उसे उठा लिया।
शायद वह वही घड़ी थी।
शायद नहीं।
मैंने कभी जानने की कोशिश नहीं की।
कुछ चीज़ों का निश्चित होना ज़रूरी नहीं होता।
उनका प्रतीक बन जाना ही पर्याप्त होता है।
आज वह घड़ी मेरी मेज़ की दराज में रखी है।
वह अब भी बंद है।
उसे चलाया जा सकता है।
बहुत आसानी से।
लेकिन मैंने कभी कोशिश नहीं की।
क्योंकि उम्र के एक पड़ाव पर आकर आदमी समझता है कि जीवन का अर्थ सब कुछ ठीक कर देने में नहीं है।
कुछ चीज़ों को उसी रूप में रहने देना चाहिए जिसमें वे हमें मिली थीं।
एक रुकी हुई घड़ी की तरह।
एक पुराने घर की तरह।
एक अधूरी बातचीत की तरह।
या किसी ऐसे प्रेम की तरह
जो समाप्त होकर भी
पूरी तरह समाप्त नहीं होता।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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