“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
मैं चाहता हूँ कि लोग सिर्फ़ जीतना न सीखें
वे यह भी देखें कि हार कहाँ-कहाँ छिपी है उन जीतों के भीतर जिन्हें उन्होंने कभी सवाल नहीं किया
क्योंकि देखने की पूरी क्षमता सिर्फ़ पाने में नहीं बल्कि समझने में होती है
मुकेश ,,,,,,,,,,
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