त्रिपाद्विभूति-महानारायणोपनिषद् के उत्तरखण्ड के चार अध्यायों का शोधनिष्ठ अध्ययन
त्रिपाद्विभूति-महानारायणोपनिषद् का पूर्वखण्ड जहाँ
नारायण को परब्रह्म सिद्ध
करते हुए सृष्टि, देवताओं
तथा उपासना का विवेचन करता
है, वहीं उत्तरखण्ड उपनिषद्
के सर्वाधिक गूढ़ दार्शनिक भाग
का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें
भगवान् नारायण की त्रिपाद-विभूति, परमधाम, जीव-ब्रह्म सम्बन्ध,
माया, मोक्ष तथा परम पुरुषार्थ
का वर्णन किया गया है।
उत्तरखण्ड साधना के फल और
परम सत्य के अनुभव
का मार्ग प्रशस्त करता है।
उत्तरखण्ड
का प्रथम अर्थात् पंचम अध्याय सम्पूर्ण
उपनिषद् का हृदय माना
जा सकता है। इसी
अध्याय में "त्रिपाद-विभूति" सिद्धान्त का विस्तारपूर्वक निरूपण
मिलता है।
यह
सिद्धान्त मूलतः ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में
प्रतिपादित विचार का विकास है—
पादोऽस्य
विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।
अर्थात्
सम्पूर्ण दृश्य जगत् भगवान् का
केवल एक पाद (चतुर्थांश)
है, जबकि उनके तीन
पाद अमृतस्वरूप दिव्य लोक में स्थित
हैं।
एकपाद
विभूति -इस अध्याय के
अनुसार—समस्त ब्रह्माण्ड, देवता, मनुष्य, प्राणी, लोक, प्रकृति, भगवान्
की केवल एक विभूति
हैं।
यह
सम्पूर्ण क्षेत्र— परिवर्तनशील, कालबद्ध, जन्म-मरणयुक्त है।
त्रिपाद
विभूति -भगवान् का वास्तविक स्वरूप
दृश्य जगत् से परे
है।यह क्षेत्र—अमृतमय, अविनाशी, मायातीत, नित्य है।इसी को वैकुण्ठ, परमधाम
अथवा परव्योम कहा गया है।
दार्शनिक
विश्लेषण
यह
अध्याय बताता है कि संसार
अन्तिम सत्य नहीं है।
संसार ईश्वर की महिमा का
केवल एक अंश है।
अतः आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य
दृश्य जगत् से परे
उस अनन्त सत्ता का अनुभव करना
है।
पंचम
अध्याय का मुख्य प्रतिपाद्य
यह है कि परम
सत्य दृश्य जगत् के परे
स्थित भगवान् की त्रिपाद दिव्य
विभूति में निहित है।
षष्ठ
अध्याय में भगवान् के
दिव्य धाम का वर्णन
मिलता है। यह अध्याय
वैष्णव दर्शन में परमधाम-विज्ञान
का एक महत्वपूर्ण स्रोत
है।
वैकुण्ठ
का तत्त्व - वैकुण्ठ शब्द का अर्थ
है— जहाँ कोई कुण्ठा
(दुःख, शोक, भय) नहीं
है।
यह
लोक— जन्मरहित, मृत्युरहित, शोकशून्य, नित्य आनन्दमय बताया गया है।
परमधाम
की विशेषताएँ - उपनिषद् के अनुसार वहाँ—
काल का प्रभाव नहीं,
मृत्यु
नहीं, कर्मबन्धन नहीं, अज्ञान नहीं। वहाँ केवल दिव्य
चेतना का राज्य है।
नारायण
की दिव्य उपस्थिति
वैकुण्ठ
में भगवान् नारायण अपने दिव्य स्वरूप
में विराजमान हैं।वे—अनन्त, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, रूप में नित्य
प्रकाशित रहते हैं।
दार्शनिक
महत्त्व - यह अध्याय बताता
है कि मोक्ष केवल
दुःख की निवृत्ति नहीं
है, बल्कि परमधाम की प्राप्ति है।
निष्कर्ष
- षष्ठ अध्याय वैकुण्ठ को आध्यात्मिक उत्कर्ष
का सर्वोच्च लक्ष्य सिद्ध करता है।
सप्तम
अध्याय : जीव, माया और बन्धन
सप्तम
अध्याय जीव की स्थिति
तथा उसके बन्धन के
कारणों का विवेचन करता
है।
जीव
का स्वरूप - उपनिषद् के अनुसार जीव—चेतन है, शाश्वत
है, ज्ञानस्वरूप है। वह न
शरीर है और न
मन।
बन्धन
का कारण - जीव अपने वास्तविक
स्वरूप को भूलकर शरीर
को "मैं" मान लेता है।
यही अविद्या है।
अविद्या
से उत्पन्न होते हैं— राग,
द्वेष, मोह, भय, कर्मबन्धन।
माया
का स्वरूप -माया नारायण की
शक्ति है।माया जीव को नाम-रूप के जगत्
में उलझाए रखती है। जब तक
जीव माया से प्रभावित
रहता है, तब तक
वह संसारचक्र में घूमता रहता
है।
आत्मज्ञान
का महत्त्व - अध्याय में कहा गया
है कि— आत्मज्ञान के
बिना मुक्ति सम्भव नहीं। जब जीव यह जान
लेता है कि वह
परमात्मा का अंश है,
तब उसका अज्ञान नष्ट
हो जाता है।
दार्शनिक
विश्लेषण -यह अध्याय वेदान्त
के अविद्या-सिद्धान्त को वैष्णव दृष्टिकोण
से प्रस्तुत करता है।
निष्कर्ष
- सप्तम अध्याय का मुख्य संदेश
है कि जीव का
बन्धन अज्ञान से उत्पन्न होता
है और उसका निवारण
आत्मज्ञान तथा ईश्वरभक्ति से
सम्भव है।
अष्टम
अध्याय : मोक्ष और नारायण-सायुज्य
उत्तरखण्ड
का अन्तिम अध्याय मोक्ष के स्वरूप तथा
उसकी प्राप्ति का विवेचन करता
है। यह सम्पूर्ण उपनिषद् का उपसंहार भी
है।
मोक्ष
की परिभाषा - मोक्ष का अर्थ केवल
पुनर्जन्म का अभाव नहीं
है। मोक्ष का वास्तविक अर्थ
है— परमात्मप्राप्ति, परमधामप्राप्ति, दिव्य आनन्द की उपलब्धि।
नारायण-सायुज्य - उपनिषद् के अनुसार सर्वोच्च
मुक्ति "नारायण-सायुज्य" है। अर्थात्— भगवान् के साथ अखण्ड
सम्बन्ध की प्राप्ति। यह स्थिति
संसार के समस्त दुःखों
से परे है।
मोक्ष
के साधन - अध्याय में निम्न साधनों
का उल्लेख मिलता है—
1. नारायण-भक्ति -भगवान् के प्रति अनन्य
प्रेम।
2. ध्यान - निरन्तर ईश्वरचिन्तन।
3. ज्ञान - स्वरूपबोध।
4. मन्त्र-जप - नारायण-मन्त्रों का निरन्तर अभ्यास।
मुक्त
पुरुष की अवस्था - मुक्त जीव— भय से
रहित होता है, शोक
से रहित होता है,
कर्मबन्धन से मुक्त होता
है, परम आनन्द में
स्थित रहता है।
दार्शनिक
महत्त्व - यह अध्याय भक्ति
और ज्ञान के समन्वय को
मोक्ष का साधन बताता
है।
निष्कर्ष
- अष्टम अध्याय उपनिषद् के सम्पूर्ण शिक्षातत्त्व
का सार प्रस्तुत करता
है और यह प्रतिपादित
करता है कि नारायण
की प्राप्ति ही मानव जीवन
का परम लक्ष्य है।
समग्र
निष्कर्ष
त्रिपाद्विभूति-महानारायणोपनिषद् का उत्तरखण्ड वैष्णव
वेदान्त की दार्शनिक ऊँचाइयों
का प्रतिनिधित्व करता है। इसके
चार अध्याय क्रमशः—
- त्रिपाद-विभूति के सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हैं।
- वैकुण्ठ
एवं परमधाम का स्वरूप स्पष्ट करते हैं।
- जीव,
माया और बन्धन का विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं।
- मोक्ष
तथा नारायण-सायुज्य को जीवन का परम पुरुषार्थ सिद्ध करते हैं।
पूर्वखण्ड
जहाँ साधना और तत्त्वज्ञान की
भूमिका निर्मित करता है, वहीं
उत्तरखण्ड उस साधना की
चरम परिणति—परमधाम और नारायण-प्राप्ति—का निरूपण करता
है। इस दृष्टि से
सम्पूर्ण त्रिपाद्विभूति-महानारायणोपनिषद् वैष्णव ब्रह्मविद्या, उपासना और मोक्ष-दर्शन
का एक उत्कृष्ट तथा
समन्वित उपनिषद् है, जिसमें पुरुषसूक्तीय
"त्रिपादस्यामृतं दिवि" की अवधारणा अपने
पूर्ण दार्शनिक विकास को प्राप्त करती
है।
Mukesh
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