तुरीयातीतोपनिषद् : स्वरूप, संरचना, दर्शन और संन्यास-परम्परा का शोधपरक अध्ययन
तुरीयातीतोपनिषद् 108 उपनिषदों में से एक महत्वपूर्ण संन्यासोपनिषद् है। यह शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध माना जाता है और मुक्तिकोपनिषद् में उल्लिखित 108 उपनिषदों की सूची में इसका स्थान है। यह उपनिषद् विशेष रूप से संन्यास, आत्मज्ञान, जीवन्मुक्ति और तुरीयातीत अवस्था का निरूपण करता है। यद्यपि ईश, केन, कठ या बृहदारण्यक जैसे उपनिषदों की तुलना में इस पर कम अध्ययन हुआ है, तथापि अद्वैत-वेदान्त और संन्यास-परम्परा के अध्ययन के लिए इसका अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है।
तुरीयातीतोपनिषद् अपेक्षाकृत लघु उपनिषद् है।
विभिन्न पाण्डुलिपियों और संस्करणों में श्लोक-संख्या में कुछ अन्तर मिलता है, किन्तु सामान्यतः उपलब्ध पाठानुसार इसमें—
- 1 अध्याय (एक ही प्रकरण)
- लगभग 14 से 17 मन्त्र/श्लोक
माने जाते हैं।
कुछ दक्षिण भारतीय संस्करणों में 14 मन्त्र मिलते हैं, जबकि कुछ मुद्रित संस्करणों में 17 तक श्लोक प्राप्त होते हैं। अतः शोधकार्यों में प्रयुक्त संस्करण का उल्लेख करना आवश्यक होता है।
नाम का अर्थ
"तुरीयातीत" शब्द दो पदों से बना है—
- तुरीय = जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति से परे चौथी चेतना अवस्था
- अतीत = उससे भी परे
अर्थात् वह अवस्था जहाँ साधक केवल तुरीय का अनुभव नहीं करता बल्कि तुरीय-अनुभव के ज्ञाता होने की भावना भी विलीन हो जाती है।
यह वही स्थिति है जिसे अद्वैत वेदान्त में— ब्रह्मस्थिति,सहजसमाधि,परमहंसावस्था,जीवन्मुक्ति कहा गया है।
इस उपनिषद् का मुख्य उद्देश्य यह बताना है कि वास्तविक संन्यास वस्त्र परिवर्तन नहीं बल्कि अहंकार-त्याग है।
उपनिषद् बार-बार स्पष्ट करता है कि—
"संन्यासी वह नहीं जो केवल दण्ड धारण करे,बल्कि वह जो देहाभिमान का परित्याग कर दे।"
यही इसकी केन्द्रीय शिक्षा है।
तुरीयातीतोपनिषद् में संन्यास के बाह्य चिह्नों की अपेक्षा आन्तरिक वैराग्य को अधिक महत्व दिया गया है।
उपनिषद् के अनुसार साधक को त्यागना चाहिए— पुत्रेषणा,वित्तेषणा,लोकेषणा
ये तीनों बन्धन जीव को संसार में बाँधे रखते हैं।
जब इनका परित्याग होता है तब आत्मज्ञान का उदय सम्भव होता है।
परमहंस संन्यासी का स्वरूप
उपनिषद् में परमहंस संन्यासी का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण मिलता है।
ऐसा संन्यासी— न मित्र देखता है,न शत्रु,न मान,न अपमान,न लाभ,न हानि वह सर्वत्र ब्रह्म का दर्शन करता है।
उसकी दृष्टि में सम्पूर्ण जगत् आत्मस्वरूप हो जाता है।
यह विचार स्पष्ट रूप से अद्वैत वेदान्त की शिक्षा का प्रतिपादन करता है।
तुरीय और तुरीयातीत
उपनिषद् की सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा तुरीयातीत अवस्था का विवेचन है।
माण्डूक्योपनिषद् में वर्णित चार अवस्थाएँ हैं— जाग्रत्,स्वप्न,सुषुप्ति,तुरीय
किन्तु तुरीयातीतोपनिषद् कहता है कि साधक जब पूर्णतः ब्रह्म में प्रतिष्ठित हो जाता है तब वह तुरीय की अनुभूति के कर्तृत्व से भी परे चला जाता है।
यह अवस्था— निर्विकल्प,निरहंकार,निरुपाधिक,शुद्ध ब्रह्मस्वरूप मानी जाती है।
आत्मज्ञान का स्वरूप
उपनिषद् में आत्मा को बताया गया है— अजन्मा,अविनाशी,निराकार,निष्क्रिय,सर्वव्यापक
जीव का बन्धन केवल अज्ञान के कारण है।
ज्ञान प्राप्त होने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि
"न जीव है, न बन्धन है, न मोक्ष है;केवल ब्रह्म ही सत्य है।"
यह शिक्षण गौड़पादाचार्य की अजातिवाद परम्परा की स्मृति कराता है।
जीवन्मुक्ति का सिद्धान्त
तुरीयातीतोपनिषद् जीवन्मुक्ति पर विशेष बल देता है।
जीवन्मुक्त वह है—
- जो शरीर रहते हुए भी मुक्त है
- कर्म करता हुआ भी अकर्ता है
- संसार में रहता हुआ भी संसार से असंग है
ऐसा ज्ञानी व्यक्ति कमलपत्र पर जल के समान संसार में स्थित रहता है।
अद्वैत वेदान्त का प्रभाव
इस उपनिषद् में निम्न अद्वैत सिद्धान्त स्पष्ट दिखाई देते हैं—
- ब्रह्म सत्य है।
- जगत् मिथ्या है।
- जीव और ब्रह्म अभिन्न हैं।
- अज्ञान ही बन्धन है।
- ज्ञान ही मोक्ष है।
इसी कारण अनेक विद्वान इसे उत्तरकालीन अद्वैत-संन्यास साहित्य का महत्वपूर्ण ग्रन्थ मानते हैं।
अन्य संन्यासोपनिषदों से तुलना
तुरीयातीतोपनिषद् का निकट सम्बन्ध निम्न उपनिषदों से है— जाबालोपनिषद्,परमहंसोपनिषद्,भिक्षुकोपनिषद्,अवधूतोपनिषद्,नारदपरिव्राजकोपनिषद्
किन्तु तुरीयातीतोपनिषद् की विशिष्टता यह है कि यह संन्यास के बाह्य नियमों की अपेक्षा उसकी परम आध्यात्मिक परिणति—तुरीयातीत अवस्था—पर केन्द्रित है।
उपनिषद् का ऐतिहासिक महत्व
विद्वानों के अनुसार यह उपनिषद् सम्भवतः प्रारम्भिक मध्यकाल (लगभग 10वीं–14वीं शताब्दी) में संकलित हुआ। इसमें विकसित अद्वैत वेदान्त, संन्यास-परम्परा और योगसाधना के प्रभाव स्पष्ट दिखाई देते हैं।
यह ग्रन्थ उस काल का प्रतिनिधित्व करता है जब— वेदान्त,योग,संन्यास तीनों धाराएँ परस्पर समन्वित हो रही थीं।
तुरीयातीतोपनिषद् एक लघु किन्तु अत्यन्त गहन संन्यासोपनिषद् है। इसमें सामान्य धार्मिक जीवन से आगे बढ़कर आत्मज्ञान, वैराग्य, परमहंसत्व और जीवन्मुक्ति की पराकाष्ठा का वर्णन मिलता है। इसका मूल संदेश यह है कि वास्तविक संन्यास बाह्य चिह्नों में नहीं, बल्कि अहंकार, ममता और देहाभिमान के पूर्ण विसर्जन में निहित है। तुरीयातीत अवस्था वही परम स्थिति है जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद समाप्त होकर केवल अखण्ड ब्रह्मस्वरूप शेष रह जाता है। इसी कारण यह उपनिषद् अद्वैत-वेदान्त तथा संन्यास-दर्शन के अध्ययन में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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