चिन्तन -ग्रंथ–२ : ब्रह्माण्ड-अध्याय–11 : आत्मा क्या है? भाग–1 : भूमिका — "मैं कौन हूँ?" : आत्मविद्या का प्रारम्भ
ग्रंथ–२ : ब्रह्माण्ड - अस्तित्व, चेतना और वास्तविकता का दार्शनिक अध्ययन - फ़ाइल–011 - अध्याय–11 : आत्मा क्या है? - भाग–1 : भूमिका — "मैं कौन हूँ?" : आत्मविद्या का प्रारम्भ
मानव
सभ्यता के इतिहास में
कुछ प्रश्न ऐसे हैं जो
समय, संस्कृति, भाषा और परम्परा
की सीमाओं से परे सदैव
जीवित रहे हैं। इनमें
सबसे प्राचीन, सबसे गहन और
सम्भवतः सबसे व्यक्तिगत प्रश्न
है—
"मैं कौन हूँ?"
यह
प्रश्न केवल किसी व्यक्ति
की पहचान (Identity) का नहीं, बल्कि
उसके अस्तित्व (Existence), अनुभव (Experience) और वास्तविकता (Reality) का प्रश्न
है। जब मनुष्य स्वयं
से पूछता है—"मैं कौन हूँ?"—तो वह केवल
अपना नाम, शरीर, व्यवसाय
या सामाजिक परिचय नहीं खोज रहा
होता; वह उस सत्ता
की खोज कर रहा
होता है जो परिवर्तनशील
परिस्थितियों के बीच भी
स्वयं को "मैं" के रूप में
अनुभव करती है।
यही
खोज भारतीय परम्परा में आत्मविद्या (Ātmavidyā /
Knowledge of the Self) के
रूप में विकसित हुई।
उपनिषदों ने इसे समस्त
विद्याओं में सर्वोच्च माना,
क्योंकि उनके अनुसार यदि
मनुष्य स्वयं को जान ले,
तो अस्तित्व के अनेक अन्य
प्रश्न स्वतः स्पष्ट होने लगते हैं।
दूसरी ओर, अनेक दार्शनिक
परम्पराओं ने यह भी
पूछा कि क्या वास्तव
में कोई स्थायी "स्व"
या "आत्मा" है, अथवा यह
केवल अनुभवों, स्मृतियों और मानसिक प्रक्रियाओं
का एक निरन्तर निर्मित
होने वाला बोध है।
इसी
कारण "आत्मा" का प्रश्न केवल
धर्म का विषय नहीं
है। यह दर्शन, मनोविज्ञान,
तंत्रिका-विज्ञान, भाषा-दर्शन, संज्ञान-विज्ञान (Cognitive Science),
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial
Intelligence) और चेतना-अध्ययन (Consciousness
Studies) जैसे अनेक ज्ञानक्षेत्रों का
साझा प्रश्न बन चुका है।
प्रत्येक अनुशासन इसे अपने उपकरणों
और पद्धतियों के माध्यम से
समझने का प्रयास करता
है, किन्तु सभी एक ही
निष्कर्ष पर नहीं पहुँचते।
भारतीय
दार्शनिक परम्पराओं में भी आत्मा
का स्वरूप सर्वत्र समान नहीं है।
वेदों में आत्मा के
संकेत अपेक्षाकृत सूक्ष्म हैं; उपनिषदों में
वह दार्शनिक चिन्तन का केन्द्र बन
जाती है; भगवद्गीता उसे
नित्य, अविनाशी और कर्म-संबद्ध
सत्ता के रूप में
प्रस्तुत करती है। अद्वैत
वेदान्त आत्मा और ब्रह्म की
अभिन्नता का प्रतिपादन करता
है, जबकि विशिष्टाद्वैत और
द्वैत उनके सम्बन्ध की
भिन्न व्याख्या करते हैं। सांख्य
पुरुष को शुद्ध चेतन
द्रष्टा मानता है, योग उसी
पुरुष के साक्षात्कार की
साधना प्रस्तुत करता है, न्याय–वैशेषिक आत्मा को एक स्वतंत्र
द्रव्य के रूप में
स्वीकारते हैं, और मीमांसा
कर्म तथा आत्मा के
सम्बन्ध पर विशिष्ट दृष्टिकोण
विकसित करती है।
इसके
विपरीत, बौद्ध दर्शन का अनात्मवाद (Anātmavāda / Doctrine of Non-Self) आत्मा की स्थायी सत्ता
को स्वीकार नहीं करता। जैन
दर्शन जीव को अनादि,
अनन्त और कर्मबन्धन से
युक्त चेतन द्रव्य मानता
है। कश्मीर शैव दर्शन आत्मा
को परमशिव की स्वप्रकाशित चेतना
का सीमित आविर्भाव मानता है। सिख, संत,
नाथ और सूफ़ी परम्पराएँ
भी आत्मा का विवेचन करती
हैं, किन्तु उनकी भाषाएँ, प्रतीक
और आध्यात्मिक दृष्टियाँ परस्पर भिन्न हैं।
भारतीय
सीमाओं से बाहर भी
आत्मा का प्रश्न उतना
ही महत्त्वपूर्ण रहा है। यूनानी
दार्शनिकों ने आत्मा (Psyche) को
जीवन और ज्ञान का
आधार माना। ईसाई और इस्लामी
दर्शन ने आत्मा को
ईश्वर-प्रदत्त और नैतिक उत्तरदायित्व
से सम्बद्ध सत्ता के रूप में
विकसित किया। आधुनिक पाश्चात्य दर्शन में डेसकार्त ने
आत्मचेतना को ज्ञान का
आधार बनाया, जबकि ह्यूम ने
स्थायी आत्मा के विचार पर
प्रश्न उठाया। कांट, हुसर्ल, हाइडेगर और समकालीन चेतना-दर्शन ने "स्व" (Self) की समस्या को
नए आयाम प्रदान किए।
आधुनिक
विज्ञान का दृष्टिकोण इससे
भिन्न है। मनोविज्ञान व्यक्ति
के व्यक्तित्व, आत्म-अवधारणा (Self-concept) और आत्म-पहचान का अध्ययन करता
है। तंत्रिका-विज्ञान (Neuroscience) मस्तिष्कीय प्रक्रियाओं के माध्यम से
आत्म-अनुभव की व्याख्या करने
का प्रयास करता है। संज्ञान-विज्ञान यह पूछता है
कि "स्व" का अनुभव कैसे
निर्मित होता है। किन्तु
विज्ञान सामान्यतः "आत्मा" को दार्शनिक अथवा
धार्मिक अर्थ में स्वीकार
या अस्वीकार करने के बजाय
केवल उन अनुभवों का
अध्ययन करता है जिन्हें
मापा, परीक्षण किया या पुनरुत्पादित
किया जा सके। इसलिए
विज्ञान जहाँ प्रमाण उपलब्ध
हैं, वहीं तक बोलता
है; और जहाँ प्रमाण
नहीं हैं, वहाँ वह
निर्णय स्थगित रखता है।
इक्कीसवीं
शताब्दी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता
ने इस विमर्श में
एक नया प्रश्न जोड़
दिया है। यदि कोई
यंत्र स्वयं का मॉडल बना
सके, अपने निर्णयों पर
विचार कर सके, अपने
अस्तित्व के विषय में
प्रश्न पूछ सके और
अपने अनुभवों का वर्णन कर
सके, तो क्या उसे
केवल उन्नत संगणना (Computation) कहा जाएगा, या
उसमें किसी प्रकार की
"आत्मता"
(Selfhood) का उदय माना जा
सकता है? यह प्रश्न
अभी खुला है, और
इसके उत्तर पर दर्शन तथा
विज्ञान दोनों में व्यापक विमर्श
जारी है।
इस
अध्याय का उद्देश्य इन
सभी दृष्टियों का निष्पक्ष, तुलनात्मक
और शोधपरक अध्ययन प्रस्तुत करना है। यहाँ
किसी मत की स्थापना
या खण्डन नहीं किया जाएगा।
प्रत्येक परम्परा को उसके अपने
दार्शनिक सन्दर्भ में समझा जाएगा;
उसके तर्कों, सीमाओं और ऐतिहासिक विकास
का विवेचन किया जाएगा; और
जहाँ आधुनिक विज्ञान का संवाद सम्भव
है, वहाँ उस संवाद
को सावधानीपूर्वक प्रस्तुत किया जाएगा। जहाँ
विज्ञान मौन है, वहाँ
उसे मौन ही रहने
दिया जाएगा; और जहाँ दर्शन
अनुमान करता है, वहाँ
अनुमान को प्रमाण के
रूप में प्रस्तुत नहीं
किया जाएगा।
इस
प्रकार यह अध्याय केवल
"आत्मा क्या है?" का
उत्तर खोजने का प्रयास नहीं
करेगा, बल्कि यह भी समझने
का प्रयास करेगा कि मानव इतिहास
में आत्मा का प्रश्न इतना
स्थायी और सार्वभौमिक क्यों
बना रहा। सम्भव है
कि इस यात्रा के
अंत तक कोई एक
अंतिम उत्तर न मिले; किन्तु
यह अवश्य स्पष्ट होगा कि आत्मा
का प्रश्न मानव सभ्यता की
सबसे गहन बौद्धिक और
आध्यात्मिक खोजों में से एक
है—एक ऐसी खोज,
जिसमें मनुष्य स्वयं को समझने का
प्रयास करते हुए ब्रह्माण्ड,
चेतना और वास्तविकता के
रहस्य से भी संवाद
करता है।
मुकेश श्रीवास्तव ,
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र )
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI )
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