चिन्तन - ग्रंथ–२ : ब्रह्माण्ड- अध्याय–11 : आत्मा क्या है? | भाग–6 वेदान्त दर्शन में आत्मा
ग्रंथ–२ : ब्रह्माण्ड — अस्तित्व, चेतना और वास्तविकता का दार्शनिक अध्ययन
फ़ाइल–011
| अध्याय–11 : आत्मा क्या है? | भाग–6
वेदान्त
दर्शन में आत्मा
केन्द्रीय
प्रश्न
यदि
उपनिषद और भगवद्गीता सभी वेदान्त परम्पराओं के मूल आधार-ग्रन्थ हैं, तो फिर अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत तथा अन्य वेदान्त मत आत्मा (Ātman), जीव (Jīva), ब्रह्म (Brahman) और जगत (World) के सम्बन्ध में एक-दूसरे से भिन्न निष्कर्षों तक कैसे पहुँचते हैं?
भारतीय
दर्शन के इतिहास में
यदि किसी परम्परा ने
आत्मा के प्रश्न पर
सबसे व्यापक, सबसे गहन और
सबसे प्रभावशाली चिन्तन किया है, तो
वह वेदान्त (Vedānta) है।
"वेदान्त" का
शाब्दिक अर्थ है—वेदों
का अन्त। किन्तु यहाँ
"अन्त" का अर्थ केवल
अंतिम भाग नहीं, बल्कि
परम निष्कर्ष (Ultimate
Conclusion) भी है। इसी कारण
उपनिषदों को वेदान्त कहा
गया और बाद में
उन्हीं पर आधारित दार्शनिक
परम्पराओं को भी "वेदान्त"
नाम मिला।
वेदान्त
का आधार सामान्यतः तीन
ग्रन्थों को माना जाता
है, जिन्हें प्रस्थानत्रयी
(Prasthānatrayī) कहा
जाता है—
- उपनिषद — श्रुति प्रस्थान (Śruti
Prasthāna)
- भगवद्गीता — स्मृति प्रस्थान (Smṛti Prasthāna)
- ब्रह्मसूत्र — न्याय प्रस्थान (Nyāya
Prasthāna)
इन तीनों ग्रन्थों को सभी प्रमुख
वेदान्ताचार्य स्वीकार करते हैं। फिर
भी उनके निष्कर्ष भिन्न
हैं।
यही
तथ्य वेदान्त को अत्यन्त रोचक
बनाता है। मतभेद ग्रन्थों में नहीं है।
मतभेद व्याख्या
(Interpretation) में
है।
अतः
वेदान्त का अध्ययन केवल
सिद्धान्तों का अध्ययन नहीं,
बल्कि व्याख्या-दर्शन (Hermeneutics) का भी अध्ययन
है।
वेदान्त
का मूल प्रश्न
वेदान्त
का सम्पूर्ण दर्शन मूलतः चार प्रश्नों के
इर्द-गिर्द घूमता है—
- ब्रह्म क्या है? , आत्मा क्या है? जगत क्या है?, मोक्ष कैसे सम्भव है?
इन चारों प्रश्नों का उत्तर परस्पर
सम्बद्ध है।
यदि
आत्मा और ब्रह्म एक
हैं, तो मोक्ष का
अर्थ भिन्न होगा।
यदि
आत्मा और ब्रह्म अलग
हैं, तो मोक्ष की
प्रकृति भी बदल जाएगी।
इसीलिए
वेदान्त में आत्मा का
प्रश्न केवल मनुष्य का
प्रश्न नहीं है; वह
सम्पूर्ण अस्तित्व की व्याख्या का
केन्द्र है।
प्रमुख
आचार्य - आदि शंकराचार्य (आठवीं शताब्दी ई.)
मूल
सिद्धान्त - अद्वैत का अर्थ है—
"द्वैत नहीं है।" अर्थात् अन्तिम सत्य केवल एक
है। वही ब्रह्म है। वही आत्मा है।
उपनिषदों
के महावाक्य— "अहं ब्रह्मास्मि", "तत्त्वमसि" , "अयमात्मा ब्रह्म"
अद्वैत
के अनुसार वास्तविक अर्थ में जीव
और ब्रह्म की अभिन्नता का
प्रतिपादन करते हैं।
जीव
और आत्मा - शंकराचार्य के अनुसार—
- आत्मा कभी बन्धन में नहीं पड़ती।
- बन्धन केवल अविद्या (Ignorance)
के कारण प्रतीत होता है।
- जीव (व्यक्तिगत सत्ता) आत्मा का वास्तविक रूप नहीं, बल्कि उपाधियों (शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार) से युक्त प्रतीत होने वाला स्वरूप है।
उदाहरण
के लिए—
जैसे
एक ही सूर्य अनेक
जलाशयों में अलग-अलग
प्रतिबिम्बित दिखाई देता है, वैसे
ही एक ही आत्मा
अनेक जीवों के रूप में
प्रतीत होती है।
मोक्ष -
मोक्ष कोई नई अवस्था
प्राप्त करना नहीं है।
मोक्ष
है— स्वयं को ब्रह्मरूप में जान लेना।
ज्ञान
(Jñāna) ही मोक्ष का साधन है।
विशिष्टाद्वैत वेदान्त (Viśiṣṭādvaita Vedānta)
प्रमुख
आचार्य - रामानुजाचार्य
(11वीं–12वीं शताब्दी)
मूल
सिद्धान्त - विशिष्टाद्वैत का अर्थ है—
विशेषणों सहित अद्वैत।
रामानुज
के अनुसार— ब्रह्म एक ही है।
किन्तु जीव और जगत उसकी
वास्तविक विशेषताएँ (Attributes) हैं।
वे मिथ्या नहीं हैं।
आत्मा
का स्वरूप - जीव वास्तविक है।
उसका अस्तित्व शाश्वत है। किन्तु वह ब्रह्म से
पूर्णतः स्वतंत्र नहीं है।
रामानुज
जीव और ब्रह्म के
सम्बन्ध को शरीर और
आत्मा के सम्बन्ध से
समझाते हैं।
जैसे
शरीर आत्मा पर आश्रित है,
वैसे ही जीव और
जगत ब्रह्म पर आश्रित हैं।
मोक्ष -
मोक्ष में जीव अपनी
व्यक्तिगत पहचान खोता नहीं।
वह ब्रह्म की निकटता और
दिव्य आनन्द का अनुभव करता
है।
भक्ति
यहाँ प्रमुख साधन है।
द्वैत
वेदान्त (Dvaita
Vedānta)
प्रमुख
आचार्य - मध्वाचार्य
(13वीं शताब्दी)
मूल
सिद्धान्त - मध्वाचार्य के अनुसार— जीव
और ब्रह्म सदैव भिन्न हैं।
उनके बीच वास्तविक और शाश्वत भेद
है।
पंचभेद
सिद्धान्त - मध्व पाँच प्रकार
के भेद स्वीकार करते
हैं—
- जीव और ब्रह्म में भेद, जीव और जीव में भेद, जीव और जगत में भेद, ब्रह्म और जगत में भेद, जगत के विभिन्न पदार्थों में भेद
यह सिद्धान्त अद्वैत से मौलिक रूप
से भिन्न है।
मोक्ष -
मोक्ष में भी जीव
ब्रह्म नहीं बनता। वह ईश्वर
की कृपा से दुःख
से मुक्त होकर परम आनन्द
प्राप्त करता है।
द्वैताद्वैत वेदान्त (Dvaitādvaita)
प्रमुख
आचार्य – निम्बार्काचार्य
-निम्बार्क के अनुसार— जीव
और ब्रह्म— भिन्न भी हैं और अभिन्न भी।
यह विरोधाभास नहीं, बल्कि सम्बन्ध की दो भिन्न
दृष्टियाँ हैं।
जैसे—
सूर्य और उसकी किरणें।
किरण सूर्य से अलग भी
है और उसी पर
निर्भर भी।
शुद्धाद्वैत (Śuddhādvaita)
प्रमुख
आचार्य – वल्लभाचार्य -
वल्लभाचार्य
जगत को माया या
मिथ्या नहीं मानते।
उनके
अनुसार— संसार स्वयं ब्रह्म की लीला (Divine Manifestation) है। जीव भी उसी ब्रह्म
का वास्तविक अंश है।
मोक्ष
का सर्वोच्च रूप है— भगवत्
प्रेम।
अचिन्त्यभेदाभेद (Acintya Bhedābheda)
प्रमुख
प्रतिपादक - श्रीचैतन्य
महाप्रभु की परम्परा -इस मत के
अनुसार— जीव और ब्रह्म—
न केवल भिन्न हैं,न केवल अभिन्न।
उनका
सम्बन्ध— अचिन्त्य (मानवीय बुद्धि से परे) भेद और अभेद का है।
यह सम्बन्ध तर्क से पूर्णतः
व्यक्त नहीं किया जा
सकता। इसे आध्यात्मिक अनुभूति के माध्यम से
समझा जाता है।
वेदान्त
मतों की तुलनात्मक सारणी
|
प्रश्न |
अद्वैत |
विशिष्टाद्वैत |
द्वैत |
द्वैताद्वैत |
शुद्धाद्वैत |
अचिन्त्यभेदाभेद |
|
आत्मा और ब्रह्म |
पूर्ण अभिन्न |
आश्रित अभिन्नता |
पूर्ण भिन्न |
भिन्न भी, अभिन्न भी |
ब्रह्म का वास्तविक स्वरूप |
अचिन्त्य भेद-अभेद |
|
जगत |
व्यावहारिक सत्य, परम दृष्टि से माया |
वास्तविक |
वास्तविक |
वास्तविक |
वास्तविक |
वास्तविक |
|
मोक्ष |
आत्मब्रह्मैक्य का ज्ञान |
ईश्वर-सान्निध्य |
ईश्वर की कृपा से मुक्ति |
ब्रह्मानुभूति |
भगवत् प्रेम |
प्रेमपूर्ण ईश्वरानुभूति |
|
प्रमुख साधन |
ज्ञान |
भक्ति |
भक्ति |
भक्ति-ज्ञान |
भक्ति |
भक्ति |
दार्शनिक विश्लेषण
वेदान्त
का अध्ययन यह स्पष्ट करता
है कि एक ही
मूल ग्रन्थों से भिन्न-भिन्न
दार्शनिक निष्कर्ष निकल सकते हैं।
यह केवल मतभेद नहीं
है।
यह भारतीय दार्शनिक परम्परा की व्याख्यात्मक समृद्धि (Interpretive
Pluralism) का उदाहरण है।
सभी
वेदान्ताचार्य— उपनिषद स्वीकार करते हैं।भगवद्गीता स्वीकार
करते हैं। ब्रह्मसूत्र स्वीकार करते हैं।
फिर
भी— उनकी आत्मा की
अवधारणा अलग है।
इससे
यह भी स्पष्ट होता
है कि भारतीय दर्शन
में प्रमाण (Authority) जितना महत्त्वपूर्ण है, उतनी ही
महत्त्वपूर्ण उसकी व्याख्या (Interpretation)
भी है।
आलोचनात्मक समीक्षा
आधुनिक
दार्शनिक दृष्टि से वेदान्त के
सम्बन्ध में कुछ बातें
ध्यान देने योग्य हैं—
- वेदान्त का मूल उद्देश्य अनुभवजन्य विज्ञान (Empirical
Science) का निर्माण नहीं, बल्कि परम वास्तविकता की दार्शनिक व्याख्या है।
- विभिन्न
वेदान्त मत समान ग्रन्थों पर आधारित होते हुए भी भिन्न निष्कर्षों तक पहुँचते हैं; अतः उन्हें एकरूप परम्परा मानना उचित नहीं।
- आधुनिक
चेतना-अध्ययन में कभी-कभी अद्वैत वेदान्त की तुलना कुछ समकालीन सिद्धान्तों से की जाती है, किन्तु ऐसी तुलनाएँ सावधानीपूर्वक की जानी चाहिए। दोनों की पद्धति, उद्देश्य और प्रमाण-प्रणाली मूलतः भिन्न हैं।
- वेदान्त के सिद्धान्त दार्शनिक और आध्यात्मिक प्रतिपादन हैं; इन्हें आधुनिक वैज्ञानिक निष्कर्षों के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
वेदान्त
भारतीय आत्मदर्शन का सबसे विकसित
दार्शनिक रूप है। यहाँ
आत्मा केवल व्यक्ति की
अन्तःसत्ता नहीं रहती, बल्कि
ब्रह्म, जगत, ज्ञान, मोक्ष
और मानव जीवन के
अंतिम उद्देश्य के साथ उसके
सम्बन्ध का गहन विश्लेषण
किया जाता है।
यद्यपि
अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत और अन्य वेदान्त
मत आत्मा की प्रकृति पर
एकमत नहीं हैं, फिर
भी वे एक साझा
आधार स्वीकार करते हैं—
कि
मनुष्य का वास्तविक स्वरूप
केवल शरीर, मन और अहंकार
तक सीमित नहीं है, और
आत्मा के ज्ञान का
प्रश्न मानव जीवन के
सबसे महत्त्वपूर्ण दार्शनिक प्रश्नों में से एक
है।
यही
विविधता वेदान्त को एक स्थिर
सिद्धान्त नहीं, बल्कि एक जीवंत दार्शनिक
परम्परा बनाती है।
मुकेश श्रीवास्तव ,
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र )
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