चिंतन - अध्याय–12 : कर्म क्या है? भाग–4 : ब्राह्मण ग्रन्थों में कर्म
चिंतन - अध्याय–12 : कर्म क्या है? भाग–4 : ब्राह्मण ग्रन्थों में कर्म
कर्म
का अनुष्ठान से सिद्धान्त की ओर विकास
यदि
वेदों में कर्म का
स्वरूप मुख्यतः यज्ञ, क्रिया और ब्रह्माण्डीय व्यवस्था से सम्बद्ध था,
तो ब्राह्मण-ग्रन्थों में वही कर्म
अधिक व्यवस्थित, विश्लेषित और दार्शनिक रूप
ग्रहण करने लगता है।
भारतीय कर्म-दर्शन के
इतिहास में ब्राह्मण-ग्रन्थ
एक संक्रमणकाल का प्रतिनिधित्व करते
हैं। यहाँ कर्म केवल
किया जाने वाला कार्य
नहीं रह जाता; वह
एक ऐसी विधिसम्मत प्रक्रिया
बन जाता है, जिसके
परिणामों को निश्चित और
नियमबद्ध माना जाता है।
ब्राह्मण-ग्रन्थों का मुख्य उद्देश्य
वेदों में वर्णित यज्ञों
की व्याख्या करना, उनकी विधि, उद्देश्य
और दार्शनिक आधार को स्पष्ट
करना है। किन्तु इन
ग्रन्थों का महत्त्व केवल
इतना ही नहीं है।
यहीं पहली बार यह
विचार अधिक स्पष्ट रूप
में सामने आता है कि
कर्म और फल के बीच एक आन्तरिक सम्बन्ध है, चाहे वह सम्बन्ध
तत्काल दिखाई दे या न
दे।
यज्ञ
की प्रत्येक क्रिया—मन्त्र, आहुति, समय, पात्र, विधि
और अनुष्ठान—को अत्यन्त सावधानी
से सम्पन्न करने पर बल
दिया गया। इसका कारण
केवल धार्मिक अनुशासन नहीं था, बल्कि
यह विश्वास था कि ब्रह्माण्ड
नियमों से संचालित होता है, इसलिए नियमपूर्वक किया गया कर्म ही अपेक्षित परिणाम उत्पन्न करता है।
यहीं
से भारतीय चिन्तन में एक अत्यन्त
प्रभावशाली विचार विकसित होने लगता है—कर्म का प्रभाव केवल दृश्य (Visible) नहीं होता; उसका एक अदृश्य (Invisible) आयाम भी हो सकता है। बाद में पूर्वमीमांसा
इस अदृश्य प्रभाव को "अपूर्व" (Apūrva) की संकल्पना द्वारा
व्यवस्थित रूप देती है,
किन्तु उसका प्रारम्भिक संकेत
ब्राह्मण-ग्रन्थों में ही दिखाई
देता है।
इसका
अर्थ यह नहीं कि
ब्राह्मण-ग्रन्थ आधुनिक अर्थों में "कर्म-सिद्धान्त" प्रस्तुत
करते हैं। उनका प्रमुख
सरोकार अभी भी यज्ञ
और अनुष्ठान है। किन्तु उन्होंने
एक ऐसा दार्शनिक प्रश्न
अवश्य स्थापित किया, जिसने आगे की सम्पूर्ण
भारतीय परम्परा को प्रभावित किया—
क्या
प्रत्येक विधिसम्मत कर्म का कोई अनिवार्य परिणाम होता है, भले ही वह परिणाम तत्काल प्रत्यक्ष न हो?
यही
प्रश्न आगे चलकर मीमांसा
में दार्शनिक सिद्धान्त बनता है, उपनिषदों
में नैतिक और आध्यात्मिक अर्थ
ग्रहण करता है, तथा
भगवद्गीता में कर्तव्य और
निष्काम कर्म के रूप
में पुनर्व्याख्यायित होता है।
ब्राह्मण-ग्रन्थों की एक और
विशेषता यह है कि
वे कर्म को केवल
व्यक्तिगत क्रिया के रूप में
नहीं देखते। यज्ञ एक सामूहिक
उपक्रम है, जिसमें यजमान,
ऋत्विज, परिवार और समुदाय सभी
सहभागी होते हैं। इस
प्रकार कर्म का सामाजिक
आयाम भी स्पष्ट होने
लगता है। यहाँ व्यक्ति
का कर्म केवल उसका
निजी कार्य नहीं, बल्कि व्यापक वैदिक व्यवस्था का अंग है।
इस
स्तर पर यह भी
ध्यान रखना आवश्यक है
कि ब्राह्मण-ग्रन्थों में कर्म का
मूल्यांकन अभी मुख्यतः विधि
के आधार पर है,
नैतिक अभिप्राय (Moral Intention)
के आधार पर नहीं।
बाद के उपनिषद, बौद्ध
दर्शन और भगवद्गीता में
कर्ता की आन्तरिक अवस्था,
ज्ञान, संकल्प और भाव को
अधिक महत्त्व मिलता है। इसलिए ब्राह्मण-ग्रन्थ भारतीय कर्म-विचार का
अंतिम चरण नहीं, बल्कि
एक आवश्यक मध्यवर्ती सोपान हैं।
दार्शनिक
योगदान
ब्राह्मण-ग्रन्थों ने भारतीय कर्म-विचार को पाँच महत्त्वपूर्ण
योगदान दिए—
- कर्म
को विधिसम्मत और नियमबद्ध प्रक्रिया के रूप में स्थापित किया।
- कर्म
और फल के बीच अनिवार्य सम्बन्ध की धारणा को सुदृढ़ किया।
- दृश्य
और अदृश्य परिणामों के प्रश्न को जन्म दिया।
- व्यक्तिगत
कर्म को सामूहिक और वैदिक व्यवस्था से जोड़ा।
- आगे
चलकर मीमांसा और वेदान्त के कर्म-विवेचन के लिए आधारभूमि तैयार की।
दार्शनिक
निष्कर्ष
यदि
वेदों ने कर्म को
ब्रह्माण्डीय व्यवस्था के अनुरूप क्रिया के रूप में
प्रस्तुत किया, तो ब्राह्मण-ग्रन्थों
ने उसे नियमबद्ध, फलोन्मुख और सिद्धान्तगत अनुष्ठान के रूप में
विकसित किया। यहीं से भारतीय
दर्शन में यह प्रश्न
स्थायी रूप से स्थापित
हो जाता है कि
क्या कोई भी कर्म बिना परिणाम के रह सकता है?
प्रमुख
दार्शनिक प्रश्न
यदि
कर्म का परिणाम तत्काल दिखाई नहीं देता, तो क्या उसके अस्तित्व को स्वीकार करने के लिए किसी अदृश्य सिद्धान्त की आवश्यकता है?
यही
प्रश्न अगले चरण—पूर्वमीमांसा
के "अपूर्व" सिद्धान्त, और उससे पहले
आरण्यकों तथा उपनिषदों में कर्म की आन्तरिक पुनर्व्याख्या का आधार बनेगा।
मुकेश श्रीवास्तव ,
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र )
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI )
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