चिंतन भाग–13 : वैश्विक दर्शन में अंतिम वास्तविकता (Ultimate Reality) उपभाग–1 : प्राचीन यूनानी दर्शन — जगत का मूल तत्त्व क्या है?

 चिंतन भाग–13 : वैश्विक दर्शन में अंतिम वास्तविकता (Ultimate Reality) -उपभाग–1 : प्राचीन यूनानी दर्शनजगत का मूल तत्त्व क्या है?


जब हम "ब्रह्म" का प्रश्न पूछते हैं, तो यह केवल भारतीय दर्शन का प्रश्न नहीं होता।

मानव सभ्यता जहाँ भी विकसित हुई, वहाँ मनुष्य ने आकाश की ओर देखकर, प्रकृति को देखकर और स्वयं को देखकर यही पूछाइस सबका मूल क्या है?

भारत में इस प्रश्न ने ब्रह्म, आत्मा और पुरुष जैसी अवधारणाओं को जन्म दिया।

यूनान में इसी प्रश्न ने एक भिन्न दार्शनिक यात्रा का आरम्भ किया।

वहाँ प्रश्न थासंसार का मूल तत्त्व (Archē) क्या है?

यही प्रश्न पश्चिमी दर्शन की आधारशिला बना।

 मिथक से दर्शन की ओर

प्राचीन यूनानी समाज में भी प्रारम्भिक उत्तर मिथकीय थे।

देवताओं की कथाओं के माध्यम से जगत की उत्पत्ति समझाई जाती थी।

किन्तु लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व में कुछ विचारकों ने एक नया मार्ग अपनाया।

उन्होंने पूछा— क्या जगत को केवल मिथकों से नहीं, बल्कि तर्क और निरीक्षण से भी समझा जा सकता है?

यहीं से पश्चिमी दर्शन का जन्म हुआ।

थेलीस : जल को मूल तत्त्व मानना

यूनानी दार्शनिक Thales ने कहा कि जगत का मूल तत्त्व जल है।

आज यह विचार वैज्ञानिक दृष्टि से स्वीकार्य नहीं माना जाता, किन्तु इसका ऐतिहासिक महत्व अत्यन्त गहरा है।

पहली बार किसी दार्शनिक ने प्राकृतिक जगत की व्याख्या प्रकृति के भीतर ही खोजने का प्रयास किया।

यह मिथकीय व्याख्या से दार्शनिक और प्राकृतिक व्याख्या की ओर पहला निर्णायक कदम था।

एनाक्सिमैण्डर : 'अपैरॉन' (Apeiron)

थेलीस के बाद Anaximander ने प्रश्न को और गहरा किया।

उन्होंने कहा कि यदि जल मूल तत्त्व है, तो स्वयं जल कहाँ से आया?

इसलिए उन्होंने एक ऐसे अनिश्चित, असीम और अव्यक्त मूल सिद्धान्त की कल्पना की जिसे Apeiron कहा गया।

Apeiron का अर्थ हैजो सीमित नहीं है, जो किसी एक विशेष रूप में बँधा नहीं है।

यद्यपि यह उपनिषदों के ब्रह्म के समान नहीं है, फिर भी यह विचार इतिहास में पहली बार किसी निराकार मूल सिद्धान्त की खोज का संकेत देता है।

एनाक्सीमेनीज़ : वायु का सिद्धान्त

Anaximenes ने वायु को जगत का मूल तत्त्व माना।

उनके अनुसार संघनन और विरलन की प्रक्रियाओं से विविध पदार्थों की उत्पत्ति होती है।

यह विचार आज भौतिक विज्ञान नहीं है, किन्तु इसमें यह महत्वपूर्ण संकेत था कि विविधता किसी मूलभूत सिद्धान्त से विकसित हो सकती है।

हेराक्लाइटस : परिवर्तन ही सत्य है

Heraclitus ने कहासब कुछ प्रवाहमान है।

कोई भी वस्तु स्थिर नहीं।

परिवर्तन ही जगत का नियम है।

उन्होंने अग्नि को परिवर्तन का प्रतीक माना और Logos की अवधारणा प्रस्तुत कीएक ऐसा सार्वभौमिक सिद्धान्त जो इस परिवर्तन में व्यवस्था बनाए रखता है।

यहाँ पहली बार पश्चिमी दर्शन में "व्यवस्था" और "परिवर्तन" को एक साथ समझने का प्रयास दिखाई देता है।

पार्मेनिदीस : परिवर्तन भ्रम है?

यदि हेराक्लाइटस परिवर्तन को मूल मानते हैं, तो Parmenides ठीक विपरीत दिशा में जाते हैं।

उनके अनुसार'जो है', वही है।

वास्तविक अस्तित्व उत्पन्न होता है, नष्ट होता है, बदलता है।

परिवर्तन हमारी इन्द्रियों का अनुभव हो सकता है, किन्तु बुद्धि बताती है कि सत्य एक और अपरिवर्तनशील है।

यह विचार आश्चर्यजनक रूप से हमें भारतीय दर्शन के कुछ प्रश्नों की याद दिलाता है, यद्यपि दोनों परम्पराओं का ऐतिहासिक विकास स्वतंत्र रहा।

प्रारम्भिक यूनानी दर्शन का दार्शनिक महत्व

इन प्रारम्भिक दार्शनिकों ने किसी एक मत पर सहमति नहीं बनाई।

किन्तु उन्होंने मानव चिन्तन को एक नई दिशा दी।

उन्होंने यह स्थापित किया कि

  • जगत के पीछे कोई मूल सिद्धान्त हो सकता है।
  • उस सिद्धान्त की खोज तर्क से की जा सकती है।
  • प्राकृतिक जगत स्वयं दार्शनिक अनुसन्धान का विषय है।

इसी आधार पर आगे प्लेटो, अरस्तू और प्लोटिनस जैसे महान दार्शनिकों का विकास सम्भव हुआ।

 

'चिंतन' की टिप्पणी

प्राचीन यूनानी दर्शन का सबसे बड़ा योगदान किसी विशेष उत्तर में नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने की उसकी पद्धति में है।

भारत और यूनान, दोनों ने अलग-अलग सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों में एक ही मूल प्रश्न उठाया

"वास्तविकता का आधार क्या है?"

अंतर केवल इतना था कि भारत में यह प्रश्न धीरे-धीरे चेतना और आत्मा की ओर बढ़ा, जबकि यूनान में यह पहले प्रकृति और अस्तित्व के मूल तत्त्व की खोज के रूप में विकसित हुआ।

दोनों यात्राएँ आगे चलकर गहरे दार्शनिक बिन्दुओं पर एक-दूसरे के निकट आती दिखाई देती हैं, किन्तु दोनों की ऐतिहासिक दिशाएँ स्वतंत्र हैं।

इस भाग का सार

प्राचीन यूनानी दर्शन ने मिथकीय व्याख्याओं से आगे बढ़कर जगत के मूल सिद्धान्त (Archē) की दार्शनिक खोज प्रारम्भ की। थेलीस, एनाक्सिमैण्डर, एनाक्सीमेनीज़, हेराक्लाइटस और पार्मेनिदीस ने विभिन्न उत्तर दिए, किन्तु उनका साझा योगदान यह था कि उन्होंने वास्तविकता के प्रश्न को तर्क और निरीक्षण के आधार पर समझने का प्रयास किया। यही प्रयास आगे चलकर पश्चिमी तत्त्वमीमांसा की आधारभूमि बना।

मुकेश ,,,,,,,

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