चिंतन -भाग–13 : वैश्विक दर्शन में अंतिम वास्तविकता (Ultimate Reality) उपभाग–2 : प्लेटो और प्लोटिनस — "The Good" और "The One"

 चिंतन -भाग–13 : वैश्विक दर्शन में अंतिम वास्तविकता (Ultimate Reality)

उपभाग–2 : प्लेटो और प्लोटिनस — "The Good" और "The One"


प्रारम्भिक यूनानी दार्शनिकों ने जगत के मूल तत्त्व की खोज की।

किसी ने जल को आधार माना, किसी ने वायु को,किसी ने अनन्त (Apeiron) को,और किसी ने परिवर्तन या अपरिवर्तनशील अस्तित्व को।

किन्तु इन सभी विचारों के बाद एक नया प्रश्न उभरा

क्या वास्तविकता का कोई ऐसा सर्वोच्च सिद्धान्त है जो केवल पदार्थ का कारण ही नहीं, बल्कि सत्य, ज्ञान और मूल्य का भी आधार हो?

इस प्रश्न का पहला महान उत्तर प्लेटो ने दिया।

और उसी उत्तर को एक गहन आध्यात्मिक तत्त्वमीमांसा में विकसित किया प्लोटिनस ने।

 

प्लेटो : दृश्य जगत और रूपों (Forms) का जगत

Plato के अनुसार हमारी इन्द्रियों से दिखाई देने वाला संसार निरन्तर परिवर्तनशील है।

जो बदलता रहता है, वह पूर्ण ज्ञान का आधार नहीं बन सकता।

इसलिए प्लेटो ने कहा कि प्रत्येक वस्तु के पीछे उसका एक शाश्वत रूप (Form / Idea) है।

सुन्दर वस्तुएँ बदल सकती हैं, किन्तु 'सौन्दर्य' का शाश्वत रूप नहीं बदलता।

न्यायपूर्ण समाज बदल सकते हैं,किन्तु 'न्याय' का आदर्श रूप स्थिर रहता है।

इस प्रकार प्लेटो के लिए वास्तविकता का उच्चतर स्तर इन्द्रियग्राह्य संसार नहीं, बल्कि रूपों का बौद्धिक जगत है।

 

'The Good' : सर्वोच्च सिद्धान्त

प्लेटो के दर्शन में सभी रूपों से भी ऊपर एक सर्वोच्च सिद्धान्त हैThe Good (परम शुभ)

यह केवल नैतिक अर्थ में 'अच्छाई' नहीं है।

यह वह अंतिम सिद्धान्त है जिसके कारण सत्य को जाना जा सकता है और अस्तित्व को अर्थ मिलता है।

जिस प्रकार सूर्य दृश्य जगत को प्रकाश देता है,

उसी प्रकार The Good ज्ञान और वास्तविकता दोनों को सम्भव बनाता है।

यह प्लेटो की तत्त्वमीमांसा का सर्वोच्च बिन्दु है।

किन्तु यह ध्यान रखना आवश्यक है कि प्लेटो ने The Good को भारतीय अर्थ में चेतन ब्रह्म के रूप में प्रस्तुत नहीं किया।

उसकी भूमिका भिन्न दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में विकसित हुई है।

 

प्लोटिनस : 'The One' की अवधारणा

लगभग पाँच शताब्दियों बाद Plotinus ने प्लेटो की परम्परा को एक नई ऊँचाई दी।

उनके दर्शन को आज Neoplatonism कहा जाता है।

प्लोटिनस के अनुसार अंतिम वास्तविकता हैThe One (एकमात्र परम सिद्धान्त)

The One किसी वस्तु की तरह नहीं है।

वह अस्तित्व की सामान्य श्रेणियों से भी परे है।

उसे किसी परिभाषा में पूरी तरह बाँधा नहीं जा सकता।

वह पूर्ण, निरपेक्ष और समस्त वास्तविकता का स्रोत है।

 

The One से जगत का उद्भव

प्लोटिनस के अनुसार जगत का उद्भव किसी यांत्रिक निर्माण या समय-विशेष में हुई सृष्टि नहीं है।

वास्तविकता एक क्रमिक उद्भव (Emanation) के रूप में समझी जाती है।

The One से Nous (बुद्धि) प्रकट होती है।

Nous से World Soul (विश्व-आत्मा) का उद्भव होता है।

और उसी से प्रकृति तथा दृश्य जगत की विविधता प्रकट होती है।

यह प्रक्रिया किसी बाहरी इच्छा या निर्माण-कर्म के समान नहीं, बल्कि पूर्णता की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है।

 

क्या The One 'ब्रह्म' है?

यह प्रश्न अत्यन्त आकर्षक है, किन्तु इसका उत्तर सावधानी से देना चाहिए।

पहली दृष्टि में दोनों अवधारणाओं में कुछ समानताएँ दिखाई देती हैं

दोनों अंतिम सिद्धान्त की चर्चा करते हैं।

दोनों सामान्य वस्तुओं से परे हैं।

दोनों समस्त अस्तित्व के आधार की खोज करते हैं।

किन्तु यहीं रुक जाना चाहिए।

दोनों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, भाषिक परम्परा, आध्यात्मिक लक्ष्य और दार्शनिक तर्क-पद्धति भिन्न हैं।

इसलिए The One को सीधे "ब्रह्म" कहना उतना ही अनुचित होगा, जितना ब्रह्म को केवल The One का भारतीय रूप कहना।

इन दोनों के बीच संवाद सम्भव है, परन्तु अभिन्नता का दावा ऐतिहासिक और दार्शनिक दृष्टि से उचित नहीं।

 

दार्शनिक महत्व

प्लेटो और प्लोटिनस ने पश्चिमी दर्शन में अंतिम वास्तविकता के प्रश्न को केवल भौतिक जगत से ऊपर उठाकर तत्त्वमीमांसा के उच्चतम स्तर तक पहुँचाया।

उनके कारण पश्चिमी परम्परा में यह विचार विकसित हुआ कि दृश्य संसार अंतिम सत्य नहीं हो सकता; उसके पीछे कोई गहरा सिद्धान्त होना चाहिए।

यह प्रश्न आगे चलकर ईसाई दर्शन, मध्ययुगीन तत्त्वमीमांसा और आधुनिक यूरोपीय दर्शन को गहराई से प्रभावित करता है।

 

'चिंतन' की टिप्पणी

प्लेटो और प्लोटिनस का अध्ययन हमें यह समझने में सहायता करता है कि मानव सभ्यता की विभिन्न धाराओं ने स्वतंत्र रूप से अंतिम वास्तविकता के प्रश्न पर गम्भीर चिन्तन किया।

यह समानता किसी ऐतिहासिक निर्भरता का प्रमाण नहीं, बल्कि इस तथ्य का संकेत है कि मनुष्य जहाँ भी गहरे प्रश्न पूछता है, वहाँ वह अनुभव की सतह से आगे बढ़कर किसी व्यापक आधार की खोज करता है।

यही खोज भारतीय ब्रह्म-विमर्श और यूनानी तत्त्वमीमांसा के बीच भविष्य के दार्शनिक संवाद की आधारभूमि बनती है।

इस भाग का सार

प्लेटो ने परिवर्तनशील जगत के पीछे शाश्वत रूपों तथा उनसे भी ऊपर The Good की अवधारणा प्रस्तुत की। प्लोटिनस ने इस विचार को विकसित करते हुए The One को समस्त अस्तित्व का परम स्रोत माना, जिससे क्रमिक उद्भव के माध्यम से बुद्धि, विश्व-आत्मा और जगत की अभिव्यक्ति होती है। यद्यपि The One और भारतीय ब्रह्म के बीच कुछ वैचारिक समानताएँ दिखाई देती हैं, दोनों को समान मानना उचित नहीं। दोनों की तुलना आगे समग्र तुलनात्मक अध्ययन में अधिक सावधानी से की जाएगी।

मुकेश ,,,,,,,

 

 

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