चिंतन - भाग–13 : वैश्विक दर्शन में अंतिम वास्तविकता (Ultimate Reality) उपभाग–3 : चीनी दर्शन — ताओ (Dao)

 चिंतन - भाग–13 : वैश्विक दर्शन में अंतिम वास्तविकता (Ultimate Reality)

उपभाग–3 : चीनी दर्शन — ताओ (Dao) : क्या अंतिम वास्तविकता एक मार्ग, एक नियम या एक जीवित प्रक्रिया है?


यदि भारतीय दर्शन का मूल प्रश्न था— "ब्रह्म क्या है?"

और यूनानी दर्शन पूछता था— "जगत का मूल तत्त्व क्या है?"

तो प्राचीन चीन में एक भिन्न प्रश्न विकसित हुआ—

"विश्व की स्वाभाविक व्यवस्था क्या है, और मनुष्य उसके साथ सामंजस्य कैसे स्थापित करे?"

यहीं से ताओ (Dao) की अवधारणा जन्म लेती है।

ताओ केवल एक दार्शनिक सिद्धान्त नहीं है; वह अस्तित्व, प्रकृति, जीवन और आचरण को एक ही सूत्र में देखने का प्रयास है।

 ताओ का अर्थ क्या है?

चीनी शब्द Dao (ताओ) का सामान्य अर्थ है— मार्ग, पथ, रीति, या चलने का स्वाभाविक क्रम

किन्तु दार्शनिक अर्थ में ताओ इससे कहीं अधिक व्यापक है।

यह किसी सड़क या दिशा का नाम नहीं है।

यह वह मौलिक व्यवस्था है जिसके अनुसार सम्पूर्ण प्रकृति स्वतः संचालित होती है।

ताओ को किसी व्यक्ति, देवता या सृष्टिकर्ता के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाता।

वह न तो केवल पदार्थ है और न ही केवल विचार।

वह वह आधार है जिसके कारण समस्त परिवर्तन, संतुलन और जीवन सम्भव होते हैं।

 लाओत्से और 'ताओ ते चिंग'

ताओवाद की प्रमुख परम्परा का श्रेय Laozi (लाओत्से) को दिया जाता है, जिनके नाम से संबद्ध ग्रन्थ Tao Te Ching चीनी दर्शन का एक आधारभूत ग्रन्थ माना जाता है।

इस ग्रन्थ का प्रारम्भ ही एक गहन दार्शनिक सावधानी से होता है—

"जिस ताओ को शब्दों में पूरी तरह कहा जा सके, वह शाश्वत ताओ नहीं है।"

इस कथन का आशय यह नहीं कि ताओ रहस्यवाद का विषय मात्र है।

यह भाषा की सीमा की ओर संकेत करता है।

कुछ वास्तविकताएँ ऐसी होती हैं जिन्हें भाषा संकेतित कर सकती है, परन्तु पूरी तरह बाँध नहीं सकती।

 ताओ : सृष्टिकर्ता नहीं, आधारभूत व्यवस्था

ताओवाद में ताओ को सामान्य अर्थ में "ईश्वर" नहीं कहा गया।

वह इच्छापूर्वक जगत की रचना करने वाला कोई व्यक्तित्व नहीं है।

ताओ से संसार का उद्भव होता है, किन्तु यह उद्भव किसी बाहरी निर्माण-कर्म की तरह नहीं समझा जाता।

ताओ स्वयं प्रकृति के स्वस्फूर्त क्रम (Natural Order) का आधार है।

वह सबको जन्म देता है, पर किसी पर स्वामित्व नहीं जताता।

वह सबका पोषण करता है, पर किसी पर अधिकार नहीं करता।

यही ताओ की विशिष्टता है।

 वू-वेई (Wu Wei) : अकृत्रिम कर्म

ताओ दर्शन का एक अत्यन्त प्रसिद्ध सिद्धान्त है—

वू-वेई (Wu Wei)

इसका शाब्दिक अर्थ "कुछ न करना" नहीं है।

वास्तविक अर्थ है—

प्रकृति के स्वाभाविक क्रम के विरुद्ध अनावश्यक हस्तक्षेप न करना।

जब मनुष्य अपनी अहंकारजनित इच्छाओं से प्रकृति पर अत्यधिक नियंत्रण स्थापित करना चाहता है, तब संघर्ष उत्पन्न होता है।

इसके विपरीत, जब वह ताओ के अनुरूप जीवन जीता है, तब उसका कर्म सहज, संतुलित और सामंजस्यपूर्ण हो जाता है।

इस प्रकार वू-वेई निष्क्रियता नहीं, बल्कि अकृत्रिमता (Naturalness) का सिद्धान्त है।

 परिवर्तन और संतुलन

ताओवाद के अनुसार जगत स्थिर नहीं है।

सब कुछ परिवर्तनशील है।

किन्तु यह परिवर्तन अराजक नहीं है।

उसमें एक गहरा संतुलन विद्यमान है।

यिन और यांग की अवधारणा इसी संतुलन का प्रतीक है।

यह दो शत्रुतापूर्ण शक्तियों का संघर्ष नहीं, बल्कि परस्पर पूरक ध्रुवों की गतिशील एकता है।

प्रकाश और अन्धकार, विश्राम और गति, कोमलता और कठोरता—

ये विरोध नहीं, बल्कि एक ही प्रक्रिया के विभिन्न आयाम हैं।

क्या ताओ अंतिम वास्तविकता है?

ताओवाद के अनुसार ताओ को अंतिम आधार के रूप में समझा जा सकता है।

किन्तु ताओ को किसी स्थिर पदार्थ, व्यक्तिगत ईश्वर या शाश्वत आत्मा के रूप में परिभाषित नहीं किया जाता।

वह एक ऐसी आधारभूत व्यवस्था है जो स्वयं सभी परिभाषाओं से बड़ी है।

इसी कारण ताओ को समझने की अपेक्षा उसके साथ सामंजस्य स्थापित करने पर अधिक बल दिया जाता है।

 दार्शनिक महत्व

ताओवाद ने विश्व-दर्शन में एक अनूठा दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।

उसने अंतिम वास्तविकता को शक्ति, नियंत्रण या प्रभुत्व के रूप में नहीं देखा।

उसने उसे संतुलन, स्वस्फूर्तता और प्राकृतिक सामंजस्य के रूप में समझा।

यह दृष्टि केवल तत्त्वमीमांसा तक सीमित नहीं रही।

इसने राजनीति, चिकित्सा, युद्धकला, पर्यावरण-चिन्तन और जीवन-दर्शन को भी गहराई से प्रभावित किया।

 'चिंतन' की टिप्पणी

ताओवाद हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि शायद वास्तविकता को समझने का एक मार्ग उसे नियंत्रित करना नहीं, बल्कि उसके स्वाभाविक प्रवाह को पहचानना भी हो सकता है।

यह दर्शन अंतिम वास्तविकता को किसी कठोर सिद्धान्त में सीमित नहीं करता।

वह हमें स्मरण कराता है कि जीवन की कुछ सबसे गहरी व्यवस्थाएँ मौन, सहज और निरन्तर प्रवाहमान होती हैं।

 इस भाग का सार

ताओवाद में ताओ को विश्व की आधारभूत, स्वस्फूर्त और अव्याख्येय व्यवस्था के रूप में समझा गया है। वह न व्यक्तिगत ईश्वर है, न केवल पदार्थ, न ही केवल विचार। वू-वेई और यिन-यांग जैसे सिद्धान्त ताओ के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन की ओर संकेत करते हैं। इस प्रकार ताओवाद अंतिम वास्तविकता को नियंत्रण या प्रभुत्व नहीं, बल्कि संतुलन, स्वाभाविकता और निरन्तर प्रवाह के रूप में प्रस्तुत करता है।


 मुकेश ,,,,,,,

 

 

 

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