चिंतन - भाग–13 : वैश्विक दर्शन में अंतिम वास्तविकता (Ultimate Reality) उपभाग–4 : आधुनिक यूरोपीय दर्शन
चिंतन - भाग–13 : वैश्विक दर्शन में अंतिम वास्तविकता (Ultimate Reality)
उपभाग–4
: आधुनिक यूरोपीय दर्शन — डेसकार्त से हेगेल तक : क्या अंतिम वास्तविकता पदार्थ है,
चेतना है या निरपेक्ष आत्मा?
पुनर्जागरण
(Renaissance) और वैज्ञानिक क्रान्ति के बाद यूरोप में दर्शन के सामने एक नया प्रश्न
उपस्थित हुआ।
यदि प्रकृति
को विज्ञान के माध्यम से समझा जा सकता है, तो—
क्या अंतिम
वास्तविकता भी विज्ञान की भाषा में समझी जाएगी?
या
क्या दर्शन
अभी भी उस सत्य की खोज करेगा जो अनुभव और विज्ञान दोनों की सीमाओं से परे है?
सत्रहवीं से
उन्नीसवीं शताब्दी तक का यूरोपीय दर्शन इसी प्रश्न के इर्द-गिर्द विकसित हुआ।
डेसकार्त
: निश्चित ज्ञान की खोज
आधुनिक यूरोपीय
दर्शन का प्रारम्भ सामान्यतः René Descartes से माना जाता है।
डेसकार्त ने
हर उस विश्वास पर संदेह किया जिसे संदेहास्पद बनाया जा सकता था।
किन्तु इस व्यापक
संशय के बीच उन्हें एक सत्य मिला—
"मैं
सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ" (Cogito, ergo sum)।
यह कथन केवल
आत्मविश्वास की घोषणा नहीं था।
यह ज्ञान की
ऐसी आधारशिला खोजने का प्रयास था जिस पर सम्पूर्ण दर्शन का पुनर्निर्माण किया जा सके।
डेसकार्त के
अनुसार वास्तविकता दो मूल तत्त्वों में विभाजित दिखाई देती है—
- विस्तारित पदार्थ (Res Extensa) — जो स्थान घेरता है।
- चिन्तनशील सत्ता (Res Cogitans) — जो सोचती है।
इस प्रकार आधुनिक
मन–पदार्थ द्वैतवाद (Mind–Body Dualism) की स्पष्ट दार्शनिक अभिव्यक्ति सामने आती है।
स्पिनोज़ा
: एक ही अनन्त सत्ता
यदि डेसकार्त
ने वास्तविकता को दो मूल तत्त्वों में विभाजित किया, तो Baruch Spinoza ने इस
विभाजन को अस्वीकार किया।
उनके अनुसार—
वास्तविकता मूलतः एक ही अनन्त सत्ता (Substance) है।
विचार
(Thought) और विस्तार (Extension) उसी एक सत्ता के गुण (Attributes) हैं।
अर्थात् मन
और पदार्थ दो अलग वास्तविकताएँ नहीं, बल्कि एक ही अनन्त वास्तविकता की भिन्न अभिव्यक्तियाँ
हैं।
स्पिनोज़ा इस
अनन्त सत्ता को "ईश्वर अथवा प्रकृति" (Deus sive Natura) कहते हैं।
यहाँ
"ईश्वर" किसी व्यक्तिगत सृष्टिकर्ता के अर्थ में नहीं, बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व
की अनन्त आधार-सत्ता के अर्थ में प्रयुक्त है।
स्पिनोज़ा का
दर्शन पश्चिमी तत्त्वमीमांसा में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एकत्ववादी (Monistic) प्रतिपादन
प्रस्तुत करता है।
Gottfried
Wilhelm Leibniz ने
स्पिनोज़ा से भिन्न मार्ग अपनाया।
उन्होंने कहा
कि वास्तविकता एक ही सत्ता नहीं, बल्कि असंख्य मोनाड (Monads) से निर्मित है।
मोनाड भौतिक
कण नहीं हैं।
वे अनुभव, दृष्टि
और सक्रियता के मूल केन्द्र हैं।
प्रत्येक मोनाड
अपने दृष्टिकोण से सम्पूर्ण विश्व को प्रतिबिम्बित करती है।
इस प्रकार विविधता
वास्तविक है, किन्तु उसमें भी एक सार्वभौमिक सामंजस्य विद्यमान है।
आधुनिक दर्शन
में Immanuel Kant ने प्रश्न को एक नए स्तर पर पहुँचाया।
उन्होंने पूछा—
क्या मनुष्य वास्तव में अंतिम वास्तविकता को जान सकता है?
कांट के अनुसार
हम संसार को वैसा नहीं जानते जैसा वह स्वयं में है।
हम उसे वैसा
जानते हैं जैसा वह हमारी ज्ञान-रचना (Cognitive Structure) के माध्यम से हमारे सामने
प्रकट होता है।
इसीलिए उन्होंने
दो स्तरों का भेद किया—
- Phenomenon — जैसा संसार हमें दिखाई देता है।
- Noumenon — जैसा वह स्वयं में हो सकता है।
Noumenon का
अस्तित्व नकारा नहीं जाता, किन्तु मानव बुद्धि उसकी प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त नहीं
कर सकती।
इस प्रकार कांट
ने अंतिम वास्तविकता के प्रश्न को ज्ञानमीमांसा की सीमाओं से जोड़ दिया।
Georg
Wilhelm Friedrich Hegel
ने कांट की सीमाओं को चुनौती दी।
उनके अनुसार
वास्तविकता कोई स्थिर वस्तु नहीं, बल्कि आत्म-विकसित होती हुई बुद्धिसंगत प्रक्रिया
है।
इस विकास का
अंतिम रूप है— Absolute Spirit (निरपेक्ष आत्मा)।
निरपेक्ष आत्मा
किसी व्यक्ति की आत्मा नहीं है।
यह वह सार्वभौमिक
चेतनात्मक प्रक्रिया है जिसमें प्रकृति, इतिहास, समाज, कला, धर्म और दर्शन क्रमशः आत्मबोध
की ओर अग्रसर होते हैं।
हेगेल के लिए
अंतिम वास्तविकता गतिशील है।
वह स्वयं को
प्रकट करती है, स्वयं को समझती है और अन्ततः स्वयं को पहचानती है।
आधुनिक यूरोपीय
दर्शन ने अंतिम वास्तविकता के प्रश्न को अनेक दिशाओं से देखा।
डेसकार्त ने
चेतना और पदार्थ का द्वैत प्रस्तुत किया।
स्पिनोज़ा ने
अनन्त एकत्व की स्थापना की।
लाइबनिट्ज़
ने बहुलता और सामंजस्य का सिद्धान्त दिया।
कांट ने ज्ञान
की सीमाओं को रेखांकित किया।
हेगेल ने वास्तविकता
को आत्म-विकसित होती हुई निरपेक्ष प्रक्रिया के रूप में समझाया।
इन सबने मिलकर
पश्चिमी तत्त्वमीमांसा को एक नई गहराई प्रदान की।
आधुनिक यूरोपीय
दर्शन हमें यह सिखाता है कि अंतिम वास्तविकता का प्रश्न केवल "वह क्या है?"
का प्रश्न नहीं है।
यह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है कि— क्या मनुष्य उसे जान सकता है?
और यदि जान
सकता है, तो किस प्रकार?
यहीं से तत्त्वमीमांसा और ज्ञानमीमांसा एक-दूसरे से गहरे रूप में जुड़ जाती हैं।
इस भाग का सार
आधुनिक यूरोपीय
दर्शन में अंतिम वास्तविकता के प्रश्न ने नए रूप ग्रहण किए। डेसकार्त ने मन और पदार्थ
का द्वैत प्रतिपादित किया। स्पिनोज़ा ने एक अनन्त सत्ता का सिद्धान्त प्रस्तुत किया।
लाइबनिट्ज़ ने मोनाडों के माध्यम से बहुलतावादी व्यवस्था का प्रतिपादन किया। कांट ने
मानव ज्ञान की सीमाओं को रेखांकित करते हुए Noumenon की अवधारणा विकसित की, जबकि हेगेल
ने वास्तविकता को आत्म-विकसित होती हुई निरपेक्ष आत्मा के रूप में समझाया। इन विविध
दृष्टियों ने आधुनिक तत्त्वमीमांसा को नई दिशा प्रदान की।
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