चिन्तन -अध्याय–14 : नियति क्या है? भाग–1 : भूमिका — क्या मनुष्य अपने जीवन का निर्माता है?
ग्रंथ–२ : ब्रह्माण्ड - अस्तित्व, चेतना और वास्तविकता का दार्शनिक अध्ययन
अध्याय–14 : नियति क्या है? - भाग–1 : भूमिका — क्या मनुष्य अपने जीवन का निर्माता है?
मनुष्य
जब अपने जीवन को
पीछे मुड़कर देखता है, तब उसके
सामने केवल घटनाओं की
एक श्रृंखला नहीं होती। उसे
अपना जन्म दिखाई देता
है, अपना परिवार दिखाई
देता है, अपनी परिस्थितियाँ
दिखाई देती हैं, कुछ
अवसर दिखाई देते हैं, कुछ
दुर्घटनाएँ, कुछ सम्बन्ध, कुछ
निर्णय और उन सबके
बीच धीरे-धीरे आगे
बढ़ता हुआ उसका जीवन
दिखाई देता है। इस
पूरे जीवन को देखकर
कभी-कभी उसे लगता
है कि वह स्वयं
अपने जीवन का निर्माता
है। उसने निर्णय लिए,
मार्ग चुने, अवसरों को स्वीकार किया
या खो दिया और
अपने कर्मों तथा प्रयासों से
अपने जीवन को एक
दिशा दी। लेकिन इसी
जीवन को किसी दूसरे
क्षण में देखने पर
उसके भीतर एक बिल्कुल
अलग प्रश्न जन्म लेता है—क्या उसने वास्तव
में सब कुछ स्वयं
चुना था?
उसने
अपना जन्म नहीं चुना
था। उसने अपना परिवार
नहीं चुना था। उसने
अपनी प्रारम्भिक परिस्थितियाँ नहीं चुनी थीं।
उसने अपनी शारीरिक संरचना,
अपनी प्रारम्भिक मानसिक प्रवृत्तियाँ और अपने जीवन
का सामाजिक वातावरण भी स्वयं निर्धारित
नहीं किया था। फिर
भी इन्हीं सबके बीच उसका
व्यक्तित्व निर्मित हुआ और उसी
व्यक्तित्व ने आगे चलकर
निर्णय लिए। तब प्रश्न
उठता है—यदि मनुष्य
के निर्णयों के पीछे ऐसी
अनेक पूर्वस्थितियाँ काम कर रही
थीं, जिन पर उसका
कोई प्रत्यक्ष नियन्त्रण नहीं था, तो
उसकी स्वतंत्रता की वास्तविक सीमा
क्या है?
यहीं
से नियति (Destiny) का प्रश्न जन्म
लेता है।
नियति
का प्रश्न सामान्यतः भविष्य को जानने की
इच्छा से जोड़ा जाता
है। मनुष्य पूछता है—कल क्या
होगा? मेरा जीवन किस
दिशा में जाएगा? मेरे
साथ कौन-सी घटनाएँ
घटेंगी? लेकिन दर्शन के लिए नियति
का प्रश्न इससे कहीं अधिक
गहरा है। दर्शन यह
नहीं पूछता कि भविष्य में
क्या घटेगा; वह पूछता है
कि भविष्य का स्वरूप किस
प्रकार निर्मित होता है। क्या
भविष्य पहले से किसी
व्यवस्था में निर्धारित है?
क्या घटनाएँ किसी अनिवार्य क्रम
में घटती हैं? क्या
मनुष्य अपने निर्णयों से
उस क्रम को बदल
सकता है? और यदि
वह बदल सकता है,
तो क्या उस परिवर्तन
की क्षमता भी पहले से
किसी कारण-श्रृंखला का
परिणाम है?
इस प्रकार नियति का प्रश्न वास्तव
में भविष्य का प्रश्न नहीं,
बल्कि मनुष्य की स्वतंत्रता का
प्रश्न बन जाता है।
सामान्य
जीवन में नियति को
प्रायः भाग्य के अर्थ में
समझा जाता है। किसी
व्यक्ति का जीवन अपेक्षाकृत
सुखपूर्ण हो तो कहा
जाता है कि उसकी
नियति अच्छी है और यदि
जीवन में लगातार कठिनाइयाँ
आती रहें तो कहा
जाता है कि उसका
भाग्य खराब है। इस
प्रकार नियति धीरे-धीरे एक
ऐसे शब्द में बदल
जाती है, जिसके भीतर
मनुष्य अपने जीवन की
जटिल घटनाओं को रख देता
है। लेकिन दर्शन इस सरल उत्तर
से सन्तुष्ट नहीं होता। वह
पूछता है—जिसे हम
नियति कहते हैं, वह
वास्तव में क्या है?
क्या वह किसी दैवी
योजना का नाम है?
क्या वह कारण और
परिणाम की अनिवार्य श्रृंखला
है? क्या वह प्रकृति
के नियमों का स्वाभाविक परिणाम
है? क्या वह मनुष्य
की अपनी मानसिक संरचना
से निर्मित भविष्य है? या फिर
नियति केवल उस असमर्थता
का नाम है, जिसमें
मनुष्य अपने जीवन की
सम्पूर्ण जटिलता को समझ नहीं
पाता?
यह प्रश्न इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि नियति
के प्रति हमारा विश्वास हमारे जीवन के प्रति
हमारे व्यवहार को प्रभावित करता
है। यदि मनुष्य मानता
है कि सब कुछ
पहले से निर्धारित है,
तो उसके प्रयास, असफलता
और उत्तरदायित्व की समझ बदल
सकती है। यदि वह
मानता है कि सब
कुछ उसके अपने नियन्त्रण
में है, तो असफलता
का सम्पूर्ण भार उसके ऊपर
आ जाता है। और
यदि वह इन दोनों
के बीच खड़ा रहता
है, तो उसके भीतर
एक निरन्तर तनाव बना रहता
है—मैं स्वतंत्र हूँ
या नहीं?
मनुष्य
स्वयं को अपने जीवन
का निर्माता मानना चाहता है। इस विश्वास
में उसकी गरिमा है।
यही विश्वास उसे प्रयास करने,
जोखिम उठाने और भविष्य की
योजना बनाने की शक्ति देता
है। मनुष्य अपने जीवन को
केवल घटित होने वाली
घटनाओं की श्रृंखला नहीं
मानता; वह स्वयं को
उस श्रृंखला का कर्ता समझता
है। लेकिन यहाँ एक कठिन
प्रश्न उपस्थित होता है। यदि
मनुष्य अपने जीवन का
निर्माता है, तो वह
अपने निर्माण की प्रारम्भिक सामग्री
कहाँ से लाता है?
उसका
शरीर उसके चयन से
पहले उपस्थित होता है। उसका
जन्म उसके निर्णय से
पहले हो चुका होता
है। उसकी भाषा, संस्कृति
और सामाजिक वातावरण उसके व्यक्तित्व पर
प्रभाव डालने लगते हैं। उसके
भीतर भय, आकर्षण, स्मृति
और प्रवृत्तियाँ विकसित होती हैं। इन
सबके बाद वह निर्णय
लेता है। तब क्या
उसका निर्णय पूर्ण स्वतंत्रता से जन्म लेता
है, या वह उन
सभी पूर्वस्थितियों का परिणाम होता
है जिन पर उसका
कोई प्रत्यक्ष नियन्त्रण नहीं था?
यहीं
नियति और स्वतंत्र इच्छा
(Free Will) का प्रश्न एक-दूसरे के
सामने आ खड़ा होता
है।
नियति
का मूल संकट यह
नहीं है कि भविष्य
में क्या होगा। उसका
मूल संकट यह है
कि भविष्य के निर्माण में
मनुष्य की वास्तविक भूमिका
कितनी है। यदि प्रत्येक
घटना का कोई कारण
है, तो क्या वह
कारण आगे आने वाली
घटना को अनिवार्य बना
देता है? यदि कारणों
की पूरी श्रृंखला को
कोई पूर्णतः जान सके, तो
क्या भविष्य की प्रत्येक घटना
का पूर्वानुमान सम्भव होगा? और यदि भविष्य
का पूर्वानुमान सम्भव है, तो क्या
इसका अर्थ यह है
कि भविष्य पहले से निर्धारित
है?
यहाँ
एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दार्शनिक भेद सामने आता
है। किसी घटना का
पूर्वानुमान सम्भव होना और उसका
पहले से निर्धारित होना
एक ही बात नहीं
है। मौसम का पूर्वानुमान
लगाया जा सकता है,
लेकिन पूर्वानुमान स्वयं वर्षा का कारण नहीं
होता। किसी व्यक्ति के
व्यवहार की सम्भावना का
अनुमान लगाया जा सकता है,
लेकिन इससे यह सिद्ध
नहीं होता कि उसका
व्यवहार पहले से किसी
अदृश्य व्यवस्था में लिखा हुआ
था। इसी प्रकार भविष्य
के बारे में हमारी
जानकारी और भविष्य की
वास्तविक संरचना—दो अलग प्रश्न
हैं।
इसलिए
भविष्यवाणी
(Prediction), पूर्वानुमान
(Forecasting), निर्धारण
(Determination) और प्रायिकता (Probability) को एक ही
अर्थ में समझना दार्शनिक
भूल होगी। किसी घटना के
सम्भावित होने का अर्थ
यह नहीं है कि
वह अनिवार्य है। और किसी
घटना का पूर्वानुमान सम्भव
होना यह सिद्ध नहीं
करता कि वह पहले
से निर्धारित है। नियति की
समझ के लिए यह
भेद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
वास्तव
में मनुष्य को भविष्य से
उतना भय नहीं होता,
जितना भविष्य पर अपने नियन्त्रण
के समाप्त हो जाने से
होता है। अज्ञात भविष्य
उसे परेशान करता है, लेकिन
उससे भी अधिक गहरी
बेचैनी यह प्रश्न उत्पन्न
करता है—यदि मैं
अपने जीवन का स्वामी
नहीं हूँ, तो मैं
कौन हूँ? क्या मैं
केवल घटनाओं का अनुभव करने
वाला एक पात्र हूँ?
क्या मेरा निर्णय केवल
एक भ्रम है? क्या
मेरी इच्छा किसी पहले से
चल रही कारण-श्रृंखला
का परिणाम है? या फिर
मनुष्य के भीतर ऐसी
कोई क्षमता है, जो कारणों
के बीच रहते हुए
भी एक नया विकल्प
चुनने की सम्भावना देती
है?
नियति
का प्रश्न इसी सीमा-रेखा
पर खड़ा है। एक
ओर कारणता (Causality) है और दूसरी
ओर स्वतंत्र इच्छा। एक ओर वे
पूर्वस्थितियाँ हैं जो मनुष्य
को प्राप्त होती हैं और
दूसरी ओर वे विकल्प
हैं जिन्हें वह चुनता है।
एक ओर वह जीवन
है जो मनुष्य को
मिला है और दूसरी
ओर वह जीवन है
जो वह उस प्राप्त
जीवन से निर्मित करता
है।
इस अध्याय का उद्देश्य यह
सिद्ध करना नहीं है
कि नियति निश्चित रूप से अस्तित्व
में है। न ही
इसका उद्देश्य यह सिद्ध करना
है कि नियति जैसी
कोई वस्तु है ही नहीं।
दोनों निष्कर्ष बहुत जल्दी मनुष्य
को किसी एक विचारधारा
के भीतर बन्द कर
देते हैं। इस अध्याय
का वास्तविक उद्देश्य यह समझना है
कि नियति की धारणा किन
दार्शनिक प्रश्नों से निर्मित होती
है और मनुष्य की
स्वतंत्रता के साथ उसका
सम्बन्ध किस प्रकार समझा
जा सकता है।
क्या
नियति कारणता से उत्पन्न होती
है? क्या वह दैवी
इच्छा का दूसरा नाम
है? क्या वह अतीत
की शक्तियों का भविष्य पर
प्रभाव मात्र है? क्या मनुष्य
की स्वतंत्रता नियति के भीतर सम्भव
है? क्या प्रायिकता नियति
को नकारती है, या केवल
यह बताती है कि भविष्य
हमारी जानकारी से अधिक जटिल
है?
और अन्ततः सबसे कठिन प्रश्न
यह है—यदि मनुष्य
अपने जीवन की सभी
परिस्थितियाँ नहीं चुनता, तो
क्या वह फिर भी
अपने जीवन के अर्थ
का चुनाव कर सकता है?
सम्भव
है, नियति का सबसे गहरा
प्रश्न भविष्य के बारे में
न हो। सम्भव है,
वह मनुष्य से यह पूछती
हो कि उसे जो
जीवन मिला है, उसके
भीतर उसकी स्वतंत्रता कहाँ
से शुरू होती है।
और शायद मनुष्य की
वास्तविक नियति किसी पूर्वलिखित भविष्य
में नहीं, बल्कि उस क्षण में
छिपी हो जब वह
अपने अस्तित्व से यह प्रश्न
पूछता है—
मैं
कौन हूँ, और मेरे जीवन में वास्तव में मेरा अपना क्या है?
नियति
वह प्रश्न है जहाँ मनुष्य
भविष्य को नहीं, अपनी
स्वतंत्रता की सीमा को
देखना शुरू करता है।
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