चिन्तन - अध्याय–14 : नियति क्या है? भाग–2 : नियति शब्द की व्युत्पत्ति और दार्शनिक परिभाषा
अध्याय–14 : नियति क्या है?
भाग–2 : नियति शब्द की व्युत्पत्ति और दार्शनिक परिभाषा
‘नियति’ शब्द सुनते ही मनुष्य के भीतर भविष्य की कोई अस्पष्ट छवि उभरने लगती है। किसी अदृश्य शक्ति द्वारा पहले से निर्धारित जीवन, घटनाओं का कोई अनिवार्य क्रम और मनुष्य से परे कोई ऐसी व्यवस्था, जिसके भीतर उसका जीवन धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा हो। लेकिन किसी भी दार्शनिक अवधारणा को समझने के लिए सबसे पहले उसके शब्द तक लौटना आवश्यक होता है। क्योंकि अनेक बार किसी शब्द का वर्तमान अर्थ उसके मूल अर्थ से बहुत दूर जा चुका होता है। ‘नियति’ के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है।
‘नियति’ शब्द संस्कृत की ‘नी’ धातु से सम्बन्धित माना जाता है। ‘नी’ का मूल भाव है—ले जाना, किसी दिशा में ले जाना या किसी मार्ग की ओर अग्रसर करना। ‘नियति’ में ‘नि’ उपसर्ग जुड़ने पर अर्थ में एक प्रकार की निश्चितता, विशेष दिशा अथवा किसी व्यवस्था के भीतर ले जाए जाने का भाव उभरता है। इस दृष्टि से नियति का प्रारम्भिक अर्थ केवल ‘भाग्य’ नहीं है। उसके भीतर किसी दिशा में गति, किसी क्रम में बँधना और किसी व्यवस्था के अनुसार आगे बढ़ना—इन सभी भावों की सम्भावना दिखाई देती है।
यहीं से नियति का दार्शनिक अर्थ धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगता है। नियति को यदि केवल ‘भविष्य में घटने वाली घटना’ मान लिया जाए, तो वह एक साधारण भविष्यवाणी बन जाती है। लेकिन यदि नियति को उन शक्तियों, कारणों और व्यवस्थाओं के रूप में देखा जाए जो किसी जीवन या घटना को एक विशेष दिशा में ले जाती हैं, तो वह एक गम्भीर दार्शनिक अवधारणा बन जाती है।
अर्थात् नियति का प्रश्न यह नहीं है कि क्या होगा। उसका मूल प्रश्न यह है कि जो होगा, वह किस व्यवस्था के कारण होगा।
यहीं नियति और भविष्य के बीच पहला अन्तर दिखाई देता है। भविष्य समय की दृष्टि से आगे आने वाली घटनाओं का नाम है। नियति उन घटनाओं के पीछे सम्भावित व्यवस्था का प्रश्न है। भविष्य एक कालगत अवधारणा है; नियति एक दार्शनिक अवधारणा। भविष्य का सम्बन्ध समय से है, जबकि नियति का सम्बन्ध कारणता, व्यवस्था और मानव स्वतंत्रता से जुड़ जाता है।
इस अन्तर को समझना आवश्यक है, क्योंकि लोकजीवन में नियति को प्रायः भविष्य के पर्याय के रूप में ग्रहण कर लिया जाता है। लेकिन प्रत्येक भविष्य नियति नहीं है। किसी घटना का अभी न घटित होना केवल यह बताता है कि वह भविष्य में है। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि वह पहले से निर्धारित है। भविष्य खुला भी हो सकता है, सम्भावनाओं से भरा भी हो सकता है और किसी विशेष कारण-व्यवस्था से बँधा हुआ भी हो सकता है। नियति का प्रश्न इसी सम्भावना को लेकर उठता है।
दार्शनिक दृष्टि से नियति को एक ऐसी अवधारणा के रूप में समझा जा सकता है जिसमें यह मान्यता निहित होती है कि किसी व्यक्ति, घटना या जीवन की दिशा कुछ पूर्वस्थित शक्तियों, कारणों या व्यवस्थाओं से प्रभावित अथवा निर्धारित होती है। यहाँ ‘निर्धारित’ शब्द अत्यन्त सावधानी से समझना होगा। प्रभावित होना और पूर्णतः निर्धारित होना एक ही बात नहीं है। किसी घटना की दिशा पर अनेक कारणों का प्रभाव हो सकता है, लेकिन इससे यह आवश्यक नहीं हो जाता कि उसका परिणाम एक ही हो।
यही वह बिन्दु है जहाँ नियति का प्रश्न सरल नहीं रह जाता।
यदि कोई नदी पर्वत से निकलकर समुद्र की ओर बहती है, तो क्या उसकी पूरी यात्रा पहले से निर्धारित है? उसका उद्गम एक निश्चित स्थान पर है। उसका प्रवाह भूगोल, ढाल और गुरुत्वाकर्षण से प्रभावित है। लेकिन मार्ग में उसे अनेक बाधाएँ मिलती हैं। कहीं भूमि का स्वरूप बदलता है, कहीं कोई अन्य जलधारा उससे मिलती है, कहीं मनुष्य उसके प्रवाह को मोड़ देता है। तब क्या नदी की नियति केवल उसका समुद्र तक पहुँचना है, या उसके मार्ग की प्रत्येक छोटी घटना भी पहले से निर्धारित है?
यह उदाहरण नियति की दार्शनिक जटिलता को समझने में सहायता करता है। किसी व्यवस्था में दिशा का होना और प्रत्येक घटना का पहले से निश्चित होना—दो अलग बातें हो सकती हैं।
मनुष्य के जीवन में भी यही प्रश्न उठता है। क्या जीवन की कोई व्यापक दिशा हो सकती है, जबकि उसके भीतर अनेक वास्तविक विकल्प खुले हों? क्या कोई व्यक्ति कुछ सीमाओं के भीतर स्वतंत्र हो सकता है? यदि ऐसा है, तो नियति और स्वतंत्रता का सम्बन्ध विरोध का नहीं, बल्कि स्तरों का प्रश्न बन जाता है।
लेकिन यहाँ पहुँचने से पहले ‘नियति’ को उसके निकटवर्ती शब्दों से अलग करना आवश्यक है। लोकभाषा में नियति, भाग्य, प्रारब्ध और दैव जैसे शब्द अनेक बार एक-दूसरे के स्थान पर प्रयुक्त होते हैं। दर्शन में ऐसा करना समस्या उत्पन्न करता है। क्योंकि प्रत्येक शब्द अपने भीतर एक अलग ऐतिहासिक और वैचारिक पृष्ठभूमि रखता है।
‘भाग्य’ प्रायः उस स्थिति को सूचित करता है जो किसी व्यक्ति को प्राप्त हुई है या जो उसके जीवन में घटित होती है। इसमें जीवन की उपलब्धियों और विपत्तियों का भाव अधिक प्रबल है। ‘प्रारब्ध’ का सम्बन्ध भारतीय दार्शनिक परम्पराओं में विशेष कारण-व्यवस्था से जुड़ता है। ‘दैव’ में दैवी अथवा मनुष्य से परे किसी शक्ति का संकेत हो सकता है। इसके विपरीत ‘नियति’ का दार्शनिक प्रश्न अधिक व्यापक है। वह यह पूछती है कि क्या जीवन और जगत किसी ऐसी व्यवस्था के भीतर संचालित हैं, जिसमें घटनाओं की दिशा मनुष्य की इच्छा से स्वतंत्र रूप से निर्धारित होती है।
इसलिए नियति को केवल ‘मेरे साथ क्या होगा’ के प्रश्न तक सीमित करना उसके दार्शनिक स्वरूप को छोटा कर देना है।
नियति का वास्तविक प्रश्न इससे कहीं गहरा है—
क्या वास्तविकता में ऐसी कोई अनिवार्यता है, जो मनुष्य की इच्छा से पहले अस्तित्व में रहती है?
यदि उत्तर हाँ है, तो अगला प्रश्न होगा—उस अनिवार्यता का स्वरूप क्या है? क्या वह प्रकृति के नियमों में निहित है? क्या वह कारणता की श्रृंखला में है? क्या वह चेतना से परे किसी दैवी व्यवस्था में है? या फिर वह केवल मनुष्य की सीमित जानकारी का परिणाम है?
यहीं नियति एक अत्यन्त सूक्ष्म दार्शनिक अवधारणा बन जाती है। क्योंकि मनुष्य प्रायः उस घटना को नियति कह देता है, जिसका कारण वह समझ नहीं पाता। अतीत में अनेक प्राकृतिक घटनाएँ मनुष्य को दैवी या नियत लगती थीं, क्योंकि उनके वैज्ञानिक कारण ज्ञात नहीं थे। आज उन घटनाओं के अनेक कारणों को समझ लिया गया है। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या नियति वास्तव में किसी अदृश्य व्यवस्था का नाम है, या फिर अज्ञान के अन्धकार में खड़ा मनुष्य अपने अनुभवों को अर्थ देने के लिए नियति की रचना करता है?
इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है। किसी घटना का कारण ज्ञात हो जाना अपने आप में नियति की धारणा को समाप्त नहीं करता। क्योंकि तब भी यह प्रश्न बचा रहता है कि कारणों की पूरी श्रृंखला कहाँ से आरम्भ होती है और क्या वह श्रृंखला अनिवार्य है। यदि प्रत्येक कारण का कोई पूर्व कारण है, तो क्या सम्पूर्ण जगत एक ऐसी अनन्त श्रृंखला है, जिसमें किसी भी क्षण के लिए वास्तविक स्वतंत्रता सम्भव नहीं?
और यदि ऐसा नहीं है, तो वह स्थान कहाँ है जहाँ से नया विकल्प जन्म लेता है?
नियति की दार्शनिक परिभाषा इसी गहरे प्रश्न के आसपास निर्मित होती है। नियति को हम इस प्रकार समझ सकते हैं—
नियति वह दार्शनिक अवधारणा है जिसमें किसी व्यक्ति, घटना या जीवन की दिशा को प्रभावित अथवा निर्धारित करने वाली पूर्वस्थित कारण-व्यवस्था, शक्ति या अनिवार्यता का प्रश्न निहित होता है।
इस परिभाषा में एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। नियति को यहाँ किसी निश्चित धार्मिक सत्ता के रूप में परिभाषित नहीं किया गया है। न ही इसे केवल भाग्य या भविष्यवाणी के अर्थ में ग्रहण किया गया है। नियति को एक प्रश्न के रूप में समझा गया है—वह प्रश्न जो मनुष्य और उसके जीवन की दिशा के पीछे उपस्थित अनिवार्यता को लेकर उठता है।
शायद यही नियति की सबसे बड़ी दार्शनिक शक्ति है।
वह हमें भविष्य के बारे में कोई निश्चित उत्तर नहीं देती। वह केवल हमें यह देखने के लिए विवश करती है कि हमारे जीवन में कितना कुछ ऐसा है जो हमसे पहले उपस्थित था। और फिर वह हमसे पूछती है—
क्या तुम्हारा जीवन केवल उन पूर्वस्थितियों का परिणाम है?
यदि उत्तर हाँ है, तो स्वतंत्रता का प्रश्न कठिन हो जाता है।
यदि उत्तर नहीं है, तो हमें यह बताना होगा कि मनुष्य के भीतर वह कौन-सी क्षमता है जो उसे पूर्वस्थित कारणों से आगे ले जाती है।
इस प्रकार नियति कोई अन्तिम निष्कर्ष नहीं, बल्कि मनुष्य और वास्तविकता के बीच खड़ा हुआ एक मूल दार्शनिक प्रश्न है। वह भविष्य की ओर देखने से पहले मनुष्य को अपने अतीत की ओर देखने के लिए बाध्य करती है। और शायद इसी कारण नियति को समझने के लिए भविष्यवाणी से अधिक आवश्यक है—कारणता को समझना।
क्योंकि यदि मनुष्य यह नहीं समझता कि उसके जीवन को कौन-कौन-सी शक्तियाँ दिशा देती हैं, तो वह अपनी स्वतंत्रता का वास्तविक मूल्य भी नहीं समझ सकता।
मुख्य विवाद
क्या नियति किसी वास्तविक पूर्वस्थित व्यवस्था का नाम है, या मनुष्य द्वारा जीवन की अनिश्चितता को अर्थ देने के लिए निर्मित एक मानसिक अवधारणा?
आज की शोध-स्थिति
नियति की कोई एक सर्वमान्य दार्शनिक परिभाषा स्वीकार नहीं की गई है। विभिन्न परम्पराएँ इसे कारणता, दैव, पूर्वस्थित परिस्थितियों, अनिवार्यता अथवा अस्तित्वगत संरचना से जोड़कर देखती हैं।
अब भी अनुत्तरित प्रश्न
यदि किसी जीवन की दिशा अनेक पूर्वस्थित कारणों से प्रभावित होती है, तो किस बिन्दु पर प्रभाव समाप्त होकर नियति आरम्भ होती है?
मुकेश श्रीवास्तव ,
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र )
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI )
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