चिंतन — अध्याय–15 : काल क्या है? — भाग–15 : काल पर एक स्वतंत्र निष्कर्ष — अस्तित्व का मौन आयाम
चिंतन — अध्याय–15 : काल क्या है? — भाग–15 : काल पर एक स्वतंत्र निष्कर्ष — अस्तित्व का मौन आयाम
काल पर लिखते हुए अन्ततः मैं उसी प्रश्न पर लौटता हूँ जिससे यह अध्याय आरम्भ हुआ था—
क्या काल वास्तव में है?
इस प्रश्न का उत्तर देना जितना कठिन है, उससे कहीं अधिक कठिन यह समझना है कि हम “वास्तव में” शब्द का प्रयोग किस अर्थ में कर रहे हैं।
यदि हम काल से घड़ी का समय पूछते हैं, तो विज्ञान उत्तर देता है।
यदि हम काल से परिवर्तन का क्रम पूछते हैं, तो दर्शन उत्तर देता है।
यदि हम पूछते हैं कि समय हमें कैसा अनुभव होता है, तो मनोविज्ञान उत्तर देता है।
लेकिन यदि हम पूछते हैं— “काल स्वयं क्या है?” तो सभी उत्तर कुछ दूरी पर जाकर मौन हो जाते हैं।
मेरा पहला निष्कर्ष—काल को वस्तु समझना भूल है
मुझे लगता है कि मनुष्य की पहली भूल यह है कि वह काल को किसी वस्तु की तरह खोजता है।
हम पूछते हैं—
काल कहाँ है?
काल किस दिशा में बहता है?
काल किस गति से चलता है?
लेकिन सम्भव है कि काल किसी वस्तु की तरह “होता” ही न हो।
जैसे स्थान को किसी एक वस्तु की तरह पकड़ना कठिन है, वैसे ही काल भी सम्भवतः वह आयाम है जिसमें परिवर्तन को समझना सम्भव होता है।
इस अर्थ में काल— घटनाओं में दिखाई नहीं देता; घटनाओं के सम्बन्ध में प्रकट होता है।
दूसरा निष्कर्ष—काल और परिवर्तन अलग नहीं
मेरी दृष्टि में काल को परिवर्तन से पूरी तरह अलग करना सम्भव नहीं।
जहाँ कोई अवस्था किसी दूसरी अवस्था से भिन्न होती है, वहाँ क्रम का प्रश्न उठता है।
जहाँ क्रम है, वहाँ कालिकता का प्रश्न जन्म लेता है।
लेकिन यहाँ एक सावधानी भी आवश्यक है।
यह कहना कि— “परिवर्तन ही काल है”
अत्यधिक सरल होगा।
क्योंकि परिवर्तन की पहचान के लिए भी किसी क्रम की आवश्यकता होती है।
इसलिए सम्भवतः अधिक उचित कथन यह है—
काल और परिवर्तन एक-दूसरे के कारण नहीं, बल्कि अस्तित्व को समझने वाली दो परस्पर सम्बद्ध धारणाएँ हैं।
तीसरा निष्कर्ष—समय का प्रवाह शायद अनुभव है
मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि— समय का बहना और घटनाओं का क्रमिक होना दो अलग बातें हैं।
घटनाएँ क्रम में हो सकती हैं।
परिवर्तन घटित हो सकता है।
अतीत स्मृति में रह सकता है।
भविष्य सम्भावना के रूप में उपस्थित हो सकता है।
लेकिन “समय बह रहा है”—यह अनुभव सम्भवतः चेतना की अपनी संरचना से गहराई से जुड़ा है।
मनुष्य अपने अस्तित्व को एक यात्रा की तरह अनुभव करता है।
इसीलिए उसे लगता है कि समय आगे जा रहा है।
शायद— समय नहीं बहता; मनुष्य अपने अनुभव के क्रम से गुजरता है।
यह कोई अन्तिम वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं।
यह केवल इस अध्याय के अध्ययन से निकला एक दार्शनिक अनुमान है।
चौथा निष्कर्ष—कालसूक्त की शक्ति
कालसूक्त को पढ़ते हुए मुझे सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह लगती है कि वह काल को केवल मापनीय समय में सीमित नहीं करता।
वह हमें यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि—
क्या समस्त अस्तित्व किसी व्यापक कालिक व्यवस्था में स्थित है?
आधुनिक विज्ञान इस प्रश्न का उत्तर अपने उपकरणों और सिद्धान्तों से खोजता है।
वैदिक चिन्तन इसे ब्रह्माण्डीय सत्ता के प्रश्न के रूप में देखता है।
दोनों की पद्धतियाँ अलग हैं।
लेकिन दोनों एक बात स्वीकार करते हैं—
काल को साधारण अनुभव की सीमा में समाप्त नहीं किया जा सकता।
पाँचवाँ निष्कर्ष—महाकाल का दार्शनिक अर्थ
मेरी दृष्टि में महाकाल को केवल धार्मिक विश्वास या वैज्ञानिक सत्ता के रूप में देखना उसके दार्शनिक अर्थ को सीमित कर देता है।
महाकाल मेरे लिए उस प्रश्न का प्रतीक हैं—
क्या परिवर्तन के भीतर कोई ऐसा बिन्दु है जहाँ परिवर्तन को स्वयं देखा जा सके?
यदि मनुष्य काल में जीता है, तो क्या वह काल को पूरी तरह समझ सकता है?
शायद नहीं।
लेकिन वह काल के प्रश्न को उठा सकता है।
और यही मनुष्य की विशिष्टता है।
एक पत्थर काल में स्थित है।
एक वृक्ष काल में बदलता है।
एक पशु कालिक अनुभव करता है।
लेकिन मनुष्य— काल के भीतर रहते हुए काल के बारे में प्रश्न उठाता है।
यहीं से दर्शन जन्म लेता है।
अन्तिम निष्कर्ष—हम काल को नहीं, काल में स्वयं को पढ़ रहे हैं
इस पूरे अध्याय के बाद मुझे लगता है कि काल का सबसे गहरा रहस्य यह नहीं कि— समय कब शुरू हुआ।
न ही केवल यह कि— समय समाप्त होगा या नहीं।
सबसे गहरा प्रश्न यह है— हम स्वयं काल के भीतर क्या हैं?
आज जो “मैं” काल पर लिख रहा है—
वह कल का “मैं” नहीं।
शरीर बदल चुका है।
विचार बदल चुके हैं।
स्मृतियाँ बदल चुकी हैं।
फिर भी मैं स्वयं को वही व्यक्ति कहता हूँ।
यह “वहीपन” कहाँ से आता है?
क्या यह स्मृति है?
क्या यह चेतना है?
क्या यह केवल मन की निरन्तरता है?
या अस्तित्व के भीतर कोई ऐसी गहरी संरचना है जिसे हम अभी पूरी तरह नहीं समझते?
मैं इसका अन्तिम उत्तर नहीं दे सकता।
और शायद इस अध्याय का ईमानदार निष्कर्ष यही है—
काल वह रहस्य है जिसके भीतर हम रहते हैं, जिसके कारण हम बदलते हैं और जिसके माध्यम से हम अपने अस्तित्व को “पहले” और “अब” के बीच पहचानते हैं।
हम काल को समझने के लिए बैठे थे।
लेकिन अन्ततः पाया— हम स्वयं काल की एक घटना हैं।
आज जो यह प्रश्न पूछ रहा है— “काल क्या है?”
वह भी काल के भीतर जन्मा है।
और सम्भवतः—
जिस दिन यह प्रश्न पूरी तरह समाप्त हो जाएगा, उस दिन मनुष्य के लिए काल का रहस्य नहीं, बल्कि स्वयं अस्तित्व का रहस्य भी समाप्त हो जाएगा।
अंतिम प्रश्न
यदि अस्तित्व का प्रत्येक अनुभव काल के भीतर घटित होता है, तो क्या काल के बिना अस्तित्व की कल्पना सम्भव है—या “अस्तित्व” शब्द का अर्थ ही काल से निर्मित है?
मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)
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