चिंतन — अध्याय–15 : काल क्या है? — भाग–2 : काल — शब्द से सत्ता तक
चिंतन — अध्याय–15 : काल क्या है? — भाग–2 : काल — शब्द से सत्ता तक
“काल”
एक छोटा-सा शब्द
है।
लेकिन
इसके भीतर भारतीय चिन्तन
का एक अत्यन्त विशाल
प्रश्न छिपा हुआ है।
जब हम कहते हैं—
“समय बीत रहा है।”
तो हम सामान्यतः “समय”
शब्द का प्रयोग करते
हैं।
लेकिन
भारतीय दार्शनिक परम्परा में काल शब्द का अर्थ
केवल बीतते हुए समय से
कहीं अधिक व्यापक है।
यहीं
से एक आवश्यक प्रश्न
उठता है— काल और समय में अन्तर क्या है?
क्या
ये दोनों केवल एक ही
वस्तु के दो नाम
हैं?
या—
समय वह है जिसे मनुष्य मापता है और काल वह है जिसमें अस्तित्व घटित होता है?
यह भेद जितना सूक्ष्म
है, उतना ही महत्त्वपूर्ण
भी।
“काल”
शब्द को समझने की कठिनाई
किसी
भी दार्शनिक शब्द को समझने
के लिए केवल उसका
शब्दकोशीय अर्थ पर्याप्त नहीं
होता।
क्योंकि
शब्द समय के साथ
अपना अर्थ विस्तृत करते
हैं।
“काल”
भी ऐसा ही शब्द
है।
भारतीय
वाङ्मय में काल का
सम्बन्ध— समय, परिवर्तन, मृत्यु ,नियत क्रम, ऋतु, युग, अनन्तता
और कई बार— सम्पूर्ण
अस्तित्व की गति से जोड़ा गया
है।
यही
कारण है कि “काल”
को केवल अंग्रेज़ी के
Time का सीधा अनुवाद मान
लेना दार्शनिक रूप से पर्याप्त
नहीं।
Time एक
विशिष्ट आधुनिक वैज्ञानिक और दार्शनिक अवधारणा
है।
काल
भारतीय चिन्तन में एक विस्तृत
अस्तित्वगत प्रश्न है।
दोनों
में सम्बन्ध है।
लेकिन
दोनों पूर्णतः समान नहीं हैं।
काल—जो बदलता है
भारतीय
चिन्तन में काल का
एक अत्यन्त प्राचीन सम्बन्ध परिवर्तन से दिखाई देता
है।
जो बदलता है— वह काल
के भीतर बदलता है।
बालक
युवा होता है। युवा वृद्ध
होता है। वृक्ष बीज से उत्पन्न
होता है। बीज वृक्ष से।
नदी
बहती है। शरीर बदलता है। मन बदलता है। विचार बदलते हैं।
परिस्थितियाँ
बदलती हैं।
अर्थात्—
काल को अनुभव करने का सबसे पहला मार्ग परिवर्तन है।
लेकिन
यहाँ एक सूक्ष्म समस्या
है।
हम कह सकते हैं—
परिवर्तन काल में होता
है।
लेकिन
हम यह भी कह
सकते हैं— काल परिवर्तन
के क्रम का नाम
है।
दोनों
वाक्य एक जैसे दिखाई
देते हैं।
लेकिन
दार्शनिक रूप से दोनों
के अर्थ बिल्कुल अलग
हैं।
पहले
वाक्य में— काल पहले से विद्यमान है।
परिवर्तन
उसमें घटित होता है।
दूसरे
वाक्य में— परिवर्तन पहले है।
काल
उस परिवर्तन को समझने से
उत्पन्न होता है।
यहीं
काल-दर्शन का मूल विवाद
प्रारम्भ होता है।
क्या
काल स्वयं कोई वस्तु है?
हम पत्थर को छू सकते
हैं। जल को देख सकते
हैं। अग्नि को अनुभव कर
सकते हैं।
वायु
का प्रभाव महसूस कर सकते हैं।
लेकिन—
काल को किस इन्द्रिय से अनुभव किया जा सकता है?
हम काल को देखते
नहीं। सुनते नहीं। छूते नहीं।
फिर
भी हम कहते हैं—
“काल है।”
यह अत्यन्त विचित्र स्थिति है।
यदि
काल कोई वस्तु नहीं
है— तो वह
क्या है?
क्या
वह— सम्बन्ध है?
क्या
वह— क्रम है?
क्या
वह— परिवर्तन का माप है?
या—
अस्तित्व की कोई ऐसी मूल संरचना है जिसे इन्द्रियाँ पकड़ नहीं सकतीं?
भारतीय
दर्शनों ने इस प्रश्न
का एक ही उत्तर
नहीं दिया।
यही
भारतीय दार्शनिक परम्परा की विशेषता है।
उसने
काल को लेकर अनेक
दृष्टियों को जन्म दिया।
कहीं
काल को स्वतंत्र द्रव्य
माना गया। कहीं उसे परिवर्तन और
क्रम से जोड़ा गया।
कहीं
उसे प्रकृति के परिणामों के
साथ समझा गया।
और कहीं— काल से परे स्थित सत्ता की कल्पना की
गई।
समय—मापन की भाषा
अब
“समय” की ओर लौटते
हैं।
मनुष्य
ने घटनाओं के बीच अन्तर
को मापने के लिए इकाइयाँ
बनाईं।
क्षण। पल। घड़ी।
दिन। मास। वर्ष । सेकण्ड। मिनट। घण्टा।
यहाँ
एक बात अत्यन्त स्पष्ट
है— मापन की इकाई स्वयं समय नहीं होती।
सेकण्ड
समय नहीं है।
सेकण्ड—
समय की मापन-इकाई है।
इसी
प्रकार घड़ी समय नहीं
है।
घड़ी—
समय के किसी मानक को प्रदर्शित करने वाला उपकरण है।
यह भेद साधारण लगता
है।
लेकिन
आधुनिक विज्ञान और दर्शन दोनों
के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण
है।
क्योंकि
यदि हम मापन को
ही वास्तविकता मान लें—
तो हम यह भूल
सकते हैं कि—
मानव
निर्मित मापन-व्यवस्था और मापी जाने वाली वास्तविकता अलग हो सकती है।
मानचित्र
भूमि नहीं होता।
संख्या
वस्तु नहीं होती।
और घड़ी— काल नहीं होती।
अवधि—काल का मापनीय चेहरा
किसी
घटना के प्रारम्भ और
अन्त के बीच के
अन्तर को हम Duration — अवधि कहते
हैं।
एक दीपक पाँच मिनट
तक जलता है। एक यात्रा
तीन घंटे चलती है।
एक जीवन अस्सी वर्ष तक चलता
है।
यहाँ
हम अवधि की बात
कर रहे हैं।
लेकिन
ध्यान दीजिए— अवधि और काल समान नहीं हैं।
अवधि
किसी घटना के सम्बन्ध
में कही जाती है।
काल
का प्रश्न घटना से व्यापक
हो सकता है।
उदाहरण
के लिए— “यह यात्रा तीन
घंटे चली।”
यह अवधि है।
लेकिन—
“तीन घंटे का होना
सम्भव कैसे है?”
यह काल का प्रश्न
है।
पहला—
मापन का प्रश्न।
दूसरा—
अस्तित्व का प्रश्न।
कालिक
क्रम—पहले और बाद का रहस्य
अब एक और शब्द
पर ध्यान देना आवश्यक है—
Temporal Order — कालिक
क्रम।
एक घटना पहले हुई।
दूसरी बाद में।
हम कहते हैं— A, B से
पहले हुआ।
लेकिन
“पहले” का अर्थ क्या
है?
क्या
“पहले” स्वयं कोई वस्तु है?
नहीं।
फिर
भी बिना “पहले” और “बाद” के
घटनाओं को क्रम में
रखना सम्भव नहीं।
यहाँ
एक महत्त्वपूर्ण बात सामने आती
है— काल का अनुभव शायद केवल प्रवाह से नहीं, क्रम से भी बनता है।
एक घटना। फिर दूसरी घटना। फिर तीसरी। क्या इस क्रम के
लिए समय का बहना
आवश्यक है?
या केवल घटनाओं का
क्रम पर्याप्त है?
यही
वह प्रश्न है जहाँ आधुनिक
दर्शन में Time Flow — समय का प्रवाह और Temporal Order — कालिक क्रम के बीच भेद
किया जाता है।
सम्भव
है— घटनाओं का क्रम वास्तविक हो।
लेकिन—
समय का बहना केवल अनुभव हो।
यह विचार अभी हमें अजीब
लगता है।
क्योंकि
मनुष्य समय को बहता
हुआ अनुभव करता है।
लेकिन
अनुभव और अस्तित्व एक
ही बात नहीं।
भारतीय
चिन्तन में “क्षण”
भारतीय
दर्शन ने समय को
समझने के लिए क्षण
की धारणा पर भी गहन
विचार किया।
क्षण,
क्या है?
क्या
वह समय की सबसे
छोटी इकाई है?
यदि
हाँ— तो उससे छोटी
कोई अवधि सम्भव नहीं?
या क्षण केवल परिवर्तन
की पहचान का दार्शनिक उपकरण
है?
पतञ्जलि
योगदर्शन में क्षण और
क्रम का विचार इसीलिए
अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
योगसूत्र
में— क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः।
का विचार यह संकेत करता
है कि परिवर्तन को
समझने के लिए क्रम
और क्षण को अलग-अलग
नहीं देखा जा सकता।
लेकिन
यहाँ एक सावधानी आवश्यक
है।
पतञ्जलि
का क्षण आधुनिक भौतिकी
के second या Planck time का सीधा पर्याय
नहीं है।
यह एक दार्शनिक और
योगदर्शनीय सन्दर्भ है।
शब्द
समान हो सकते हैं।
प्रश्न
अलग हो सकता है।
यही
कारण है कि भारतीय
दार्शनिक अवधारणाओं को आधुनिक विज्ञान
की शब्दावली में जबरन रख
देना उचित नहीं।
क्या
काल और मृत्यु एक ही दिशा में संकेत करते हैं?
भारतीय
भाषा में “काल” और
“मृत्यु” के बीच एक
गहरा सांस्कृतिक सम्बन्ध दिखाई देता है।
हम कहते हैं— “काल
ने उसे अपने में समा लिया।”
यहाँ
काल केवल समय नहीं
है।
वह—
परिवर्तन की अन्तिम सीमा का प्रतीक बन जाता है।
लेकिन
दार्शनिक रूप से यह
प्रश्न और गहरा है।
क्या
मृत्यु काल का परिणाम
है?
या मृत्यु केवल जीवित अवस्था
से दूसरी अवस्था में परिवर्तन है?
यहाँ
हमें सावधानी रखनी होगी।
मृत्यु
स्वयं इस अध्याय का विषय नहीं है।
लेकिन
मृत्यु यह दिखाती है
कि मनुष्य काल को केवल
घड़ी से नहीं समझता।
मनुष्य
काल को— अपने अस्तित्व की सीमा के रूप में भी अनुभव करता है।
यही
कारण है कि मनुष्य
के लिए काल कभी—
माप है।
कभी
स्मृति है।
कभी
प्रतीक्षा है।
और कभी— अस्तित्व का भय।
काल—रेखा या सम्बन्ध?
अब तक की चर्चा
से एक सम्भावना उभरती
है।
शायद
काल को किसी एक
वस्तु की तरह समझना
सम्भव नहीं।
शायद
काल— परिवर्तन, क्रम और अस्तित्व के बीच का सम्बन्ध है।
लेकिन
यह केवल एक सम्भावना
है।
क्योंकि
यदि काल सम्बन्ध है—
तो प्रश्न उठेगा—
सम्बन्ध
किन वस्तुओं के बीच?
घटनाओं
के बीच?
अवस्थाओं
के बीच?
परिवर्तनों
के बीच?
या—
अस्तित्व और उसके प्रकट होने के बीच?
यहीं
भारतीय कालदर्शन का द्वार खुलता
है।
क्योंकि
भारतीय चिन्तन ने काल को
केवल “कितना समय हुआ?” के
प्रश्न से नहीं देखा।
उसने
पूछा— अस्तित्व किस क्रम में प्रकट होता है?
और इससे भी गहरा
प्रश्न— क्या अस्तित्व स्वयं काल के अधीन है?
अगले
प्रश्न की ओर
अब हम उस मूल
प्रश्न तक पहुँच चुके
हैं जिससे काल का पूरा
दार्शनिक विवाद जन्म लेता है।
यदि
काल और परिवर्तन का
इतना गहरा सम्बन्ध है—
तो—
क्या काल परिवर्तन से उत्पन्न होता है?
यदि
ब्रह्माण्ड में कोई परिवर्तन
न हो—
न गति। न अवस्था-परिवर्तन। न जन्म। न वृद्धि। न क्षय। न कोई घटना।
तो क्या काल फिर
भी रहेगा?
या—
परिवर्तन के समाप्त होते ही काल की हमारी पूरी धारणा भी समाप्त हो जाएगी?
यह प्रश्न केवल काल का
नहीं।
यह—
अस्तित्व की संरचना का प्रश्न है।
मुख्य
प्रश्न
क्या
काल स्वयं कोई सत्ता है, या परिवर्तन, क्रम और अवधि के बीच का सम्बन्ध?
मुख्य
विवाद
काल
को स्वतंत्र वास्तविकता मानने और उसे परिवर्तन/क्रम से उत्पन्न
मानने के बीच दार्शनिक
मतभेद।
आज
की शोध-स्थिति
आधुनिक
दर्शन में समय की
वास्तविकता, कालिक क्रम और समय
के प्रवाह को अलग-अलग
समस्याओं के रूप में
देखा जाता है। विज्ञान
में समय का प्रयोग
अत्यन्त सफल गणितीय ढाँचे
के रूप में होता
है, किन्तु “समय स्वयं क्या
है?” का दार्शनिक प्रश्न
अभी भी खुला है।
अब
भी अनुत्तरित प्रश्न
यदि
परिवर्तन ही न हो, तो क्या काल का अस्तित्व फिर भी सम्भव है?
मुकेश
श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
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