चिंतन — अध्याय–15 : काल क्या है? — भाग–4 : वैदिक और उपनिषदिक दृष्टि में काल

 चिंतनअध्याय–15 : काल क्या है? — भाग–4 : वैदिक और उपनिषदिक दृष्टि में काल

भारतीय कालचिन्तन को समझने के लिए हमें आधुनिक घड़ी से बहुत पीछे जाना होगा।

उस समय सेकण्ड था। न मिनट। न परमाणु घड़ी।

फिर भी भारतीय ऋषि काल से अपरिचित नहीं थे।

उन्होंने काल को घड़ी की सुई में नहीं खोजा।

उन्होंने उसे

सूर्य के उदय में।

ऋतुओं के आवर्तन में।

यज्ञ के क्रम में।

जीवन के परिवर्तन में।

और

सृष्टि के रहस्य में

देखा।

यही कारण है कि वैदिक कालदृष्टि को केवलसमय की प्राचीन गणनामानना उसके वास्तविक दार्शनिक आयाम को बहुत छोटा कर देना होगा।

वेदों में काल का प्रश्न धीरे-धीरे एक बड़े प्रश्न में बदलता हैअस्तित्व किस क्रम में प्रकट होता है?

ऋत और काल

वैदिक चिन्तन में ऋत (ta) की अवधारणा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

ऋत का अर्थ केवलनियमनहीं।

यहब्रह्माण्डीय व्यवस्था, क्रम और सामंजस्य का संकेत है।

सूर्य का उदय। ऋतुओं का क्रम। नक्षत्रों की गति। यज्ञ की विधि। जीवन की व्यवस्था।

इन सबके पीछे ऋषियों ने एक व्यापक क्रमबद्धता का अनुभव किया।

अब प्रश्न उठता हैक्या काल उस क्रम का आधार है?

याकाल स्वयं उसी क्रम की अनुभूति है?

वैदिक चिन्तन ने शायद इस प्रश्न को आधुनिक दार्शनिक शब्दों में नहीं पूछा।

लेकिन उसके मन्त्रों में यह बोध स्पष्ट दिखाई देता है किब्रह्माण्ड अराजक घटनाओं का समूह मात्र नहीं।

उसमें एक क्रम है। एक आवर्तन है। एक व्यवस्था है।

और मनुष्य उसी व्यवस्था के भीतर स्थित है।

यहीं काल का पहला ब्रह्माण्डीय आयाम खुलता है।

 

कालसूक्त का असाधारण संकेत

अथर्ववेद के कालसूक्त में काल के सम्बन्ध में जो विचार मिलता है, वह भारतीय कालचिन्तन की गहराई का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।

मन्त्र कहता हैकालोऽमूं दिवमजनयत्काल इमाः पृथिवीरुत। काले भूतं भव्यं चेषितं वि तिष्ठते॥

काल से आकाश और पृथ्वी का सम्बन्ध जोड़ा गया है।

और भूत तथा भविष्य को भी काल में स्थित बताया गया है।

यहाँ कालघटना के बीच का अन्तराल नहीं।

 वहभूत, भविष्य और अस्तित्व के व्यापक क्षेत्र से जुड़ा हुआ है।

लेकिन यहाँ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है।

इस मन्त्र को आधुनिक भौतिकी के “Time created the universe” जैसे वाक्य में बदल देना उचित नहीं।

वैदिक मन्त्र की भाषादार्शनिक और प्रतीकात्मक है।

आधुनिक विज्ञान की भाषागणितीय और प्रेक्षणीय।

दोनों की पद्धति अलग है।

फिर भी यह मन्त्र एक महान दार्शनिक प्रश्न हमारे सामने रखता है

क्या अस्तित्व को काल से अलग करके समझा जा सकता है?

 

कालसबका आधार?

उसी कालचिन्तन में यह विचार भी आता है किकाले तपः काले ज्येष्ठं काले ब्रह्म समाहितम्।

काल में तप। काल में ज्येष्ठता। काल में ब्रह्म का सम्बन्ध।

यहाँकालका अर्थ केवल बीतते हुए समय के रूप में लेना कठिन है।

क्योंकि तप क्या है?

तपप्रयास और साधना की प्रक्रिया है।

और प्रक्रियाक्रम पर निर्भर है।

एक साधना आज आरम्भ होती है। उसका प्रभाव तुरन्त नहीं दिखाई देता।

अभ्यास दोहराया जाता है। परिवर्तन धीरे-धीरे आता है।

अर्थात्तप स्वयं कालिक है।

लेकिन मन्त्र का संकेत इससे आगे जाता है।

वह काल कोअस्तित्व की व्यापक व्यवस्था के रूप में देखने का मार्ग खोलता है।

यहाँ से काल एक ऐसी अवधारणा बनता है जिसमेंपरिवर्तन, क्रम, विकास, और अस्तित्व एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

काल और सृष्टि

अब वैदिक सृष्टिचिन्तन की ओर देखें।

ऋग्वेद का नासदीय सूक्त एक अत्यन्त असाधारण प्रश्न उठाता हैनासदासीन्नो सदासीत्तदानीम्...”

आरम्भ में असत् था। न सत्।

यहाँ सृष्टि से पहले की स्थिति पर प्रश्न उठाया जाता है।

और अन्त में ऋषि कहता हैयो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन् सो अङ्ग वेद यदि वा वेद।

जो इसका अध्यक्ष हैवह जानता हो।

या शायद जानता हो।

यहाँ एक अत्यन्त गहरी दार्शनिक ईमानदारी दिखाई देती है।

ऋषि सृष्टि के प्रश्न पर निश्चित उत्तर देने की जल्दी नहीं करता।

अब हम पूछ सकते हैंक्या सृष्टि से पहले काल था?

नासदीय सूक्त इस प्रश्न का सीधा उत्तर नहीं देता।

और यही इसकी शक्ति है।

क्योंकि यदि सृष्टि से पहलेकुछ भी नहींथातोपहलेशब्द का अर्थ क्या होगा?

पहलेस्वयं कालिक शब्द है। अर्थात्जब हम कहते हैं— “सृष्टि से पहले क्या था?”

तो सम्भव है कि हम अनजाने में काल को सृष्टि से पहले ही मान चुके हों।

यह प्रश्न आधुनिक ब्रह्माण्ड विज्ञान में भी अत्यन्त कठिन है।

लेकिन भारतीय चिन्तन में इसकी दार्शनिक जड़ें बहुत पुरानी हैं।

 

उपनिषदों का मौन

वेदों में जहाँ काल का ब्रह्माण्डीय संकेत मिलता है, वहीं उपनिषदों में प्रश्न धीरे-धीरे और सूक्ष्म हो जाता है।

उपनिषद पूछते हैं

जो बदलता है, वह क्या है?

जो देखता है, वह क्या है?

जो ज्ञात है और जो ज्ञाता हैउनका सम्बन्ध क्या है?

यहाँ काल का प्रश्न सीधे सामने नहीं आता।

लेकिनकाल का मूल दार्शनिक तनाव उपस्थित रहता है।

क्योंकि यदि सब कुछ परिवर्तनशील हैतो परिवर्तन को पहचानने वाला क्या है?

यदि शरीर बदलता हैतो शरीर कामैंकौन है?

यदि विचार बदलते हैंतो विचारों को जानने वाली सत्ता क्या है?

यदि अनुभव आते-जाते हैंतो अनुभव का साक्षी क्या है?

यहीं से काल और चेतना का सम्बन्ध उभरता है।

 

कठोपनिषद और मृत्यु का प्रश्न

कठोपनिषद में नचिकेता मृत्यु के सम्मुख खड़ा है।

यह अध्याय मृत्यु का अध्ययन नहीं कर रहा।

फिर भी नचिकेता का प्रश्न काल को समझने के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

क्योंकि मृत्यु के सामने मनुष्य पहली बार अपने अस्तित्व की कालिक सीमा को सीधे देखता है।

नचिकेता पूछता हैअस्तीत्येके नायमस्तीति चैके...”

कुछ कहते हैंमृत्यु के बाद कुछ है।

कुछ कहते हैंकुछ नहीं।

यम के सामने खड़ा नचिकेता केवल मृत्यु का प्रश्न नहीं पूछ रहा।

वह अप्रत्यक्ष रूप से यह भी पूछ रहा हैक्या जो काल में बदलता है, वही सम्पूर्ण अस्तित्व है?

यदि शरीर बदलता है। वृद्ध होता है। समाप्त होता है।

तो क्या अस्तित्व भी उसी प्रकार समाप्त होता है?

यहाँ उपनिषदिक चिन्तन काल के भीतर स्थित परिवर्तनशील सत्ता और उसके पार सम्भावित अपरिवर्तनशील तत्व के बीच भेद की दिशा में बढ़ता है।

यहीं से आगे चलकरकाल और कालातीत का प्रश्न जन्म लेता है।

 

भगवद्गीता में काल

भारतीय कालचिन्तन का एक अत्यन्त प्रभावशाली वाक्य भगवद्गीता में मिलता है

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो...” यहाँ श्रीकृष्ण स्वयं कोकाल के रूप में व्यक्त करते हैं।

यह वाक्य अत्यन्त गम्भीर है।

क्योंकि यहाँ कालघड़ी नहीं। मापन नहीं। समय की अवधि नहीं।

बल्किसृष्टि के परिवर्तन और विनाश की विराट शक्ति के रूप में प्रकट होता है।

लेकिन इस श्लोक को भी सावधानी से समझना होगा।

यह आधुनिक विज्ञान का “Time is a physical force” जैसा कथन नहीं।

यहगीता के दार्शनिक और आध्यात्मिक संवाद का सन्दर्भ है।

यहाँ काल का सम्बन्धविश्व-व्यापी परिवर्तन और विनाश से स्थापित होता है।

और यही भारतीय कालचिन्तन की एक विशेषता हैकाल केवलबीततानहीं। वहरूपों को बदलता है।

 

काल और युग

भारतीय परम्परा में काल का एक और महत्त्वपूर्ण रूप हैयुग।

सतयुग। त्रेता। द्वापर।कलि।

इन युगों को केवल ऐतिहासिक कालखंड मानना भारतीय परम्परा की सम्पूर्ण कल्पना को समझना नहीं होगा।

युगनैतिक, सामाजिक और ब्रह्माण्डीय परिवर्तन की व्यापक अवधारणा से जुड़े हैं।

यहाँ समय केवल वर्षों की गणना नहीं।

समयअस्तित्व की गुणवत्ता में परिवर्तन का संकेत भी बन जाता है।

यही कारण है कि भारतीय कालचिन्तन मेंकितना समय बीता?”

से अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न कभी-कभी यह हो जाता हैसमय के साथ अस्तित्व का स्वरूप क्या हुआ?”

यह आधुनिक समय-मापन से पूर्णतः अलग दृष्टि है।

 

चक्र और काल

अब हम उस विचार के निकट पहुँच रहे हैं जिसे भारतीय कालचिन्तन की विशिष्ट पहचान माना जाता है

कालचक्र।

दिन आता है। रात आती है। फिर दिन आता है।

ऋतु बदलती है। फिर लौटती है।

चन्द्रमा घटता है। फिर बढ़ता है।

जीवन जन्म लेता है। फिर समाप्त होता है।

भारतीय मन ने इस आवर्तन में केवल प्राकृतिक पुनरावृत्ति नहीं देखी।

उसने पूछाक्या अस्तित्व का मूल स्वभाव ही आवर्तमय है?

लेकिन यहाँ एक अत्यन्त आवश्यक प्रश्न अभी बाकी हैक्या आवर्तन का अर्थ समय का चक्राकार होना है?

यहीं हमें भारतीय कालचिन्तन को आधुनिक दार्शनिक प्रश्नों से जोड़ना होगा।

क्योंकिघटनाओं का लौटना और समय का लौटना एक ही बात नहीं।

यह अन्तर आगे के भागों में निर्णायक होगा।

 

कालवेद से उपनिषद तक

अब तक की यात्रा में एक परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देता है।

वैदिक चिन्तन में कालब्रह्माण्डीय व्यवस्था और अस्तित्व के व्यापक क्रम  से जुड़ता है।

उपनिषदिक चिन्तन में प्रश्न और भीतर जाता हैपरिवर्तनशील जगत और अपरिवर्तनशील सत्य के सम्बन्ध तक।

यहीं से एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रश्न जन्म लेता हैयदि काल में सब कुछ बदलता है, तो क्या ब्रह्म भी काल के भीतर है?

यदि ब्रह्म काल में हैतो क्या ब्रह्म भी परिवर्तनशील है?

और यदि ब्रह्म काल से परे हैतो काल का ब्रह्म से सम्बन्ध क्या है?

यह प्रश्न भारतीय दर्शन के अगले महान विमर्श का आधार बनेगा।

मुख्य प्रश्न

वैदिक और उपनिषदिक चिन्तन में काल केवल समय है, या अस्तित्व और परिवर्तन की ब्रह्माण्डीय व्यवस्था?

मुख्य विवाद

वैदिक मन्त्रों और उपनिषदिक प्रश्नों को आधुनिक “Time” की अवधारणा से सीधे समान मानना बनाम उन्हें उनके अपने दार्शनिक सन्दर्भ में समझना।

आज की शोध-स्थिति

वैदिक कालचिन्तन को आधुनिक वैज्ञानिक समय की पूर्वघोषणा मानना शोधपरक रूप से उचित नहीं। किन्तु वैदिक और उपनिषदिक साहित्य में काल, क्रम, परिवर्तन, सृष्टि और अस्तित्व के सम्बन्ध में गहरे दार्शनिक प्रश्न अवश्य उपस्थित हैं।

अब भी अनुत्तरित प्रश्न

यदि ब्रह्म अपरिवर्तनशील है, तो क्या वह काल से परे है?

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)

 

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