चिंतन — अध्याय–15 : काल क्या है? — भाग–7 : कालचक्र — क्या समय रैखिक है?
चिंतन — अध्याय–15 : काल क्या है? — भाग–7 : कालचक्र — क्या समय रैखिक है?
अब तक हमने काल
को—
क्षण
और क्रम
के स्तर पर देखा।
अब प्रश्न बदलता है। यदि घटनाएँ क्रम में घटित
होती हैं—
तो क्या यह क्रम
एक सीधी रेखा है?
क्या—
एक आरम्भ है।
फिर
एक निरन्तर आगे बढ़ना।
और अन्त में— एक
अन्तिम बिन्दु?
या—
क्या अस्तित्व स्वयं लौटता है?
ऋतुएँ
लौटती हैं। चन्द्रमा की कलाएँ लौटती
हैं।
दिन
के बाद रात आती
है। रात के बाद दिन।
भारतीय
ऋषि ने इस आवर्तन
को केवल प्रकृति का
खेल नहीं माना।
यहीं
से— कालचक्र
का विचार जन्म लेता है।
रेखा और चक्र
रैखिक
समय की कल्पना सरल
है। एक रेखा कीजिए।
बायाँ
सिरा— अतीत।
बीच—
वर्तमान।
दायाँ
सिरा— भविष्य।
समय—बाएँ से दाएँ
बढ़ता है।
यह चित्र आधुनिक मनुष्य की सामान्य मानसिक
संरचना से बहुत निकट
है।
हम कहते हैं— “समय
आगे बढ़ता है।”
“भविष्य
सामने है।” “अतीत पीछे छूट
गया।”
लेकिन
चक्र में— आगे और पीछे
का अर्थ बदल जाता
है। एक बिन्दु से यात्रा प्रारम्भ
कीजिए।
घूमते
हुए उसी बिन्दु पर
लौट आइए। क्या आपने पीछे लौटकर
यात्रा की?
नहीं। आप
लगातार आगे बढ़ते रहे।
लेकिन—
आप उसी स्थान पर लौट आए।
यहीं
चक्र और रेखा का
दार्शनिक अन्तर दिखाई देता है।
भारतीय
कालचिन्तन का आवर्त
भारतीय
परम्परा में— कालचक्र, युगचक्र, संसारचक्र, जन्मचक्र,
जैसे शब्द मिलते हैं।
इन सभी में एक
साझा संकेत है—
अस्तित्व
को केवल एक बार घटित होने वाली घटना के रूप में नहीं देखा गया।
सृष्टि, स्थिति,
परिवर्तन, विनाश, और पुनः
प्रकट होना।
यह आवर्तमय दृष्टि भारतीय चिन्तन की एक महत्त्वपूर्ण
विशेषता है।
लेकिन
यहाँ हमें एक गम्भीर
सावधानी रखनी होगी।
घटनाओं
का चक्राकार होना और समय का स्वयं चक्राकार होना एक ही बात नहीं।
यदि
प्रत्येक वर्ष वसन्त लौटता
है— तो इससे यह
सिद्ध नहीं होता कि—
समय पीछे लौट गया।
वसन्त
लौटा।समय आवश्यक रूप से नहीं।
यही भेद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
कालचक्र
और प्रकृति
प्रकृति
को देखें।बीज, अंकुर, पौधा, वृक्ष, फल, फिर
बीज, यह एक आवर्त है।
लेकिन
क्या वही बीज वापस
आया?
समान
रूप दिखाई दे सकता है।
लेकिन— घटना बिल्कुल वही नहीं।
यहीं
भारतीय कालचिन्तन को सरल “सब
कुछ दोहराता है” के रूप
में समझना गलत होगा।
आवर्तन
का अर्थ— पूर्ण पुनरावृत्ति
नहीं। कभी-कभी— रूप का लौटना होता है।
कभी—
प्रक्रिया का लौटना।
और कभी— अस्तित्व की व्यापक लय का लौटना।
इसलिए
कालचक्र को— यांत्रिक पुनरावृत्ति नहीं समझना चाहिए।
ऋतु
लौटती है—क्या समय लौटता है?
ग्रीष्म
आता है,वर्षा आती है, शरद आती
है, शीत आती है, फिर— ग्रीष्म,
हम कहते हैं— “ऋतुचक्र चलता है।”
लेकिन—
समय पीछे नहीं लौटता।
यह उदाहरण एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण
दार्शनिक बात समझाता है—
चक्र परिवर्तन के स्वरूप का हो सकता है; काल की दिशा का नहीं।
यही
कारण है कि— Cyclical Process — चक्रीय प्रक्रिया
और—Cyclical
Time — चक्रीय समय को एक नहीं
मानना चाहिए।
पहली—
घटनाओं की पुनरावृत्ति या
आवर्तन है।
दूसरी—
काल की मूल संरचना
के बारे में दावा
है।
भारतीय
परम्परा में इन दोनों
का सम्बन्ध अवश्य है।
लेकिन
आधुनिक शोध की दृष्टि
से इनके बीच स्पष्ट
भेद रखना आवश्यक है।
कालचक्र
और युग
भारतीय
कालदर्शन में युगों की
अवधारणा विशेष महत्त्व रखती है। सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलि।
इनका
क्रम केवल ऐतिहासिक समय
की गणना नहीं। इनके भीतर—
मानव और विश्व-व्यवस्था की बदलती स्थिति का भी विचार
है।
यहाँ
समय— केवल यह नहीं
पूछता— “कितने वर्ष बीते?”
बल्कि—
“अस्तित्व की अवस्था क्या हुई?” यह एक अत्यन्त
अलग कालदृष्टि है।
आधुनिक
घड़ी समय को— मापती
है।
युग-दृष्टि समय को— अर्थ
और अवस्था से जोड़ती है।
दोनों
को एक-दूसरे का
विकल्प नहीं माना जा
सकता।
क्या
भारतीय कालदर्शन पूरी तरह चक्रीय है?
यह प्रश्न बहुत महत्त्वपूर्ण है।
और इसका सरल उत्तर— नहीं।
भारतीय
परम्परा के भीतर भी
काल को लेकर अनेक
दृष्टियाँ हैं।
कहीं—
चक्र है।
कहीं—
क्रम है।
कहीं—
क्षण है।
कहीं—कल्प और महाकल्प
की विशालता है।
इसलिए
यह कहना— “भारतीय दर्शन समय को पूर्णतः चक्रीय मानता है”
अत्यधिक
सरलीकरण होगा। अधिक सही कथन यह
है—
भारती चिन्तन
ने अस्तित्व और सृष्टि को समझने के लिए चक्रीय और आवर्तमय कालदृष्टि को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान दिया।
कालचक्र
और महाकाल की दिशा
अब हम उस विचार
के निकट पहुँच रहे
हैं जिसे आपके दिए
हुए कालचिन्तन में विशेष महत्त्व
मिला है—
महाकाल।
लेकिन
यहाँ भी क्रम बनाए
रखना आवश्यक है।
महाकाल
को अभी— काल से बाहर स्थित सत्ता
कहकर
निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। पहले हमें यह समझना
होगा कि— यदि कालचक्र
है—
तो चक्र के भीतर—
आवर्तन कैसे सम्भव है?
और—
चक्र को देखने वाला
कौन
है? भारतीय प्रतीक-चिन्तन में यही प्रश्न
आगे— काल और महाकाल
के सम्बन्ध तक पहुँचता है।
काल—
गति, आवर्तन, परिवर्तन,
महाकाल—
इस सम्पूर्ण काल-कल्पना का
दार्शनिक प्रतिरूप।
यहाँ
महाकाल को वैज्ञानिक सत्ता
की तरह नहीं—
भारतीय
तत्त्वचिन्तन के प्रतीक के रूप में
समझना होगा।
क्या
चक्र में कोई अन्त है?
यदि
समय चक्र है— तो
प्रश्न उठता है— क्या
उसका कोई अन्त है?
यदि
अन्त है— तो वह
चक्र नहीं, सीमित चक्र होगा।
यदि
अन्त नहीं— तो वह अनन्त
आवर्तन होगा।
लेकिन—
अनन्त आवर्तन और कालातीतता समान नहीं।
एक चक्र अनन्त बार
घूम सकता है।
फिर
भी वह— काल के भीतर हो सकता है।
यह अन्तर हमें आगे बहुत
सावधानी से समझना होगा।
क्योंकि
भारतीय चिन्तन में— कालचक्र
और—
महाकाल
को एक ही मान
लेना दार्शनिक भूल होगी।
रैखिकता
और चक्रीयता—क्या दोनों सम्भव हैं?
अब एक और सम्भावना
पर विचार करें।
क्या
ऐसा हो सकता है
कि— घटनाएँ चक्रीय हों।
लेकिन—
समय की संरचना रैखिक हो।
उदाहरण
के लिए— हर वर्ष
ऋतुचक्र लौटता है।
लेकिन
इतिहास आगे बढ़ता है।
व्यक्ति
का जीवन जन्म से
मृत्यु तक एक दिशा
में चलता है।
लेकिन
प्रकृति में चक्र चलते
रहते हैं।
अर्थात्—
एक ही ब्रह्माण्ड में—
रैखिक
और चक्रीय प्रक्रियाएँ साथ-साथ हो सकती हैं।
यह विचार अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि इससे हम एक
बड़े भ्रम से बचते
हैं—
कालचक्र
का अर्थ यह नहीं कि सम्पूर्ण अस्तित्व एक ही घटना को बार-बार दोहरा रहा है।
कालचक्र—भारतीय प्रश्न, अन्तिम उत्तर नहीं
भारतीय
कालचिन्तन ने हमें एक
गहरी दृष्टि दी— अस्तित्व को केवल एक दिशा में भागती हुई रेखा के रूप में मत देखो।
प्रकृति
में आवर्तन है। जीवन में आवर्तन है।
ऋतुओं में आवर्तन है। सृष्टि के सम्बन्ध में
भी आवर्ती कल्पनाएँ हैं।
लेकिन—
इससे यह स्वतः सिद्ध
नहीं होता कि— समय
स्वयं चक्राकार है।
यहीं
दार्शनिक ईमानदारी आवश्यक है।
भारतीय
कालदर्शन का मूल्य इस
बात में नहीं कि
उसने आधुनिक विज्ञान से पहले कोई
वैज्ञानिक मॉडल दे दिया।
उसका
मूल्य इस बात में
है कि— उसने मनुष्य को समय की दिशा पर प्रश्न करना सिखाया।
और अब अगला प्रश्न
स्वाभाविक रूप से सामने
आता है—
क्या
अतीत, वर्तमान और भविष्य वास्तव में तीन अलग अस्तित्व हैं?
या—
क्या हम केवल घटनाओं के क्रम को तीन नाम दे रहे हैं?
मुख्य
प्रश्न
कालचक्र
का अर्थ समय का चक्राकार होना है, या घटनाओं और अस्तित्व की आवर्तमय संरचना?
मुख्य
विवाद
चक्रीय
घटनाओं को चक्रीय समय
मान लेना बनाम Cyclical Process और Cyclical Time के बीच स्पष्ट
दार्शनिक भेद रखना।
आज
की शोध-स्थिति
भारतीय
परम्पराओं में कालचक्र और
आवर्तमय सृष्टि की समृद्ध अवधारणाएँ
मिलती हैं। आधुनिक विज्ञान
में चक्रीय ब्रह्माण्ड के विभिन्न मॉडल
प्रस्तावित हुए हैं, किन्तु
किसी वैज्ञानिक मॉडल को भारतीय
कालचक्र का प्रत्यक्ष प्रमाण
नहीं माना जा सकता।
अब
भी अनुत्तरित प्रश्न
क्या
घटनाओं का क्रम और समय की दिशा एक ही वास्तविकता के दो नाम हैं?
मुकेश
श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)
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