चिंतन — अध्याय–15 : काल क्या है? — भाग–8 : अतीत, वर्तमान और भविष्य — अस्तित्व की तीन अवस्थाएँ या चेतना का विभाजन?
चिंतन — अध्याय–15 : काल क्या है? — भाग–8 : अतीत, वर्तमान और भविष्य — अस्तित्व की तीन अवस्थाएँ या चेतना का विभाजन?
मनुष्य अपने सम्पूर्ण जीवन-अनुभव को सामान्यतः तीन शब्दों में बाँटकर समझता है—अतीत, वर्तमान और भविष्य। हम कहते हैं कि हमने अतीत में कुछ किया, वर्तमान में कुछ कर रहे हैं और भविष्य में कुछ करेंगे। यह विभाजन हमारी भाषा, स्मृति, योजना और दैनिक जीवन में इतना स्वाभाविक रूप से उपस्थित है कि हम प्रायः यह प्रश्न ही नहीं करते कि जिन तीन कालिक अवस्थाओं के आधार पर हम अपने अस्तित्व को समझते हैं, क्या वे वास्तव में अस्तित्व की तीन अलग-अलग अवस्थाएँ हैं, अथवा मनुष्य ने घटनाओं और अनुभवों को व्यवस्थित करने के लिए काल की निरन्तरता को तीन मानसिक नाम दे दिए हैं?
यहीं से काल का प्रश्न घटनाओं के क्रम से आगे बढ़कर अस्तित्व की सत्ता का प्रश्न बन जाता है।
अतीत—जो था, क्या अब भी है?
अतीत के विषय में हमारी सामान्य धारणा अत्यन्त स्पष्ट प्रतीत होती है—जो घट चुका, वह अतीत है। लेकिन जैसे ही हम इस सरल वाक्य को थोड़ा गहराई से देखते हैं, इसके भीतर एक कठिन दार्शनिक प्रश्न छिपा हुआ दिखाई देता है—जो घट चुका, वह अब कहाँ है?
मेरे बचपन की कोई घटना, वर्षों पहले कही गई कोई बात, किसी व्यक्ति से हुई कोई मुलाकात या किसी स्थान पर बिताया गया कोई दिन—इनमें से कोई भी घटना इस समय घटित नहीं हो रही, फिर भी हम निःसंकोच कहते हैं कि “वे घटनाएँ हुई थीं।” इस छोटे-से वाक्य में “हुई थीं” का प्रयोग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि हम किसी ऐसी घटना के विषय में सत्य का दावा कर रहे हैं जो वर्तमान में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित नहीं है।
यहीं प्रश्न उठता है—क्या किसी घटना का वर्तमान में उपस्थित न होना उसके अस्तित्व के पूर्ण समाप्त हो जाने के समान है?
यदि हम कहें कि अतीत पूर्णतः अस्तित्वहीन है, तो इतिहास, स्मृति और अतीत के सत्य की व्याख्या कठिन हो जाती है; और यदि हम कहें कि अतीत किसी अर्थ में अभी भी अस्तित्व रखता है, तो हमें यह समझाना होगा कि वह अस्तित्व किस प्रकार का है।
घटना और उसका वर्तमान प्रमाण
यहाँ एक अत्यन्त आवश्यक भेद करना होगा—अतीत की घटना और अतीत का वर्तमान प्रमाण एक ही बात नहीं हैं।
मान लीजिए किसी व्यक्ति का जन्म हुआ; जन्म की घटना अब घटित नहीं हो रही, लेकिन उसका जन्म प्रमाणपत्र आज भी मौजूद हो सकता है, किसी व्यक्ति की स्मृति में वह घटना सुरक्षित हो सकती है और उस घटना के परिणामस्वरूप निर्मित कोई सामाजिक या भौतिक स्थिति वर्तमान में दिखाई दे सकती है। लेकिन प्रमाणपत्र, स्मृति या वर्तमान प्रभाव को स्वयं जन्म की घटना नहीं कहा जा सकता।
इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि—
अतीत की घटना और अतीत के वर्तमान अवशेष अलग-अलग वास्तविकताएँ हैं।
अक्सर मनुष्य अतीत के प्रमाण को ही अतीत का वर्तमान अस्तित्व समझ लेता है, जबकि सम्भव है कि वर्तमान में केवल अतीत की छाप उपस्थित हो और अतीत स्वयं उस रूप में उपस्थित न हो जिसमें वह घटित हुआ था।
यह अन्तर छोटा दिखाई देता है, लेकिन काल-दर्शन के लिए अत्यन्त निर्णायक है।
वर्तमान—क्या वह एक वास्तविक अवधि है?
अब प्रश्न वर्तमान का है, जिसे मनुष्य सहज रूप से सबसे अधिक वास्तविक मानता है।
हम कहते हैं—“अभी।”
लेकिन यह “अभी” कितना बड़ा है?
क्या वर्तमान एक दिन है, एक घण्टा, एक सेकण्ड या केवल एक क्षण?
यदि हम वर्तमान को एक सेकण्ड मान लें, तो उस सेकण्ड का प्रारम्भिक भाग हमारे अनुभव में बीत चुका होगा और उसका अन्तिम भाग अभी आने वाला होगा। यदि हम वर्तमान को एक क्षण मानें, तो फिर प्रश्न उठेगा कि उस क्षण की कोई अवधि है या नहीं। यदि उसकी अवधि है, तो वह स्वयं एक छोटा-सा काल-अन्तराल होगा; और यदि उसकी कोई अवधि नहीं है, तो यह समझना कठिन होगा कि वह किसी अनुभव का आधार कैसे बन सकता है।
यहीं वर्तमान की सबसे बड़ी दार्शनिक कठिनाई सामने आती है—
जिसे हम सबसे अधिक वास्तविक मानते हैं, उसका अपना स्वरूप ही सबसे कम स्पष्ट है।
वर्तमान—एक कालिक बिन्दु?
यदि हम एक सीधी रेखा की कल्पना करें और उस पर एक बिन्दु रखें, तो बिन्दु का स्थान तो होता है, लेकिन उसकी कोई लम्बाई नहीं होती। क्या वर्तमान भी अतीत और भविष्य के बीच स्थित किसी ऐसे ही कालिक बिन्दु के समान है?
यदि वर्तमान केवल एक सीमा है, तो उसका कोई विस्तार नहीं होगा; लेकिन यदि उसका कोई विस्तार नहीं है, तो अनुभव का प्रश्न कठिन हो जाएगा, क्योंकि हम किसी घटना को “अभी घट रही है” तभी कहते हैं जब उसके अनुभव के लिए किसी न किसी प्रकार की कालिक अवधि उपलब्ध हो।
दूसरी ओर, यदि हम वर्तमान को विस्तृत करते हैं, तो उस विस्तार के भीतर अतीत और भविष्य के अंश प्रवेश करने लगते हैं।
इस प्रकार एक विचित्र दार्शनिक स्थिति उत्पन्न होती है—
वर्तमान को जितना विस्तृत करें, वह उतना ही अतीत और भविष्य से मिश्रित होता जाता है; और जितना सूक्ष्म करें, उतना ही उसका अनुभवगत अस्तित्व कठिन होता जाता है।
भविष्य—क्या वह अभी अस्तित्व रखता है?
भविष्य का प्रश्न अतीत से भी अधिक जटिल है, क्योंकि अतीत के विषय में कम-से-कम इतना कहा जा सकता है कि कोई घटना घट चुकी है, जबकि भविष्य के विषय में हम यह भी नहीं कह सकते कि घटना घट चुकी है।
इसलिए प्रश्न उठता है—
क्या भविष्य का कोई अस्तित्व है?
यदि हम कहें कि भविष्य का कोई अस्तित्व नहीं है, तो भविष्य केवल सम्भावनाओं का नाम होगा; लेकिन यदि हम कहें कि भविष्य किसी अर्थ में अस्तित्व रखता है, तो हमें यह बताना होगा कि वह किस रूप में अस्तित्व रखता है, क्योंकि भविष्य की घटना अभी घटित घटना नहीं है।
यहाँ सम्भावना और वास्तविकता के बीच स्पष्ट अन्तर करना आवश्यक है।
कल वर्षा हो सकती है—यह एक सम्भावना है; लेकिन वर्षा अभी घटित नहीं हुई। अतः भविष्य की सम्भावना को भविष्य की वास्तविकता नहीं कहा जा सकता।
मनुष्य की सबसे बड़ी भूलों में से एक यह है कि वह कभी-कभी अपनी कल्पना की निश्चितता को भविष्य की वास्तविकता समझने लगता है।
क्या भविष्य पहले से मौजूद है?
अब एक और गम्भीर सम्भावना पर विचार करें।
मान लीजिए कि भविष्य किसी व्यापक अर्थ में पहले से अस्तित्व रखता है।
तब प्रश्न उठेगा—
क्या हम भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं, या केवल उस भविष्य तक पहुँच रहे हैं जो पहले से अस्तित्व में है?
हमारी सामान्य भाषा कहती है कि “भविष्य आ रहा है”, लेकिन यदि भविष्य पहले से किसी रूप में वास्तविक है, तो सम्भव है कि भविष्य हमारी ओर न आ रहा हो; सम्भवतः हम स्वयं उस कालिक अवस्था की ओर बढ़ रहे हों।
यह केवल शब्दों का अन्तर नहीं है।
यह समय की पूरी दार्शनिक संरचना को बदल देता है।
क्योंकि एक दृष्टि में भविष्य अभी अस्तित्वहीन है और दूसरी दृष्टि में भविष्य अस्तित्व की व्यापक संरचना का एक भाग हो सकता है।
Presentism — वर्तमानवाद
समकालीन दर्शन में एक दृष्टिकोण Presentism — वर्तमानवाद कहलाता है। इसके अनुसार केवल वर्तमान वास्तविक है; अतीत अब अस्तित्व में नहीं है और भविष्य अभी अस्तित्व में नहीं आया है।
यह दृष्टि हमारे सामान्य अनुभव के अत्यन्त निकट प्रतीत होती है, क्योंकि हम अतीत को स्मृति के माध्यम से जानते हैं, भविष्य की कल्पना करते हैं, लेकिन जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव वर्तमान में ही करते हैं।
वर्तमानवाद का मूल तर्क यही है कि—
जो अभी अस्तित्व में नहीं है, उसे वास्तविक मानने की आवश्यकता क्यों हो?
लेकिन इस दृष्टि के सामने एक कठिन प्रश्न खड़ा होता है—यदि अतीत अब पूर्णतः अस्तित्वहीन है, तो यह कथन कि “अतीत में यह घटना घटित हुई थी” किस प्रकार सत्य है?
क्या अतीत का सत्य केवल वर्तमान में मौजूद प्रमाण पर निर्भर है?
या—
क्या अतीत की घटना का कोई ऐसा अस्तित्व था जो वर्तमान से अलग प्रकार का था?
Eternalism — शाश्वतवाद
इसके विपरीत Eternalism — शाश्वतवाद की दृष्टि यह सम्भावना प्रस्तुत करती है कि अतीत, वर्तमान और भविष्य किसी व्यापक अर्थ में समान रूप से वास्तविक हो सकते हैं।
इस दृष्टि में वर्तमान को अस्तित्व की दृष्टि से कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं होता; वह केवल हमारी स्थिति का नाम हो सकता है।
इसे समझने के लिए कभी-कभी सम्पूर्ण मानचित्र का उदाहरण दिया जाता है—मानचित्र में सभी स्थान अपने-अपने स्थान पर उपस्थित होते हैं, यद्यपि यात्री एक समय में केवल एक स्थान पर होता है।
इसी प्रकार, यदि काल को एक व्यापक संरचना के रूप में देखा जाए, तो सम्भव है कि अतीत, वर्तमान और भविष्य उस संरचना में अपने-अपने कालिक स्थान पर हों।
लेकिन यहाँ एक अत्यन्त कठिन प्रश्न उठता है—
यदि भविष्य भी किसी अर्थ में वास्तविक है, तो हम उसे अभी अनुभव क्यों नहीं करते?
यहीं से काल की सत्ता का प्रश्न कालानुभूति के प्रश्न से जुड़ने लगता है।
Growing Block Theory — बढ़ता हुआ काल-खण्ड
इन दोनों दृष्टियों के बीच एक अन्य दार्शनिक सम्भावना भी प्रस्तुत की गई है, जिसे सामान्यतः Growing Block Theory — बढ़ते हुए काल-खण्ड का सिद्धान्त कहा जाता है।
इस दृष्टि के अनुसार अतीत और वर्तमान वास्तविक हैं, जबकि भविष्य अभी वास्तविकता का हिस्सा नहीं बना है। जो घटित हो चुका, वह अस्तित्व के कालिक खण्ड में सम्मिलित हो गया और जो अभी घटित नहीं हुआ, वह उस खण्ड के बाहर है।
इस दृष्टि में वास्तविकता मानो—
घटित घटनाओं के साथ विस्तृत होती जाती है।
लेकिन यहाँ भी कठिन प्रश्न उपस्थित हैं।
यदि कालिक खण्ड बढ़ रहा है, तो—
वह किसके सापेक्ष बढ़ रहा है?
और—
“अब” की सीमा कहाँ है?
इस प्रकार कोई भी दार्शनिक सिद्धान्त काल के प्रश्न को पूरी तरह समाप्त नहीं करता; वह केवल प्रश्न को एक नए रूप में हमारे सामने रखता है।
क्या तीनों काल वास्तव में तीन हैं?
अब हम मूल प्रश्न पर लौट सकते हैं।
अतीत।
वर्तमान।
भविष्य।
क्या ये वास्तव में तीन अलग-अलग वास्तविकताएँ हैं?
सम्भव है कि ऐसा न हो।
किसी घटना के घटित हो जाने के बाद हम उसे अतीत कहते हैं; जो घटना अभी घट रही है उसे वर्तमान और जो अभी घटित नहीं हुई उसे भविष्य कहते हैं।
इस दृष्टि से सम्भव है कि—
काल स्वयं तीन भागों में विभाजित न हो, बल्कि मनुष्य ने काल की निरन्तरता को अनुभव और भाषा की सुविधा के लिए तीन नाम दे दिए हों।
लेकिन यहाँ भी सावधानी आवश्यक है, क्योंकि यह मान लेना कि मनुष्य ने किसी वस्तु को तीन नाम दे दिए, अपने-आप यह सिद्ध नहीं करता कि वास्तविकता भी उसी प्रकार विभाजित नहीं है।
भाषा वास्तविकता को व्यक्त करती है, लेकिन हमेशा यह सिद्ध नहीं करती कि वास्तविकता का वास्तविक स्वरूप भाषा की संरचना जैसा ही है।
काल का सबसे कठिन प्रश्न
अब एक अत्यन्त विचित्र स्थिति हमारे सामने है।
अतीत वर्तमान में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित नहीं।
भविष्य अभी घटित नहीं।
और वर्तमान इतना सूक्ष्म है कि उसे स्थिर रूप से पकड़ना कठिन है।
फिर—
मनुष्य काल का अनुभव करता कैसे है?
हम अतीत को स्मृति में पुनर्निर्मित करते हैं, भविष्य को कल्पना में निर्मित करते हैं और वर्तमान को “अभी” के रूप में अनुभव करते हैं।
तो क्या सम्भव है कि अतीत और भविष्य की हमारी अनुभूति चेतना की संरचना पर निर्भर हो?
यदि ऐसा है, तो काल का अगला प्रश्न केवल भौतिक या दार्शनिक नहीं रहेगा; वह मनुष्य के अनुभव की संरचना से जुड़ जाएगा।
लेकिन उससे पहले एक और निर्णायक प्रश्न हमारे सामने है—
क्या समय वास्तव में बहता है?
या—
अतीत, वर्तमान और भविष्य केवल घटनाओं के कालिक क्रम के लिए प्रयुक्त नाम हैं?
मुख्य प्रश्न
क्या अतीत, वर्तमान और भविष्य वास्तव में अस्तित्व की तीन अवस्थाएँ हैं, या मनुष्य द्वारा काल की निरन्तरता का किया गया विभाजन?
मुख्य विवाद
Presentism, Eternalism और Growing Block Theory के बीच यह मूल दार्शनिक विवाद कि वास्तविकता केवल वर्तमान में स्थित है या अतीत तथा भविष्य भी किसी व्यापक अर्थ में अस्तित्व रखते हैं।
आज की शोध-स्थिति
समकालीन दर्शन में अतीत, वर्तमान और भविष्य की सत्ता पर कोई सर्वमान्य निष्कर्ष उपलब्ध नहीं है। कालिक अवस्थाओं की वास्तविकता और समय की अनुभूति को अलग-अलग प्रश्नों के रूप में देखा जाता है, और आधुनिक भौतिकी तथा दर्शन के बीच इस विषय पर निरन्तर विमर्श जारी है।
अब भी अनुत्तरित प्रश्न
यदि अतीत, वर्तमान और भविष्य वास्तविकता के तीन अलग-अलग खण्ड नहीं हैं, तो मनुष्य को समय के प्रवाह का अनुभव क्यों होता है?
मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
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