चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–1 : जब मनुष्य ने पहली बार पूछा “क्यों?”
चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–1 : जब मनुष्य ने पहली बार पूछा “क्यों?”
मनुष्य ने संसार को पहले देखा।
फिर उसने उसे अनुभव किया।
फिर उसने उसमें परिवर्तन को पहचाना।
सूर्य उगा और डूब गया। बीज मिट्टी में पड़ा और उससे अंकुर निकला। बादल आए और वर्षा हुई। आग के पास रखी वस्तु गर्म हुई। कोई व्यक्ति गिरा, घायल हुआ और उसके शरीर में पीड़ा उत्पन्न हुई। मनुष्य ने इन घटनाओं को केवल देखा नहीं; धीरे-धीरे उसने उनके बीच सम्बन्ध खोजने आरम्भ किए।
यहीं से उसके भीतर एक ऐसा प्रश्न जन्मा, जिसने उसकी पूरी बौद्धिक यात्रा की दिशा बदल दी—
“यह क्यों हुआ?”
यह प्रश्न सामान्य दिखाई देता है, किन्तु सम्भवतः मनुष्य की चेतना में उत्पन्न सबसे गहरे प्रश्नों में से एक है। “क्या हुआ?” हमें घटना तक ले जाता है। “कब हुआ?” हमें काल तक ले जाता है। किन्तु “क्यों हुआ?” हमें घटना के पीछे छिपे सम्बन्ध की खोज की ओर ले जाता है। कारणता (Causality) का मूल बीज इसी प्रश्न में छिपा है।
मनुष्य ने जब पहली बार यह समझा होगा कि आग के निकट जाने से ताप का अनुभव होता है, तब उसने केवल एक घटना को याद नहीं रखा होगा; उसने दो घटनाओं के बीच एक सम्बन्ध अनुभव किया होगा। जब उसने देखा होगा कि किसी विशेष ऋतु के बाद वनस्पतियाँ उगती हैं, तब उसने केवल ऋतु और वनस्पति को अलग-अलग घटनाओं की तरह नहीं देखा होगा। उसके भीतर धीरे-धीरे यह धारणा बनी होगी कि कुछ घटनाएँ दूसरी घटनाओं से जुड़ी हुई हैं।
यहीं एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ।
मनुष्य घटनाओं का दर्शक होने से आगे बढ़कर घटनाओं के सम्बन्ध का खोजी बन गया।
लेकिन क्या यह सम्बन्ध वास्तव में प्रकृति में था?
या मनुष्य ने अपनी स्मृति और बुद्धि के आधार पर घटनाओं के बीच सम्बन्ध बना लिया?
यही कारणता का पहला दार्शनिक प्रश्न है।
मनुष्य ने देखा कि एक घटना के बाद दूसरी घटना घटती है। उसने दोनों को जोड़ा। उसने कहा—पहली घटना दूसरी का कारण है। किन्तु यहाँ एक सूक्ष्म समस्या छिपी हुई थी। केवल इतना कि एक घटना पहले हुई और दूसरी बाद में, क्या इससे यह सिद्ध हो जाता है कि पहली घटना दूसरी का कारण है?
यदि मुर्गे के बाँग देने के बाद सूर्य उदय होता है, तो क्या मुर्गे की बाँग सूर्य के उदय का कारण है?
मनुष्य की प्रारम्भिक बुद्धि ने अनेक बार ऐसे सम्बन्ध बनाए होंगे। जहाँ घटनाएँ साथ-साथ दिखाई दीं, वहाँ उसने कारण खोज लिया। जहाँ किसी घटना के बाद दूसरी घटना घटी, वहाँ उसने पहली घटना को दूसरी का कारण मान लिया। कभी यह अनुभव सही था। कभी यह अनुमान गलत।
इस प्रकार कारणता की खोज के साथ-साथ कारणता का भ्रम भी मनुष्य के भीतर जन्मा।
यही कारण है कि कारणता का अध्ययन केवल यह पूछना नहीं है कि “किस कारण से क्या हुआ?” बल्कि यह पूछना भी है कि— हम किसी घटना को किसी दूसरी घटना का कारण मानते ही क्यों हैं?
यह प्रश्न हमें बाहरी संसार से उठाकर मनुष्य के मन तक ले आता है।
मनुष्य अनिश्चितता को सहजता से स्वीकार नहीं करता। जब कोई घटना घटती है और उसके पीछे कोई स्पष्ट कारण दिखाई नहीं देता, तब मन में एक प्रकार की बेचैनी उत्पन्न होती है। अज्ञात घटना मनुष्य को असुरक्षित अनुभव करा सकती है। इसलिए वह कारण खोजता है। कभी वह निरीक्षण करता है। कभी प्रयोग करता है। कभी तर्क करता है। और कभी—जहाँ ज्ञान का अभाव होता है—वहाँ कल्पना से कारण बना लेता है।
इस दृष्टि से देखें तो सभ्यता का इतिहास एक अर्थ में कारण खोजने का इतिहास भी है।
विज्ञान ने पूछा—वर्षा क्यों होती है?
दर्शन ने पूछा—परिवर्तन क्यों होता है?
धर्म ने पूछा—सृष्टि क्यों है?
मनोविज्ञान ने पूछा—मनुष्य ऐसा क्यों सोचता है?
और अस्तित्व ने अन्ततः मनुष्य के सामने एक और प्रश्न रख दिया— क्या हर “क्यों” के पीछे कोई दूसरा “क्यों” छिपा हुआ है?
यहीं कारणता का प्रश्न साधारण अनुभव से उठकर ब्रह्माण्डीय प्रश्न बन जाता है।
यदि बीज से वृक्ष उत्पन्न होता है, तो बीज कहाँ से आया?
यदि बादल वर्षा का कारण हैं, तो बादल किस प्रक्रिया से बने?
यदि किसी घटना का कोई कारण है, तो उस कारण का कारण क्या है?
और यदि प्रत्येक कारण के पीछे कोई दूसरा कारण है, तो यह श्रृंखला कहाँ समाप्त होगी?
या शायद वह कभी समाप्त ही नहीं होती।
कारणता का प्रश्न यहीं से गम्भीर होता है। क्योंकि यदि हम मान लें कि प्रत्येक घटना का कोई कारण है, तो हमें कारणों की एक श्रृंखला स्वीकार करनी होगी। और यदि हम किसी एक बिन्दु पर रुककर कहें—“यह स्वयं अकारण है”—तो हमें यह समझाना होगा कि उस बिन्दु पर कारणता का नियम क्यों समाप्त हो गया।
मनुष्य ने इस प्रश्न का उत्तर अलग-अलग युगों में अलग-अलग प्रकार से खोजा। किसी ने प्रकृति में व्यवस्था देखी। किसी ने ऋत की कल्पना की। किसी ने पदार्थ को मूल कारण माना। किसी ने चेतना को। किसी ने ईश्वर को। किसी ने कहा—कारणों की कोई प्रथम शुरुआत नहीं। और किसी ने यह भी पूछा कि शायद “प्रथम कारण” की हमारी खोज ही हमारी बुद्धि की सीमा का परिणाम है।
किन्तु इन सभी विचारों से पहले एक सरल घटना घट चुकी थी—
मनुष्य ने “क्यों” पूछा था।
वास्तव में सम्भवतः कारणता का जन्म किसी दार्शनिक ग्रन्थ में नहीं, बल्कि मनुष्य की उस पहली जिज्ञासा में हुआ था जिसमें उसने किसी घटना को देखकर उसे केवल स्वीकार नहीं किया।
उसने पूछा— “यह ऐसा ही क्यों हुआ?”
यही प्रश्न मनुष्य को पशु से अलग करता है—ऐसा कहना शायद अतिशयोक्ति होगा, क्योंकि अन्य जीव भी अपने परिवेश में सम्बन्धों को पहचानते हैं। किन्तु मनुष्य ने इन सम्बन्धों को केवल व्यवहार के लिए नहीं, विचार के लिए भी ग्रहण किया। उसने कारणों को स्मृति में रखा, उनकी तुलना की, उन्हें भाषा दी और फिर उनके आधार पर सम्पूर्ण वास्तविकता को समझने का प्रयास किया।
इसलिए कारणता केवल प्रकृति में घटनाओं का सम्बन्ध नहीं है।
यह मनुष्य और वास्तविकता के बीच स्थापित एक बौद्धिक सम्बन्ध भी है।
मनुष्य घटना को देखता है।
फिर उसके पीछे कारण खोजता है।
फिर कारण के पीछे दूसरा कारण खोजता है।
और अन्ततः कभी-कभी वह उस सीमा तक पहुँच जाता है जहाँ प्रश्न बचा रहता है, किन्तु उत्तर की निश्चितता समाप्त हो जाती है।
कारणता की यात्रा यहीं से आरम्भ होती है—घटना से नहीं, बल्कि “क्यों” से।
मुख्य विवाद: क्या कारणता प्रकृति में वास्तविक सम्बन्ध है, या मनुष्य द्वारा घटनाओं को समझने के लिए निर्मित बौद्धिक संरचना?
आज की शोध-स्थिति: आधुनिक विज्ञान कारणात्मक सम्बन्धों को प्रयोग, हस्तक्षेप और कारणात्मक निष्कर्षों के माध्यम से समझने का प्रयास करता है; किन्तु कारणता की अन्तिम दार्शनिक प्रकृति पर पूर्ण सहमति अभी भी नहीं है।
अब भी अनुत्तरित प्रश्न: यदि मनुष्य किसी घटना का कारण नहीं जानता, तो क्या घटना वास्तव में अकारण है—या केवल उसका कारण मनुष्य के ज्ञान की सीमा से बाहर है?
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