चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–2 : कारणता का अर्थ — कारण, कार्य और सम्बन्ध

 चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–2 : कारणता का अर्थ — कारण, कार्य और सम्बन्ध

“क्यों?” पूछना कारणता की यात्रा का आरम्भ था। किन्तु किसी घटना के पीछे कारण खोज लेना ही कारणता को समझ लेना नहीं है।

मनुष्य जब कहता है—“यह इसके कारण हुआ”—तब वह वास्तव में तीन अलग-अलग अवधारणाओं को एक साथ जोड़ रहा होता है।

कारण (Cause)।

कार्य या परिणाम (Effect)।

और—

इन दोनों के बीच का सम्बन्ध (Causal Relation)।

कारणता का वास्तविक प्रश्न इसी तीसरे क्षेत्र में छिपा है।

यदि बीज से वृक्ष उत्पन्न होता है, तो सामान्य दृष्टि कहेगी—बीज कारण है और वृक्ष परिणाम। किन्तु क्या बीज अकेले वृक्ष का कारण है? मिट्टी कहाँ गई? जल? तापमान? प्रकाश? समय? आनुवंशिक संरचना? यदि बीज को पत्थर पर रख दिया जाए, तो क्या उससे वृक्ष उत्पन्न होगा?

यहाँ हमें पहली बार समझ में आता है कि कारण कोई अकेली वस्तु भी हो सकता है और कारणों की एक पूरी संरचना भी।

एक घटना का परिणाम कभी एकमात्र कारण से उत्पन्न नहीं होता। अनेक बार अनेक स्थितियाँ मिलकर किसी परिणाम को सम्भव बनाती हैं। कभी कोई कारण केवल अवसर देता है। कभी कोई कारण प्रक्रिया को आरम्भ करता है। कभी कोई कारण केवल परिणाम की दिशा बदलता है।

इसलिए “कारण” शब्द सुनते ही किसी एक घटना या वस्तु की ओर संकेत कर देना दार्शनिक रूप से पर्याप्त नहीं है।

यहीं कारणता (Causality) कारण से अलग हो जाती है।

कारण एक विशिष्ट घटक हो सकता है।

कारणता वह सम्बन्ध है जिसके भीतर यह समझा जाता है कि किसी परिस्थिति, घटना या प्रक्रिया से कोई दूसरी अवस्था किस प्रकार उत्पन्न हुई।

अर्थात्— कारण एक तत्व है; कारणता उस तत्व और परिणाम के बीच का सम्बन्ध है।

यह अन्तर सूक्ष्म है, किन्तु अत्यन्त महत्त्वपूर्ण।

मान लीजिए किसी व्यक्ति ने पत्थर फेंका और शीशा टूट गया। पत्थर को हम कारण कह सकते हैं। शीशे का टूटना परिणाम है। किन्तु कारणता केवल पत्थर और टूटे हुए शीशे के बीच का सम्बन्ध नहीं है। पत्थर का वेग, उसकी दिशा, शीशे की संरचना और दोनों के बीच हुआ आघात—ये सभी उस प्रक्रिया का हिस्सा हैं जिसने परिणाम उत्पन्न किया।

इसलिए कारणता किसी घटना के पहले उपस्थित किसी वस्तु का नाम नहीं है।

यह उत्पत्ति की प्रक्रिया को समझने का प्रयास है।

यहीं एक दूसरा प्रश्न उठता है— क्या कारण हमेशा परिणाम से पहले होता है?

सामान्य अनुभव कहता है—हाँ।

पहले पत्थर फेंका गया, फिर शीशा टूटा।

पहले आग जलाई गई, फिर जल गर्म हुआ।

पहले बादल बने, फिर वर्षा हुई।

किन्तु यहाँ हमें सावधान रहना होगा। किसी घटना का पहले होना और उसका कारण होना एक ही बात नहीं है।

यदि कोई व्यक्ति कहे कि “मैंने काली शर्ट पहनी और उसके बाद वर्षा हुई, इसलिए वर्षा मेरी शर्ट के कारण हुई”, तो उसका निष्कर्ष स्पष्ट रूप से गलत है। शर्ट पहनना वर्षा से पहले हुआ, किन्तु दोनों घटनाओं के बीच कोई प्रमाणित कारणात्मक सम्बन्ध नहीं है।

इससे एक मूलभूत अन्तर सामने आता है— कालिक क्रम (Temporal Order) कारणता का प्रमाण नहीं है।

घटना A का घटना B से पहले होना केवल यह बताता है कि A पहले घटित हुई।

यह अपने आप यह सिद्ध नहीं करता कि A ने B को उत्पन्न किया।

कारणता के लिए केवल क्रम पर्याप्त नहीं।

कारणता के लिए सम्बन्ध चाहिए।

किन्तु सम्बन्ध भी अनेक प्रकार के होते हैं।

दो घटनाएँ एक साथ घट सकती हैं। उनमें सहसम्बन्ध (Correlation) हो सकता है। वे किसी तीसरे कारण से प्रभावित हो सकती हैं। या वास्तव में उनमें कारणात्मक सम्बन्ध हो सकता है।

उदाहरण के लिए गर्मी के मौसम में आइसक्रीम की बिक्री बढ़ती है और तैरने से होने वाली दुर्घटनाएँ भी बढ़ सकती हैं। क्या आइसक्रीम खाने से दुर्घटनाएँ होती हैं?

नहीं।

दोनों घटनाओं के पीछे एक तीसरी परिस्थिति—गर्मी और जल-गतिविधियों में वृद्धि—हो सकती है।

इसलिए सहसम्बन्ध कारणता नहीं है।

मनुष्य की बुद्धि यहाँ बार-बार भ्रमित होती है। उसे घटनाओं में सम्बन्ध दिखाई देता है और वह शीघ्रता से उसे कारण मान लेता है। कारणता के अध्ययन का एक बड़ा भाग इसी शीघ्र निष्कर्ष से बचने का प्रयास है।

कारणता को समझने के लिए हमें यह पूछना पड़ता है—

यदि कारण उपस्थित न होता, तो क्या परिणाम उसी प्रकार उत्पन्न होता?

यह प्रश्न सरल लगता है, किन्तु इसके भीतर कारणात्मक विचार की गहरी संरचना छिपी है।

यदि पत्थर न फेंका जाता, तो क्या शीशा उसी क्षण उसी प्रकार टूटता?

यदि आग न जलाई जाती, तो क्या जल उसी प्रक्रिया से गर्म होता?

यदि किसी औषधि का प्रयोग न किया जाता, तो क्या रोगी में वही परिवर्तन होता?

इस प्रकार कारणता केवल अतीत की घटनाओं को देखने का नाम नहीं है। इसमें वैकल्पिक सम्भावनाओं की कल्पना भी सम्मिलित होती है।

हम वास्तव में यह पूछते हैं—

यदि कारण न होता, तो क्या परिणाम होता?

यहीं कारणता का सम्बन्ध विज्ञान और दर्शन दोनों से गहरा हो जाता है।

विज्ञान प्रयोग के माध्यम से कारण और परिणाम के सम्बन्ध को जाँचता है। दर्शन पूछता है कि हम कारणता को पहचानते कैसे हैं और कारणात्मक सम्बन्ध की वास्तविक प्रकृति क्या है।

कभी-कभी कारणता प्रत्यक्ष दिखाई देती है।

कभी वह प्रयोग से सिद्ध होती है।

कभी वह सांख्यिकीय सम्भावना के आधार पर अनुमानित की जाती है।

और कभी वह केवल मनुष्य के मन में निर्मित एक व्याख्या होती है।

इसलिए कारणता को समझने के लिए हमें तीन स्तरों को अलग रखना होगा—

घटना।

घटना का परिणाम।

और—

उनके बीच कारणात्मक सम्बन्ध की स्थापना।

जब कोई वस्तु गिरती है, तो गिरना घटना है।

भूमि से टकराकर उसका टूटना परिणाम हो सकता है।

किन्तु गुरुत्वाकर्षण, वस्तु की ऊँचाई, उसका भार और गति—इन सबके बीच जो भौतिक सम्बन्ध परिणाम तक ले जाता है, वही कारणात्मक संरचना का विषय है।

यहीं से कारणता का अर्थ और गहरा हो जाता है।

कारणता केवल यह नहीं पूछती— “क्या हुआ?”

वह पूछती है— “किस प्रक्रिया के माध्यम से यह हुआ?”

और उससे भी आगे— “क्या हम यह कहने के लिए पर्याप्त आधार रखते हैं कि यह वास्तव में उसी कारण से हुआ?”

मनुष्य की बौद्धिक यात्रा में यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण परिवर्तन था।

प्रारम्भिक मनुष्य घटना के पीछे कारण खोजता था।

वैज्ञानिक मनुष्य कारण के प्रमाण खोजता है।

और दार्शनिक मनुष्य यह भी पूछता है— “कारण” कहने का अर्थ ही क्या है?

कारणता का अध्ययन इसी बिन्दु पर सामान्य अनुभव से दर्शन में प्रवेश करता है।

क्योंकि अब प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि घटनाएँ एक-दूसरे से जुड़ी हैं या नहीं।

प्रश्न यह बन जाता है— 

क्या वास्तविकता स्वयं कारणात्मक सम्बन्धों से बनी है, या कारणता केवल वास्तविकता को समझने के लिए मनुष्य की बनाई हुई भाषा है?

अगले भाग में यही प्रश्न और तीखा होगा।

यदि हम संसार में घटित प्रत्येक घटना के पीछे कोई कारण खोजते हैं, तो क्या हम यह मान रहे हैं कि हर घटना का कारण होना आवश्यक है?

और यदि ऐसा है— तो क्या ब्रह्माण्ड में कोई अकारण घटना सम्भव है?

मुख्य विवाद: क्या कारणता किसी घटना के कारण और परिणाम के बीच वास्तविक सम्बन्ध है, या कारणात्मक सम्बन्ध मनुष्य की व्याख्यात्मक बुद्धि द्वारा निर्मित होता है?

आज की शोध-स्थिति: आधुनिक कारणात्मक अध्ययन कारण, परिणाम और वैकल्पिक परिस्थितियों के बीच सम्बन्ध को समझने के लिए प्रयोग, हस्तक्षेप और सांख्यिकीय विधियों का उपयोग करता है; फिर भी कारणता की दार्शनिक परिभाषा पर पूर्ण सहमति नहीं है।

अब भी अनुत्तरित प्रश्न: यदि किसी घटना के अनेक कारण हों, तो वास्तविक कारण किसे कहा जाए—प्रारम्भिक कारण को, निर्णायक कारण को, या उन सभी परिस्थितियों को जिनके बिना परिणाम सम्भव नहीं था?


मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)

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