चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–3 : क्या हर घटना का कोई कारण होता है?
चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–3 : क्या हर घटना का कोई कारण होता है?
मनुष्य ने जब घटनाओं के पीछे कारण खोजने आरम्भ किए, तब धीरे-धीरे उसके भीतर एक गहरी धारणा बनने लगी—जो कुछ घटित होता है, उसके पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है।
यह धारणा इतनी स्वाभाविक लगती है कि सामान्य जीवन में हम प्रायः इस पर प्रश्न ही नहीं करते।
दरवाजा खुला है, तो किसी ने खोला होगा।
दीपक बुझा है, तो किसी कारण से बुझा होगा।
वृक्ष गिरा है, तो हवा, आघात या किसी अन्य प्रक्रिया ने उसे गिराया होगा।
मनुष्य का अनुभव उसे लगातार यही सिखाता है कि घटनाएँ अकेले नहीं घटतीं। उनके पीछे कुछ स्थितियाँ, कुछ प्रक्रियाएँ और कुछ पूर्ववर्ती घटनाएँ होती हैं।
यहीं से सार्वभौमिक कारणता (Universal Causality) का विचार जन्म लेता है।
इसका सरल अर्थ है— ब्रह्माण्ड में कोई भी घटना अकारण नहीं होती।
किन्तु क्या यह वास्तव में सत्य है?
या यह केवल मनुष्य के अनुभव से बनी हुई एक सामान्य धारणा है?
यह प्रश्न जितना सरल दिखाई देता है, उतना ही गम्भीर है।
क्योंकि यदि हम कहते हैं कि प्रत्येक घटना का कोई कारण है, तो हम केवल घटनाओं के बारे में कोई मत नहीं दे रहे होते। हम वास्तव में सम्पूर्ण वास्तविकता की संरचना के बारे में एक दावा कर रहे होते हैं।
हम कह रहे होते हैं कि ब्रह्माण्ड में कुछ भी बिना किसी कारण के नहीं घटता।
किन्तु “कारण” से हमारा आशय क्या है?
यदि कोई पत्थर गिरता है, तो हम गुरुत्वाकर्षण की ओर संकेत कर सकते हैं। यदि कोई पौधा बढ़ता है, तो हम जैविक प्रक्रियाओं की ओर देख सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन आता है, तो हम उसके अनुभव, मानसिक स्थिति और परिवेश का अध्ययन कर सकते हैं।
किन्तु क्या प्रत्येक घटना के लिए ऐसा कोई कारण वास्तव में उपलब्ध होता है?
या कभी-कभी हम केवल इसलिए कारण खोजते हैं क्योंकि अकारण घटना को स्वीकार करना हमारी बुद्धि के लिए कठिन है?
यहीं कारणता का प्रश्न ज्ञान से आगे बढ़कर मनोविज्ञान में प्रवेश करता है।
मनुष्य अज्ञात को सहन करने में कठिनाई अनुभव करता है। जब कोई घटना बिना स्पष्ट कारण के दिखाई देती है, तो उसके भीतर एक रिक्तता उत्पन्न होती है। वह रिक्तता उसे बेचैन करती है। इसलिए वह किसी सम्भावित कारण की खोज करता है।
कभी वह सही कारण खोज लेता है।
कभी वह अधूरे ज्ञान के आधार पर कारण मान लेता है।
और कभी वह ऐसा कारण गढ़ लेता है, जिसका वास्तविक घटना से कोई सम्बन्ध ही नहीं होता।
इसलिए यह कहना कि “मनुष्य कारण खोजता है” और यह कहना कि “हर घटना का कारण होता है”—दो अलग-अलग बातें हैं।
पहला कथन मनुष्य की प्रवृत्ति से सम्बन्धित है।
दूसरा ब्रह्माण्ड की वास्तविकता से।
इन दोनों को एक नहीं किया जा सकता।
यहीं दर्शन के सामने एक कठिन प्रश्न उपस्थित होता है—
क्या किसी घटना का कारण हमारे ज्ञान से बाहर हो सकता है?
यदि किसी व्यक्ति को किसी घटना का कारण ज्ञात नहीं है, तो क्या वह घटना अकारण हो जाती है?
स्पष्ट है—नहीं।
अज्ञान और अकारणता एक ही बात नहीं हैं।
किसी घटना का कारण हमें ज्ञात न हो, इसका अर्थ केवल इतना है कि हमारा ज्ञान उस कारण तक नहीं पहुँचा।
किन्तु यहाँ एक और सम्भावना भी है।
क्या ऐसा हो सकता है कि कोई घटना वास्तव में अकारण हो?
यह प्रश्न मनुष्य को असहज करता है।
क्योंकि यदि कोई घटना अकारण हो सकती है, तो कारणता का सार्वभौमिक सिद्धान्त टूट जाता है।
और यदि कोई अकारण घटना सम्भव नहीं है, तो हमें यह मानना पड़ेगा कि वास्तविकता की प्रत्येक घटना किसी न किसी कारणात्मक संरचना से जुड़ी है।
यहाँ से कारणता और नियतत्ववाद (Determinism) के बीच सम्बन्ध बनने लगता है।
नियतत्ववाद का मूल विचार यह है कि यदि किसी अवस्था में ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण स्थितियाँ और उन्हें नियंत्रित करने वाले नियम ज्ञात हों, तो भविष्य की घटनाएँ उन स्थितियों से निर्धारित हो सकती हैं।
किन्तु सार्वभौमिक कारणता और नियतत्ववाद एक ही बात नहीं हैं।
कारणता यह कह सकती है कि घटना किसी कारणात्मक सम्बन्ध से जुड़ी है।
नियतत्ववाद इससे आगे जाकर यह दावा कर सकता है कि घटनाएँ पूर्ववर्ती स्थितियों और नियमों से आवश्यक रूप से निर्धारित हैं।
इन दोनों के बीच एक महत्त्वपूर्ण अन्तर है।
किसी घटना का कारण होना यह आवश्यक नहीं बनाता कि उसका परिणाम केवल एक ही सम्भव रूप में घटित हो।
कभी-कभी कारणता सम्भाव्यता के रूप में भी समझी जाती है।
एक विशेष परिस्थिति किसी परिणाम की सम्भावना बढ़ा सकती है, किन्तु परिणाम को पूर्ण रूप से निश्चित नहीं करती।
यहीं सम्भाव्यता (Probability) कारणता के प्रश्न में प्रवेश करती है।
अब प्रश्न यह नहीं रह जाता— “क्या कारण ने परिणाम को अनिवार्य रूप से उत्पन्न किया?”
बल्कि प्रश्न हो सकता है— “क्या इस कारण ने परिणाम की सम्भावना को प्रभावित किया?”
यह अन्तर आधुनिक कारणात्मक चिन्तन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
किन्तु दार्शनिक समस्या अभी भी समाप्त नहीं होती।
यदि प्रत्येक घटना का कोई कारण है, तो क्या कारणों की श्रृंखला अनन्त होगी?
मान लीजिए घटना A का कारण B है।
B का कारण C है।
C का कारण D है।
तो क्या यह क्रम कभी समाप्त होगा?
यदि नहीं, तो क्या हम कभी किसी घटना की पूर्ण व्याख्या कर सकते हैं?
और यदि हाँ, तो जिस बिन्दु पर श्रृंखला समाप्त होगी, उस अन्तिम कारण का कारण क्या होगा?
यहीं मनुष्य की बुद्धि एक विचित्र स्थिति में पहुँचती है।
वह कारणता की सार्वभौमिकता को स्वीकार करना चाहती है।
किन्तु उसी स्वीकार के भीतर एक ऐसा प्रश्न जन्म लेता है, जो उस सार्वभौमिकता को चुनौती देता है।
यदि हर चीज का कारण है, तो प्रथम कारण का कारण क्या है?
शायद इसी प्रश्न ने इतिहास में अनेक दार्शनिक और धार्मिक विचारों को जन्म दिया।
किसी ने कहा—एक प्रथम कारण होना चाहिए।
किसी ने कहा—कारणों की श्रृंखला अनन्त है।
किसी ने कहा—प्रथम कारण की खोज ही गलत प्रश्न है।
और किसी ने कहा—जहाँ कारणता लागू होती है, वहाँ “प्रथम” की भाषा ही सम्भव नहीं।
यहाँ एक और सूक्ष्म बात समझना आवश्यक है।
हम प्रायः “कारण” को घटना से पहले स्थित किसी वस्तु के रूप में देखते हैं। किन्तु यदि स्वयं समय और ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का प्रश्न उठे, तो “पहले” और “बाद” की भाषा कहाँ तक लागू होगी?
यदि काल स्वयं किसी ब्रह्माण्डीय प्रक्रिया का हिस्सा है, तो क्या हम काल के आरम्भ से “पहले” किसी कारण की कल्पना कर सकते हैं?
यह प्रश्न हमें धीरे-धीरे उस सीमा तक ले जाता है जहाँ कारणता, काल और अस्तित्व एक-दूसरे से जुड़ने लगते हैं।
लेकिन अभी इस भाग का मूल प्रश्न सरल है— क्या हर घटना का कोई कारण होता है?
ईमानदार उत्तर यह है कि मनुष्य के अनुभव में अधिकांश घटनाएँ कारणात्मक सम्बन्धों से जुड़ी दिखाई देती हैं।
विज्ञान भी घटनाओं के कारणात्मक सम्बन्धों की खोज पर आधारित है।
किन्तु यह कहना कि ब्रह्माण्ड की प्रत्येक सम्भव घटना अनिवार्य रूप से किसी कारण से उत्पन्न होती है, एक बहुत बड़ा दार्शनिक दावा है।
इस दावे को केवल दैनिक अनुभव के आधार पर सिद्ध नहीं किया जा सकता।
क्योंकि मनुष्य ने अब तक वास्तविकता के प्रत्येक स्तर का पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं किया है।
इसलिए कारणता का प्रश्न अभी भी खुला है।
शायद हर घटना का कारण होता है।
शायद कुछ घटनाएँ सम्भाव्यता के रूप में घटती हैं।
शायद अकारणता केवल हमारी अज्ञानता का दूसरा नाम है।
या शायद— कारणता स्वयं वास्तविकता की पूर्ण व्यवस्था नहीं, बल्कि उसे समझने की हमारी एक सीमा है।
अगले भाग में हम इसी प्रश्न को काल के साथ रखेंगे।
क्योंकि अब तक हम यह समझ चुके हैं कि कारणता को केवल घटनाओं के क्रम से नहीं पहचाना जा सकता।
अब प्रश्न यह है— क्या कारण हमेशा पहले आता है?
और यदि कारण घटना से पहले होता है— तो क्या “पहले” होना ही कारण होने का प्रमाण है?
मुख्य विवाद: क्या सार्वभौमिक कारणता—अर्थात् प्रत्येक घटना के किसी कारण से जुड़ी होने का सिद्धान्त—ब्रह्माण्ड की वास्तविकता है या मनुष्य के अनुभव से निर्मित एक सामान्य धारणा?
आज की शोध-स्थिति: आधुनिक विज्ञान कारणात्मक सम्बन्धों का अध्ययन करता है, किन्तु सार्वभौमिक कारणता और नियतत्ववाद को एक नहीं मानता; सम्भाव्यता और अनिश्चितता ने कारणता की पारम्परिक निश्चित धारणा को अधिक जटिल बनाया है।
अब भी अनुत्तरित प्रश्न: यदि प्रत्येक घटना का कोई कारण है, तो क्या कारणों की श्रृंखला अनन्त है—या किसी बिन्दु पर हमें अकारण को स्वीकार करना ही होगा?
मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)
Comments
Post a Comment