चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–5 : वैदिक और उपनिषदिक कारणचिन्तन
चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–5 : वैदिक और उपनिषदिक कारणचिन्तन
मनुष्य ने जब यह पूछना आरम्भ किया कि घटनाएँ क्यों घटती हैं, तब यह प्रश्न केवल उसके दैनिक जीवन तक सीमित नहीं रहा।
धीरे-धीरे उसकी दृष्टि अपने चारों ओर की छोटी घटनाओं से उठकर सम्पूर्ण अस्तित्व की ओर चली गई।
वर्षा क्यों होती है?
ऋतुएँ क्यों बदलती हैं?
जीवन कैसे उत्पन्न होता है?
मृत्यु क्यों आती है?
और अन्ततः—
यह सम्पूर्ण जगत् है ही क्यों?
यहीं से कारणता का प्रश्न अपने सबसे व्यापक रूप में सामने आता है।
वैदिक चिन्तन में सृष्टि और उत्पत्ति का प्रश्न किसी एक निश्चित उत्तर से आरम्भ नहीं होता। उसके भीतर एक जिज्ञासा है, एक आश्चर्य है और कई स्थानों पर एक गहरा दार्शनिक संकोच भी।
यह बात अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
क्योंकि वैदिक चिन्तन को यदि केवल “सृष्टि का कारण यह है” जैसे निश्चित उत्तरों के संग्रह के रूप में देखा जाए, तो उसके भीतर उपस्थित प्रश्नशीलता को समझा ही नहीं जा सकता।
वैदिक मनुष्य ने आकाश को देखा।
उसने अग्नि को देखा।
उसने वायु, जल और पृथ्वी को अनुभव किया।
उसने जीवन की उत्पत्ति और मृत्यु का क्रम देखा।
किन्तु धीरे-धीरे उसके सामने यह प्रश्न खड़ा हुआ कि—
क्या ये सब स्वयं हैं, या इनके पीछे कोई मूल व्यवस्था है?
यहीं ऋत (Ṛta) की धारणा महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
ऋत को सामान्य अर्थ में केवल “नियम” कह देना पर्याप्त नहीं होगा। यह उस व्यापक ब्रह्माण्डीय व्यवस्था की ओर संकेत करता है जिसमें प्रकृति और अस्तित्व एक प्रकार की संगति में स्थित दिखाई देते हैं।
सूर्य का उदय और अस्त होना।
ऋतुओं का क्रम।
प्रकृति की नियमितता।
यज्ञ और ब्रह्माण्डीय व्यवस्था के बीच सम्बन्ध।
इन सबके भीतर वैदिक चिन्तन ने एक ऐसी व्यवस्था का अनुभव किया जिसे पूर्ण अराजकता नहीं कहा जा सकता।
किन्तु यहाँ एक सावधानी आवश्यक है।
ऋत को आधुनिक वैज्ञानिक अर्थ में “कारणता का नियम” नहीं कहा जा सकता।
दोनों के ऐतिहासिक और बौद्धिक सन्दर्भ अलग हैं।
फिर भी वैदिक चिन्तन में यह प्रश्न अवश्य उपस्थित है कि—
क्या जगत् केवल घटनाओं का बिखरा हुआ समूह है, या उसके भीतर कोई गहरी व्यवस्था कार्य कर रही है?
यही प्रश्न आगे चलकर सृष्टि के मूल कारण की खोज में बदलता है।
वैदिक साहित्य में इस प्रश्न का सबसे गहरा और दार्शनिक रूप नासदीय सूक्त में दिखाई देता है।
यहाँ सृष्टि के आरम्भ का प्रश्न एक निश्चित घोषणा की तरह नहीं, बल्कि एक जिज्ञासा और संशय के रूप में उपस्थित होता है।
क्या उस समय सत् था?
क्या असत् था?
क्या आकाश था?
क्या उसके पार कुछ था?
सृष्टि किससे उत्पन्न हुई?
यहाँ प्रश्न केवल यह नहीं है कि सृष्टि का कारण क्या था।
प्रश्न यह भी है कि—
क्या सृष्टि के कारण को कोई जानता भी है?
नासदीय सूक्त का दार्शनिक महत्त्व इसी बिन्दु पर है।
यह मनुष्य को एक असुविधाजनक सम्भावना के सामने खड़ा करता है—
क्या वास्तविकता के मूल कारण का ज्ञान मनुष्य की पहुँच से बाहर हो सकता है?
कारणता के अध्ययन में यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रश्न है।
क्योंकि मनुष्य सामान्यतः मानता है कि यदि कोई घटना है, तो उसका कारण खोजा जा सकता है।
किन्तु नासदीय दृष्टि यह सम्भावना खोलती है कि कारण की खोज और कारण का वास्तविक ज्ञान एक ही बात नहीं हैं।
मनुष्य प्रश्न पूछ सकता है।
वह अनुमान कर सकता है।
वह दार्शनिक सम्भावनाएँ प्रस्तुत कर सकता है।
किन्तु क्या वह सृष्टि के आरम्भिक कारण को वास्तव में जान सकता है?
यह प्रश्न खुला रहता है।
यहीं वैदिक कारणचिन्तन का एक अत्यन्त गहरा पक्ष सामने आता है—
कारणता के प्रश्न के साथ ज्ञान की सीमा का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है।
उपनिषदों में यह प्रश्न और अधिक आन्तरिक तथा दार्शनिक रूप ग्रहण करता है।
अब ध्यान केवल बाहरी सृष्टि की उत्पत्ति पर नहीं रहता।
प्रश्न यह बनता है—
वह मूल तत्त्व क्या है, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है, जिसके द्वारा यह स्थित रहता है और जिसमें अन्ततः इसका लय होता है?
यहाँ कारणता केवल किसी एक घटना के पीछे स्थित कारण नहीं रह जाती।
यह सम्पूर्ण जगत् और उसके मूल आधार के सम्बन्ध का प्रश्न बन जाती है।
उपनिषदिक चिन्तन में ब्रह्म को जगत् के मूल कारण के रूप में समझने की दिशा विकसित होती है।
किन्तु यहाँ भी कारणता का प्रश्न सरल नहीं है।
यदि ब्रह्म जगत् का कारण है, तो कारण और कार्य का सम्बन्ध कैसा है?
क्या ब्रह्म जगत् से अलग कोई निमित्त कारण है?
क्या ब्रह्म स्वयं जगत् के रूप में प्रकट होता है?
क्या जगत् कारण में पहले से किसी रूप में स्थित था?
या जगत् की अनुभूति ही किसी गहरे तत्त्व की अभिव्यक्ति है?
इन प्रश्नों के उत्तर आगे भारतीय दर्शनों में अलग-अलग रूपों में विकसित होंगे।
किन्तु उपनिषदिक चिन्तन ने एक मूलभूत दार्शनिक दिशा अवश्य प्रदान की—
कारण को केवल घटना से पहले स्थित किसी वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि अस्तित्व के मूल आधार के रूप में भी समझा जा सकता है।
यहाँ कारणता का अर्थ विस्तृत हो जाता है।
अब “कारण” का प्रश्न केवल यह नहीं है कि—
“यह घटना किससे हुई?”
बल्कि—
“यह सम्पूर्ण अस्तित्व किस आधार पर स्थित है?”
यहीं उपादान कारण (Material Cause) और निमित्त कारण (Efficient Cause) जैसी समस्याएँ आगे महत्त्वपूर्ण बनती हैं।
यदि कोई कुम्हार मिट्टी से घड़ा बनाता है, तो कुम्हार एक प्रकार का कारण है और मिट्टी दूसरे प्रकार का।
कुम्हार निर्माण की प्रक्रिया को आरम्भ करता है।
मिट्टी घड़े की सामग्री बनती है।
किन्तु यदि जगत् की उत्पत्ति का प्रश्न उठे, तो समस्या कठिन हो जाती है।
जगत् का निमित्त कारण कौन है?
और जगत् का उपादान कारण क्या है?
क्या दोनों अलग हैं?
या कोई एक ही मूल तत्त्व दोनों भूमिकाएँ निभाता है?
उपनिषदिक चिन्तन में यही प्रश्न आगे गहरी दार्शनिक बहसों का आधार बनता है।
इस प्रकार वैदिक और उपनिषदिक कारणचिन्तन को केवल सृष्टि-कथाओं के रूप में नहीं समझना चाहिए।
उसके भीतर एक क्रमिक बौद्धिक विकास दिखाई देता है।
पहले—
जगत् में व्यवस्था का अनुभव।
फिर—
सृष्टि के मूल की जिज्ञासा।
फिर—
कारण के ज्ञान की सीमा पर प्रश्न।
और अन्ततः—
कारण और अस्तित्व के सम्बन्ध की खोज।
यही कारण है कि भारतीय दर्शन में कारणता का प्रश्न केवल भौतिक घटनाओं का प्रश्न नहीं बनता।
वह धीरे-धीरे अस्तित्वमीमांसा (Ontology) का प्रश्न बन जाता है।
किन्तु इस यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष अभी शेष है।
यदि कोई कारण किसी कार्य को उत्पन्न करता है, तो क्या कार्य कारण में पहले से उपस्थित था?
क्या कार्य वास्तव में नया उत्पन्न होता है?
या कारण और कार्य के बीच का सम्बन्ध केवल हमारी दृष्टि का परिणाम है?
अगले भाग में भारतीय दर्शन के विभिन्न मत इसी मूल प्रश्न के चारों ओर विकसित होते दिखाई देंगे।
मुख्य विवाद: क्या वैदिक और उपनिषदिक चिन्तन में कारणता को ब्रह्माण्डीय व्यवस्था और अस्तित्व के मूल आधार के रूप में समझा गया, या यह आधुनिक कारणता की अवधारणा से अलग एक स्वतंत्र दार्शनिक प्रश्न है?
आज की शोध-स्थिति: वैदिक और उपनिषदिक कारणचिन्तन का अध्ययन आधुनिक वैज्ञानिक कारणता से सीधे समान नहीं किया जाता; इसका प्रमुख महत्त्व भारतीय अस्तित्वमीमांसा और सृष्टि-विचार के ऐतिहासिक विकास में है।
अब भी अनुत्तरित प्रश्न: यदि ब्रह्माण्ड का कोई मूल कारण है, तो क्या वह जगत् से अलग है—या जगत् उसी कारण का कोई रूप, अभिव्यक्ति अथवा परिणाम है?
मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)
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