चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–7 : सत्कार्यवाद, असत्कार्यवाद और विवर्तवाद
चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–7 : सत्कार्यवाद, असत्कार्यवाद और विवर्तवाद
भारतीय दर्शनों में कारणता का प्रश्न धीरे-धीरे एक अत्यन्त सूक्ष्म दार्शनिक समस्या में बदल गया।
अब प्रश्न केवल यह नहीं था कि—
“यह किस कारण से उत्पन्न हुआ?”
प्रश्न यह बन गया—
“उत्पन्न होने का अर्थ ही क्या है?”
यदि किसी कारण से कोई कार्य उत्पन्न होता है, तो क्या वह कार्य कारण में पहले से उपस्थित था?
यदि वह पहले से उपस्थित था, तो वास्तव में नया क्या उत्पन्न हुआ?
और यदि वह पहले से उपस्थित नहीं था, तो वह अस्तित्व में आया कैसे?
यहीं से भारतीय दर्शन में कारणता के तीन महत्त्वपूर्ण विचार सामने आते हैं—
सत्कार्यवाद।
असत्कार्यवाद।
और—
विवर्तवाद।
इन तीनों को समझे बिना भारतीय कारणता-विचार की गहराई को समझना कठिन है।
सत्कार्यवाद (Satkāryavāda) का मूल विचार है—
कार्य अपने कारण में पूर्वस्थित होता है।
अर्थात् जो कार्य बाद में दिखाई देता है, वह पूर्णतः शून्य से उत्पन्न नहीं होता।
सांख्य दर्शन इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है।
यदि बीज से वृक्ष उत्पन्न होता है, तो सत्कार्यवाद पूछता है—
क्या वृक्ष की सम्भावना बीज में पहले से नहीं थी?
यदि बीज में वृक्ष की कोई सम्भावना ही न होती, तो उससे वृक्ष कैसे उत्पन्न होता?
यहाँ “पूर्वस्थिति” का अर्थ यह नहीं है कि बीज के भीतर एक छोटा-सा पूर्ण वृक्ष छिपा हुआ है।
अर्थ यह है कि कार्य का कारणात्मक आधार और सम्भावना कारण में निहित है।
इस दृष्टि से उत्पत्ति शून्य से सृष्टि नहीं, बल्कि कारण में निहित शक्ति या संरचना का विकास है।
सत्कार्यवाद के पीछे एक गहरी दार्शनिक धारणा है—
अस्तित्व पूर्णतः अनस्तित्व से उत्पन्न नहीं हो सकता।
जो कुछ किसी रूप में उत्पन्न होता है, उसका कोई आधार कारण में होना चाहिए।
किन्तु इस विचार के सामने एक कठिन प्रश्न भी है।
यदि कार्य कारण में पहले से मौजूद है, तो कार्य और कारण में अन्तर क्या रह जाता है?
यदि वृक्ष बीज में पहले से है, तो बीज और वृक्ष को अलग क्यों माना जाए?
सत्कार्यवाद का उत्तर यह है कि कारण और कार्य की अवस्था और अभिव्यक्ति अलग हो सकती है।
बीज और वृक्ष एक ही तत्त्व की एक जैसी अवस्था नहीं हैं।
कारण में जो सम्भावना या शक्ति निहित है, वह कार्य में विकसित और प्रकट रूप ग्रहण करती है।
इस प्रकार सत्कार्यवाद के लिए परिवर्तन वास्तविक है, किन्तु परिवर्तन का आधार भी वास्तविक है।
इसके विपरीत असत्कार्यवाद (Asatkāryavāda) यह मानता है कि कार्य कारण में पूर्वस्थित नहीं होता।
कार्य एक नये रूप में उत्पन्न होता है।
न्याय–वैशेषिक परम्परा इस दिशा में कारणता को समझती है।
घड़ा मिट्टी में घड़े के रूप में पहले से उपस्थित नहीं है।
मिट्टी से घड़े का निर्माण होता है।
यहाँ कारण और कार्य को अलग-अलग अवस्थाओं और वास्तविकताओं के रूप में समझा जाता है।
असत्कार्यवाद के लिए उत्पत्ति का अर्थ वास्तविक नवीनता है।
कार्य का जन्म केवल किसी पूर्वस्थित सम्भावना का प्रकट होना नहीं है।
यह एक नया कार्यात्मक रूप है।
किन्तु यहाँ भी प्रश्न उठता है—
यदि कार्य कारण में बिल्कुल नहीं था, तो वह उत्पन्न कैसे हुआ?
यदि किसी कारण में कार्य की कोई सम्भावना या आधार नहीं था, तो कारण और कार्य के बीच सम्बन्ध कैसे स्थापित होगा?
यही वह प्रश्न है जिसके कारण सत्कार्यवाद और असत्कार्यवाद के बीच गम्भीर दार्शनिक विवाद विकसित हुआ।
एक पक्ष कहता है—
असत् से सत् उत्पन्न नहीं हो सकता।
दूसरा पक्ष कहता है—
यदि कार्य कारण में पहले से ही है, तो उत्पत्ति का वास्तविक अर्थ क्या है?
दोनों दृष्टियाँ कारणता की अलग-अलग कठिनाइयों को सामने लाती हैं।
यहीं वेदान्त का विवर्तवाद (Vivartavāda) एक अलग दिशा प्रस्तुत करता है।
विवर्तवाद के अनुसार कारण में वास्तविक परिवर्तन हुए बिना कार्य का प्रतीत होना सम्भव है।
सामान्य उदाहरण के रूप में रस्सी और सर्प का उदाहरण दिया जाता है।
अन्धकार में रस्सी को सर्प समझ लिया गया।
यहाँ सर्प की अनुभूति हुई।
किन्तु रस्सी वास्तव में सर्प में परिवर्तित नहीं हुई।
इस दृष्टि से कारण में कोई वास्तविक परिवर्तन हुए बिना कार्य की प्रतीति हो सकती है।
विवर्तवाद के सन्दर्भ में कारणता का प्रश्न अत्यन्त सूक्ष्म हो जाता है।
क्योंकि यहाँ पूछा जाता है—
क्या जो कार्य दिखाई दे रहा है, वह वास्तव में कारण से उत्पन्न हुआ है—या केवल कारण के आधार पर एक विशेष प्रतीति है?
यहाँ “उत्पत्ति” और “प्रतीति” के बीच अन्तर महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
यदि कोई वस्तु वास्तव में परिवर्तित नहीं हुई, तो क्या उसके सम्बन्ध में कारण–कार्य की भाषा लागू की जा सकती है?
या हमें कहना होगा कि कारणता केवल अनुभव के स्तर पर दिखाई दे रही है?
यहीं सत्कार्यवाद, असत्कार्यवाद और विवर्तवाद तीन अलग दार्शनिक दिशाओं में खड़े दिखाई देते हैं।
सत्कार्यवाद कहता है—कार्य कारण में पूर्वस्थित है।
असत्कार्यवाद कहता है—कार्य नया उत्पन्न होता है।
विवर्तवाद पूछता है—क्या कार्य वास्तव में उत्पन्न हुआ भी है, या केवल प्रतीत हुआ है?
इन तीनों दृष्टियों के बीच विवाद केवल शब्दों का विवाद नहीं है।
यह परिवर्तन, उत्पत्ति और वास्तविकता के अर्थ का विवाद है।
यदि कार्य कारण में पहले से है, तो उत्पत्ति विकास है।
यदि कार्य पहले से नहीं है, तो उत्पत्ति नवीनता है।
और यदि कार्य केवल प्रतीत होता है, तो उत्पत्ति की पूरी धारणा ही प्रश्न के घेरे में आ जाती है।
यहाँ कारणता का प्रश्न एक गहरे अस्तित्वगत प्रश्न में बदल जाता है—
क्या वास्तविकता में परिवर्तन होता है, या परिवर्तन केवल हमारी दृष्टि का अनुभव है?
किन्तु भारतीय दर्शन की यात्रा अभी समाप्त नहीं होती।
अब तक हमने कारणता को मुख्यतः कारण और कार्य के सम्बन्ध के रूप में देखा।
अगला प्रश्न यह होगा—
क्या प्रत्येक घटना किसी एक कारण से उत्पन्न होती है?
या—
क्या घटनाएँ अनेक परस्पर निर्भर कारणों और परिस्थितियों से उत्पन्न होती हैं?
यहीं से बौद्ध और जैन कारणता-दृष्टि का प्रवेश होता है।
मुख्य विवाद: क्या कार्य कारण में पहले से उपस्थित होता है, वास्तव में नया उत्पन्न होता है, या कार्य की प्रतीति बिना वास्तविक परिवर्तन के सम्भव है?
आज की शोध-स्थिति: सत्कार्यवाद, असत्कार्यवाद और विवर्तवाद का अध्ययन भारतीय तत्त्वमीमांसा और कारण–कार्य सिद्धान्तों के भीतर किया जाता है; इनके निष्कर्षों को आधुनिक वैज्ञानिक causality का प्रत्यक्ष विकल्प नहीं माना जाता।
अब भी अनुत्तरित प्रश्न: यदि कारण और कार्य के बीच वास्तविक परिवर्तन नहीं हुआ, तो क्या “कारणता” शब्द का प्रयोग अभी भी उचित है?
मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)
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