चिंतन — अध्याय–19 : मृत्यु क्या है? — भाग–7 : मृत्यु और आधुनिक विज्ञान
चिंतन — अध्याय–19 : मृत्यु क्या है? — भाग–7 : मृत्यु और आधुनिक विज्ञान
अब तक मृत्यु को अनेक दार्शनिक दृष्टियों से देखा गया।
वैदिक चिन्तन ने उसे अस्तित्वगत प्रश्न बनाया।
उपनिषदों ने आत्मा और मृत्यु का सम्बन्ध पूछा।
सांख्य, योग और वेदान्त ने शरीर, मन और चेतना के बीच भेद किया।
बौद्ध दर्शन ने स्थायी आत्मा की धारणा को चुनौती दी।
जैन दर्शन ने जीव की निरन्तरता को स्वीकार किया।
अब प्रश्न है—
विज्ञान मृत्यु को कैसे देखता है?
यहाँ दृष्टिकोण बदल जाता है।
विज्ञान मृत्यु के बारे में यह नहीं पूछता कि आत्मा कहाँ गई।
वह पहले पूछता है—
शरीर में वास्तव में क्या घटित हुआ?
कौन-सी प्रक्रिया समाप्त हुई?
कौन-सी प्रणाली विफल हुई?
क्या यह स्थिति वापस लाई जा सकती है?
और—
क्या जैविक क्षति अपरिवर्तनीय हो चुकी है?
विज्ञान के लिए मृत्यु—एक मापने योग्य घटना
विज्ञान की विशेषता यह है कि वह किसी अवधारणा को परिभाषित करने के लिए निरीक्षण और परीक्षण की आवश्यकता रखता है।
मृत्यु के सम्बन्ध में भी यही हुआ।
प्राचीन समय में मृत्यु की पहचान मुख्यतः बाहरी संकेतों से की जाती थी।
श्वास रुक गई।
नाड़ी नहीं चल रही।
शरीर स्थिर है।
लेकिन चिकित्सा-विज्ञान के विकास के साथ यह स्पष्ट हुआ कि शरीर की विभिन्न प्रणालियाँ अलग-अलग समय और अलग-अलग ढंग से विफल हो सकती हैं।
इससे मृत्यु की परिभाषा अधिक जटिल हो गई।
मृत्यु एक ऐसी स्थिति नहीं है, जिसे केवल एक संकेत देखकर हमेशा निश्चित कर दिया जाए।
हृदय-मृत्यु और परिसंचरण का रुकना
लम्बे समय तक मृत्यु की पहचान मुख्यतः हृदय और श्वसन के रुकने से की जाती थी।
हृदय रुक गया।
रक्त का प्रवाह रुक गया।
श्वसन समाप्त हुआ।
तो व्यक्ति को मृत माना गया।
इस दृष्टि में शरीर का एक मूल परिसंचरण-तन्त्र समाप्त हो जाता है।
लेकिन आधुनिक चिकित्सा ने यह भी दिखाया कि कुछ स्थितियों में हृदय और श्वसन को पुनः आरम्भ किया जा सकता है।
यहीं एक महत्वपूर्ण प्रश्न उत्पन्न हुआ—
क्या हृदय का अस्थायी रूप से रुकना मृत्यु है?
यदि पुनर्जीवन सम्भव है, तो मृत्यु की सीमा कहाँ है?
इस प्रश्न ने चिकित्सा-विज्ञान को मृत्यु की अधिक सूक्ष्म परिभाषाओं की ओर बढ़ाया।
मस्तिष्क-मृत्यु
आधुनिक चिकित्सा में मस्तिष्क-मृत्यु की अवधारणा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
इसमें मस्तिष्क की समस्त कार्यप्रणाली का अपरिवर्तनीय रूप से समाप्त होना मुख्य प्रश्न बनता है।
यहाँ केवल यह नहीं देखा जाता कि व्यक्ति प्रतिक्रिया दे रहा है या नहीं।
मस्तिष्क के विभिन्न कार्यों की जाँच की जाती है।
श्वसन की स्वतन्त्र क्षमता।
मस्तिष्क-तन्त्र की प्रतिक्रियाएँ।
और अन्य चिकित्सकीय मानदण्ड।
यदि मस्तिष्क की कार्यप्रणाली अपरिवर्तनीय रूप से समाप्त हो चुकी है, तो आधुनिक चिकित्सा में मृत्यु की एक विशिष्ट परिभाषा सामने आती है।
लेकिन यहाँ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात है—
मस्तिष्क-मृत्यु की चिकित्सा-परिभाषा और आत्मा के सम्बन्ध में कोई निष्कर्ष एक ही बात नहीं हैं।
मस्तिष्क की कार्यप्रणाली समाप्त हो गई—
यह वैज्ञानिक निरीक्षण है।
“चेतना शरीर से बाहर चली गई”—
यह एक दार्शनिक या धार्मिक व्याख्या हो सकती है।
दोनों को मिलाना वैज्ञानिक दृष्टि से अनुचित होगा।
जैविक मृत्यु
अब हम जैविक मृत्यु की ओर आते हैं।
जीवित शरीर एक संगठित जैविक व्यवस्था है।
इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अनेक प्रक्रियाएँ साथ-साथ चलती हैं।
जब यह संगठन अपरिवर्तनीय रूप से विघटित होने लगता है, तो शरीर की जीवन-व्यवस्था समाप्त होती जाती है।
यहाँ मृत्यु केवल किसी एक अंग की विफलता नहीं है।
यह सम्पूर्ण जैविक संगठन के विघटन का प्रश्न है।
लेकिन यह विघटन भी हर स्तर पर एक ही समय में नहीं होता।
यहीं विज्ञान मृत्यु को एक प्रक्रियात्मक घटना के रूप में देखने लगता है।
कोशिकीय मृत्यु—शरीर के भीतर मृत्यु
यहाँ मृत्यु का प्रश्न और सूक्ष्म हो जाता है।
शरीर में कोशिकाएँ निरन्तर मरती रहती हैं।
कुछ कोशिकाएँ नियोजित प्रक्रिया के माध्यम से समाप्त होती हैं।
इस प्रक्रिया को अपोप्टोसिस कहा जाता है।
यह शरीर के सामान्य विकास और ऊतक-सन्तुलन में भूमिका निभाती है।
इसके विपरीत कुछ कोशिकीय मृत्यु क्षति, विषाक्तता या रक्त-आपूर्ति की कमी से होती है।
इसे सामान्यतः नेक्रोसिस से जोड़ा जाता है।
यहाँ हमें एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथ्य दिखाई देता है—
जीवन के भीतर भी कोशिकीय मृत्यु लगातार घटित होती रहती है।
तो फिर—
क्या मृत्यु जीवन के विपरीत है?
या जीवन स्वयं ऐसी प्रक्रियाओं का संगठन है, जिनमें निर्माण और विनाश दोनों साथ-साथ चलते हैं?
यह प्रश्न विज्ञान से दर्शन की ओर बढ़ता है।
शरीर कब “जीवित” है?
विज्ञान जीवन की अनेक जैविक विशेषताओं का अध्ययन कर सकता है।
चयापचय।
स्व-नियमन।
ऊर्जा का उपयोग।
प्रतिक्रिया।
प्रजनन।
संगठन।
लेकिन जीवन की एक ऐसी सार्वभौमिक परिभाषा, जो हर सम्भावित स्थिति पर बिना किसी कठिनाई के लागू हो जाए, स्वयं जटिल प्रश्न है।
यही कारण है कि मृत्यु की परिभाषा भी केवल एक शब्दकोशीय परिभाषा नहीं है।
वह इस बात पर निर्भर करती है कि हम जीवन की मूल इकाई को किस रूप में समझते हैं।
क्या जीवन एक कोशिका का संगठन है?
एक शरीर का?
एक तन्त्रिका-तन्त्र का?
या चेतना की उपस्थिति का?
विज्ञान इन प्रश्नों पर शोध करता है।
लेकिन सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर अभी उपलब्ध नहीं है।
मृत्यु और अपरिवर्तनीयता
आधुनिक चिकित्सा में “अपरिवर्तनीयता” अत्यन्त महत्वपूर्ण शब्द है।
किसी जैविक कार्य का अस्थायी रुकना और उसका स्थायी रूप से समाप्त हो जाना अलग बात है।
यह अन्तर मृत्यु की वैज्ञानिक पहचान में निर्णायक हो सकता है।
लेकिन “अपरिवर्तनीय” शब्द भी अपने भीतर एक दार्शनिक कठिनाई रखता है।
हम किसी प्रक्रिया को अपरिवर्तनीय कब कहते हैं?
जब वर्तमान तकनीक उसे वापस न ला सके?
या जब जैविक क्षति की एक निश्चित सीमा पार हो जाए?
विज्ञान लगातार आगे बढ़ता है।
जो कभी अपरिवर्तनीय माना गया, वह कुछ परिस्थितियों में पुनर्स्थापित किया जा सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि मृत्यु की कोई परिभाषा सम्भव नहीं।
इसका अर्थ केवल यह है कि वैज्ञानिक ज्ञान स्वयं विकसित होता रहता है।
क्या विज्ञान मृत्यु को समझ चुका है?
यहाँ उत्तर स्पष्ट है—
नहीं।
विज्ञान मृत्यु की जैविक प्रक्रियाओं को पहले से कहीं अधिक समझता है।
वह हृदय, मस्तिष्क, कोशिका और ऊतक-स्तर पर मृत्यु के अनेक पक्षों का अध्ययन कर चुका है।
लेकिन मृत्यु का सम्पूर्ण अर्थ विज्ञान के पास नहीं है।
और यह विज्ञान की असफलता नहीं है।
क्योंकि विज्ञान का उद्देश्य प्रत्येक दार्शनिक प्रश्न का उत्तर देना नहीं है।
विज्ञान यह बता सकता है कि शरीर में क्या घटित हो रहा है।
लेकिन—
“मृत्यु का अस्तित्वगत अर्थ क्या है?”
यह प्रश्न वैज्ञानिक मापन से अलग है।
विज्ञान की सीमा और विज्ञान की शक्ति
विज्ञान की शक्ति उसकी सीमा में ही है।
वह केवल वही दावा करना चाहता है, जिसे निरीक्षण, परीक्षण और प्रमाण के स्तर पर उचित ठहराया जा सके।
इसी कारण विज्ञान आत्मा, परलोक और मृत्यु के बाद चेतना जैसे प्रश्नों पर सावधानी रखता है।
यह सावधानी कमजोरी नहीं है।
यह वैज्ञानिक पद्धति की ईमानदारी है।
लेकिन दूसरी ओर—
यदि कोई व्यक्ति विज्ञान की इस सावधानी को यह कहकर समझे कि “विज्ञान कुछ नहीं जानता”, तो यह भी गलत होगा।
विज्ञान बहुत कुछ जानता है।
वह मृत्यु की जैविक प्रक्रिया को समझने में असाधारण प्रगति कर चुका है।
बस वह उन प्रश्नों पर निश्चित उत्तर नहीं देता, जिनका परीक्षण उसके वर्तमान साधनों से सम्भव नहीं।
मृत्यु—विज्ञान के भीतर भी एक सीमा
अब तक एक बात स्पष्ट होनी चाहिए।
मृत्यु केवल एक जैविक घटना नहीं है।
लेकिन बिना जैविक वास्तविकता को समझे मृत्यु पर दार्शनिक चर्चा अधूरी है।
शरीर में क्या घटता है—यह जानना आवश्यक है।
क्योंकि आत्मा, चेतना और अस्तित्व पर विचार करने से पहले हमें यह स्वीकार करना होगा कि मृत्यु का एक वास्तविक जैविक आयाम है।
अगले भाग में प्रश्न और कठिन होगा।
यदि मस्तिष्क और चेतना का गहरा सम्बन्ध है, तो मृत्यु के समय चेतना के साथ क्या होता है?
और—
क्या चेतना केवल मस्तिष्क की प्रक्रिया है?
मुख्य विवाद:
मृत्यु को क्या जैविक प्रक्रियाओं के अपरिवर्तनीय अन्त के रूप में पर्याप्त रूप से समझा जा सकता है, या मृत्यु का कोई ऐसा आयाम भी है जिसे वर्तमान वैज्ञानिक पद्धति माप नहीं सकती?
आज की शोध-स्थिति:
आधुनिक चिकित्सा हृदय-परिसंचरण, मस्तिष्क-कार्य, जैविक मृत्यु और कोशिकीय मृत्यु के विभिन्न स्तरों का अध्ययन करती है। मृत्यु की चिकित्सकीय परिभाषाएँ स्पष्ट मानदण्डों पर आधारित हैं, किन्तु चेतना और मृत्यु के सम्बन्ध में दार्शनिक प्रश्न अभी भी खुले हैं।
अब भी अनुत्तरित प्रश्न:
यदि शरीर की जैविक प्रक्रियाएँ समाप्त हो जाती हैं, तो क्या चेतना भी उसी क्षण समाप्त होती है—या चेतना की प्रकृति को हम अभी पूरी तरह समझ ही नहीं पाए हैं?
मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)
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