चिंतन — अध्याय–19 : मृत्यु क्या है? — भाग–9 : मृत्यु का भय — मनोवैज्ञानिक अध्ययन

 चिंतन — अध्याय–19 : मृत्यु क्या है? — भाग–9 : मृत्यु का भय — मनोवैज्ञानिक अध्ययन

मृत्यु के बारे में जानना और मृत्यु से डरना—दो अलग बातें हैं।

मनुष्य मृत्यु को समझने का प्रयास करता है।

लेकिन उसी मनुष्य के भीतर मृत्यु का भय भी उपस्थित रहता है।

कभी यह भय स्पष्ट होता है।

कभी वह छिपा रहता है।

कभी मनुष्य मृत्यु का नाम लेने से बचता है।

कभी वह धर्म, दर्शन या विज्ञान के माध्यम से मृत्यु को अर्थ देने का प्रयास करता है।

यहाँ एक मूल प्रश्न उठता है—

मनुष्य मृत्यु से डरता क्यों है?

क्या मृत्यु का भय केवल जैविक आत्मरक्षा की प्रवृत्ति है?

या यह उस चेतना का परिणाम है, जो अपने भविष्य के अन्त की कल्पना कर सकती है?

मृत्यु का भय—जीवन की रक्षा से अधिक

हर जीव अपने जीवन की रक्षा करता है।

खतरे से बचना एक जैविक प्रवृत्ति है।

लेकिन मनुष्य का मृत्यु-भय इससे आगे जाता है।

मनुष्य उस खतरे से भी डर सकता है, जो अभी उपस्थित नहीं है।

वह भविष्य में अपनी मृत्यु की कल्पना कर सकता है।

वह वर्षों पहले किसी सम्भावित बीमारी, दुर्घटना या वृद्धावस्था के बारे में सोच सकता है।

अर्थात् मनुष्य मृत्यु के सामने उपस्थित होकर ही नहीं डरता।

वह मृत्यु की कल्पना से भी डर सकता है

यहीं मनोवैज्ञानिक मृत्यु-भय का विशेष स्वरूप दिखाई देता है।

मृत्यु-चेतना

मनुष्य जानता है कि वह जीवित है।

लेकिन वह यह भी जानता है कि उसका जीवन सीमित है।

इन दोनों ज्ञानों का एक साथ होना अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

यदि मनुष्य मृत्यु के बारे में सोच ही न सकता, तो मृत्यु-भय का वर्तमान रूप सम्भव नहीं होता।

लेकिन मनुष्य अपनी मृत्यु की कल्पना कर सकता है।

वह अपने भविष्य में अपनी अनुपस्थिति को देख सकता है।

यह एक असाधारण संज्ञानात्मक क्षमता है।

और सम्भवतः यही क्षमता मनुष्य के भीतर गहरे अस्तित्वगत तनाव को जन्म देती है।

जीवन की चेतना और मृत्यु की निश्चितता—दोनों एक ही मन में उपस्थित हैं।

Terror Management Theory

मृत्यु-भय को समझने के लिए मनोविज्ञान में Terror Management Theory एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।

इस सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य अपनी मृत्यु की सम्भावना से अवगत होता है।

लेकिन साथ ही उसमें जीवन बनाए रखने की गहरी जैविक प्रवृत्ति भी होती है।

इन दोनों के बीच तनाव उत्पन्न होता है।

मनोवैज्ञानिक रूप से इस तनाव को कम करने के लिए मनुष्य सांस्कृतिक अर्थ-व्यवस्थाएँ विकसित करता है।

धर्म।

राष्ट्र।

परम्परा।

नैतिक मूल्य।

समुदाय।

व्यक्तिगत उपलब्धियाँ।

इनमें से कुछ मनुष्य को यह अनुभव दे सकते हैं कि उसका जीवन किसी बड़े अर्थ का भाग है।

यहाँ सावधानी आवश्यक है।

इस सिद्धान्त का अर्थ यह नहीं कि धर्म या संस्कृति केवल मृत्यु-भय से पैदा हुए हैं।

यह केवल यह समझने का एक मनोवैज्ञानिक मॉडल है कि मृत्यु-चेतना मानव व्यवहार को कैसे प्रभावित कर सकती है।

मनुष्य अर्थ क्यों बनाता है?

मृत्यु की चेतना मनुष्य के सामने एक कठिन स्थिति रखती है।

जीवन सीमित है।

लेकिन मनुष्य अर्थ की खोज करता है।

वह चाहता है कि उसका जीवन केवल घटनाओं का क्रम न हो।

वह अपने जीवन को किसी कथा में रखना चाहता है।

“मैंने यह किया।”

“मैं इस उद्देश्य के लिए जीया।”

“मेरे जीवन का कोई अर्थ था।”

यहाँ मृत्यु की चेतना एक गहरी भूमिका निभा सकती है।

क्योंकि यदि जीवन अनन्त होता, तो सम्भवतः तात्कालिकता की भावना अलग होती।

लेकिन यहाँ भी हमें सावधान रहना चाहिए।

यह कहना कि “मृत्यु ही जीवन को अर्थ देती है” एक दार्शनिक व्याख्या है।

यह वैज्ञानिक तथ्य नहीं।

मृत्यु का भय और संस्कृति

मृत्यु के प्रति मनुष्य का व्यवहार सभी संस्कृतियों में समान नहीं होता।

कहीं मृत्यु को जीवन-चक्र का भाग माना जाता है।

कहीं उसे अत्यन्त भयावह घटना के रूप में देखा जाता है।

कहीं मृतकों के प्रति स्मृति और अनुष्ठान प्रमुख हैं।

कहीं व्यक्ति की व्यक्तिगत पहचान और शोक की अभिव्यक्ति अधिक प्रमुख होती है।

इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—

मृत्यु का जैविक तथ्य एक हो सकता है, लेकिन मृत्यु का मनोवैज्ञानिक अर्थ संस्कृति से प्रभावित होता है।

एक ही मृत्यु को अलग-अलग समाज अलग-अलग अर्थ दे सकते हैं।

यहाँ धर्म और संस्कृति मनुष्य के मृत्यु-भय को केवल बढ़ाते या घटाते नहीं।

वे उसे व्याख्या का ढाँचा भी प्रदान करते हैं।

परिवार और मृत्यु

मृत्यु-भय केवल व्यक्तिगत नहीं होता।

परिवार भी इसे प्रभावित करता है।

मनुष्य अपने प्रियजनों की मृत्यु से डरता है।

कभी अपनी मृत्यु से अधिक।

किसी प्रिय व्यक्ति के न रहने की कल्पना सम्बन्धों की गहराई को उजागर करती है।

यहाँ मृत्यु केवल “मैं नहीं रहूँगा” का प्रश्न नहीं है।

यह बन जाता है—

“वह नहीं रहेगा।”

या—

“मेरे बाद ये लोग कैसे रहेंगे?”

मृत्यु का भय इस प्रकार सम्बन्धों के भीतर प्रवेश करता है।

कभी व्यक्ति अपने जीवन को केवल अपने लिए नहीं, परिवार के लिए भी सुरक्षित रखना चाहता है।

यह मनोवैज्ञानिक संरचना मृत्यु के अर्थ को सामाजिक बनाती है।

मृत्यु का भय और इनकार

मनुष्य मृत्यु से निपटने के लिए अनेक मनोवैज्ञानिक उपाय अपनाता है।

कभी वह मृत्यु के बारे में सोचता ही नहीं।

कभी मृत्यु को टालता रहता है।

कभी स्वयं को यह समझाता है कि अभी बहुत समय है।

कभी वह मृत्यु के बारे में अत्यधिक सोचने लगता है।

इन दोनों के बीच एक जटिल सम्बन्ध है।

मृत्यु को पूरी तरह दबा देना भी मनुष्य को मुक्त नहीं करता।

और मृत्यु के बारे में लगातार सोचना भी जीवन को असन्तुलित कर सकता है।

इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि—

“क्या हमें मृत्यु के बारे में सोचना चाहिए?”

प्रश्न यह है—

“मृत्यु के विचार के साथ मनुष्य किस प्रकार जीता है?”

क्या मृत्यु का भय बुरा है?

यह भी एक सरल प्रश्न नहीं है।

मृत्यु का भय मनुष्य को असहाय बना सकता है।

लेकिन वही भय जीवन की रक्षा के लिए आवश्यक सावधानी भी उत्पन्न करता है।

किसी भी खतरे से पूर्ण निर्भयता हमेशा बुद्धिमत्ता नहीं होती।

मृत्यु का भय मनुष्य को अपनी सीमाओं का बोध करा सकता है।

लेकिन यदि वही भय जीवन पर पूर्ण नियन्त्रण करने लगे, तो वह जीवन की सम्भावनाओं को सीमित कर सकता है।

इसलिए मृत्यु-भय को केवल नकारात्मक या सकारात्मक कहना उचित नहीं।

उसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि मनुष्य उसे कैसे समझता और व्यवस्थित करता है

मृत्यु-चेतना और व्यवहार

मृत्यु की चेतना मनुष्य के निर्णयों को प्रभावित कर सकती है।

कभी व्यक्ति अधिक धार्मिक हो जाता है।

कभी अधिक आक्रामक।

कभी अपने समूह से अधिक जुड़ जाता है।

कभी अपने विरोधियों के प्रति कठोर हो जाता है।

कभी वह जीवन के छोटे अनुभवों को अधिक मूल्यवान मानने लगता है।

यहाँ मनोविज्ञान हमें एक महत्वपूर्ण सावधानी सिखाता है—

मृत्यु की चेतना का कोई एक सार्वभौमिक परिणाम नहीं होता।

एक ही मृत्यु-भय किसी व्यक्ति में करुणा उत्पन्न कर सकता है।

और किसी दूसरे में असहिष्णुता।

इसलिए मृत्यु-चेतना को स्वतः नैतिक शक्ति मानना उचित नहीं।

मृत्यु और जीवन का अर्थ

अब हम उस प्रश्न पर लौटते हैं, जो पहले भाग से हमारे साथ चल रहा है।

यदि मृत्यु निश्चित है, तो जीवन का अर्थ क्या है?

मनोविज्ञान इसका कोई अन्तिम दार्शनिक उत्तर नहीं देता।

लेकिन वह यह दिखाता है कि मनुष्य मृत्यु की चेतना से निपटने के लिए अर्थ-व्यवस्थाएँ बनाता है।

वह सम्बन्धों में अर्थ खोजता है।

धर्म में।

कार्य में।

रचना में।

स्मृति में।

कभी-कभी अपने बच्चों में।

कभी अपने विचारों में।

यहाँ एक कठिन सम्भावना भी है।

क्या मनुष्य वास्तव में अर्थ खोजता है?

या वह मृत्यु के भय को सहने के लिए अर्थ निर्मित करता है?

यह प्रश्न अभी खुला है।

मनोविज्ञान से दर्शन की ओर

मृत्यु का भय हमें मनुष्य के भीतर ले गया।

हमने देखा कि मृत्यु केवल जैविक तथ्य नहीं है।

वह एक मानसिक संरचना भी बनाती है।

मनुष्य भविष्य में अपनी मृत्यु की कल्पना करता है।

उससे भयभीत होता है।

संस्कृति और धर्म के माध्यम से उसे अर्थ देता है।

लेकिन अब एक और प्रश्न उठता है—

यदि मृत्यु की चेतना मनुष्य के व्यवहार को बदलती है, तो क्या मृत्यु वास्तव में जीवन को अर्थ देती है?

या मनुष्य केवल मृत्यु के सामने अर्थ का निर्माण करता है?

यहीं से हम अस्तित्ववाद की ओर बढ़ते हैं।

जहाँ मृत्यु कोई मनोवैज्ञानिक समस्या मात्र नहीं रहती।

वह मनुष्य के अस्तित्व के केन्द्र में आ जाती है।

मुख्य विवाद:

क्या मृत्यु का भय मनुष्य की जैविक आत्मरक्षा का विस्तार है, या मनुष्य की आत्म-जागरूकता और भविष्य की कल्पना से उत्पन्न विशिष्ट अस्तित्वगत अनुभव?

आज की शोध-स्थिति:

मृत्यु-चेतना, मृत्यु-भय और सांस्कृतिक व्यवहार पर मनोविज्ञान में व्यापक शोध जारी है। Terror Management Theory मृत्यु-चेतना और मानव व्यवहार के सम्बन्ध को समझने का एक महत्वपूर्ण मॉडल है, किन्तु इसके निष्कर्षों की व्याख्या और सार्वभौमिकता पर अकादमिक बहस बनी हुई है।

अब भी अनुत्तरित प्रश्न:

क्या मनुष्य जीवन का अर्थ इसलिए खोजता है क्योंकि जीवन अर्थपूर्ण है—या इसलिए कि मृत्यु के सामने अर्थहीनता को स्वीकार करना उसके लिए अत्यन्त कठिन है?

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)

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