चिंतन — अध्याय–20 : मोक्ष क्या है? — भाग–2 : मोक्ष क्या है? — अर्थ, परिभाषा और स्वरूप
चिंतन — अध्याय–20 : मोक्ष क्या है? — भाग–2 : मोक्ष क्या है? — अर्थ, परिभाषा और स्वरूप
पहले भाग में हमने देखा कि मोक्ष का प्रश्न मनुष्य की स्वतंत्रता, दुःख, जिज्ञासा और आत्मबोध से जुड़ा है। अब अगला प्रश्न स्वाभाविक है—
"मोक्ष वास्तव में है क्या?"
यह प्रश्न जितना सरल दिखाई देता है, उतना ही जटिल है।
क्योंकि भारतीय दर्शन में "मोक्ष" एक ही अर्थ वाला शब्द नहीं है। विभिन्न परम्पराओं ने इसे अलग-अलग दृष्टियों से समझा है। कहीं यह बन्धन से मुक्ति है, कहीं आत्मसाक्षात्कार, कहीं कैवल्य, कहीं निर्वाण, कहीं अपवर्ग, और भक्ति परम्पराओं में ईश्वर की निकटता या एकत्व के रूप में भी इसकी व्याख्या हुई है।
इसलिए मोक्ष को समझने का पहला चरण है—उसके अर्थ को स्पष्ट करना।
"मोक्ष" शब्द की व्युत्पत्ति
"मोक्ष" शब्द संस्कृत धातु "मुच्" से बना है।
"मुच्" का अर्थ है—
छोड़ना, मुक्त करना, बन्धन से छुड़ाना।
इसी धातु से "मोक्ष", "मोचन", "मुक्ति" आदि शब्द बने हैं।
इस व्युत्पत्तिगत अर्थ से इतना स्पष्ट होता है कि मोक्ष का मूल सम्बन्ध स्वतंत्रता से है।
किन्तु यहाँ तुरन्त एक प्रश्न उठता है—
यदि मोक्ष मुक्ति है, तो मनुष्य बँधा किससे है?
यही प्रश्न भारतीय दर्शन की विविध धाराओं को जन्म देता है।
मुक्ति और मोक्ष
दैनिक भाषा में "मुक्ति" और "मोक्ष" को समानार्थी माना जाता है।
किन्तु दार्शनिक साहित्य में कभी-कभी इनके प्रयोग में सूक्ष्म अन्तर मिलता है।
"मुक्ति" सामान्य अर्थ में किसी भी प्रकार के बन्धन से छुटकारा हो सकती है।
जबकि "मोक्ष" प्रायः मनुष्य के परम बन्धन से अंतिम स्वतंत्रता का द्योतक माना गया है।
यद्यपि अधिकांश ग्रन्थों में दोनों शब्द एक-दूसरे के स्थान पर भी प्रयुक्त हुए हैं।
कैवल्य
सांख्य और योग दर्शन में प्रमुख शब्द है—कैवल्य।
"कैवल्य" का अर्थ है—
पूर्ण एकाकीपन नहीं, बल्कि पुरुष का प्रकृति से पूर्णतः असंग हो जाना।
यहाँ मुक्ति का अर्थ संसार का विनाश नहीं, बल्कि दृष्टि का परिवर्तन है।
जब पुरुष स्वयं को प्रकृति से भिन्न जान लेता है, तब कैवल्य की अवस्था कही जाती है।
अपवर्ग
न्याय-वैशेषिक दर्शन "अपवर्ग" शब्द का प्रयोग करता है।
यहाँ अपवर्ग का अर्थ है—
दुःख और उसके कारणों से अंतिम निवृत्ति।
इस परम्परा में मुक्ति मुख्यतः दुःख-निवृत्ति के रूप में समझी जाती है।
निर्वाण
बौद्ध दर्शन में "मोक्ष" के स्थान पर अधिक प्रचलित शब्द है—निर्वाण।
शाब्दिक अर्थ है—
दीपक की लौ का शांत हो जाना।
किन्तु इसका अर्थ अस्तित्व का नाश नहीं माना जा सकता।
बौद्ध परम्पराओं में निर्वाण की अनेक व्याख्याएँ हैं।
सामान्यतः यह तृष्णा, अविद्या और क्लेशों के शांत होने की अवस्था है।
इसलिए निर्वाण को मोक्ष का सरल पर्याय मान लेना उचित नहीं होगा।
दोनों में समानताएँ भी हैं और महत्त्वपूर्ण भिन्नताएँ भी।
इनका विस्तृत अध्ययन आगे किया जाएगा।
क्या मोक्ष केवल नकारात्मक है?
यदि मोक्ष का अर्थ केवल बन्धनों से छुटकारा है, तो क्या वह केवल "नहीं" की अवस्था है?
नहीं दुःख, नहीं भय, नहीं जन्म, नहीं मृत्यु, या फिर—
क्या मोक्ष में कोई सकारात्मक पक्ष भी है?
जैसे—पूर्ण शान्ति, पूर्ण ज्ञान, पूर्ण करुणा, पूर्ण स्वतंत्रता।
विभिन्न दर्शन इस प्रश्न का अलग-अलग उत्तर देते हैं।
अद्वैत वेदान्त ब्रह्मज्ञान पर बल देता है। योग समाधि पर। भक्ति परम्पराएँ ईश्वर-सान्निध्य पर। बौद्ध दर्शन निर्वाण पर।
अतः मोक्ष केवल अभाव नहीं, अनेक परम्पराओं में एक सकारात्मक पूर्णता भी है।
क्या मोक्ष एक अवस्था है या अनुभव?
यह भी एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है।क्या मोक्ष कोई स्थायी स्थिति है?या एक गहन अनुभूति?
क्या उसे शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है?
या वह भाषा से परे है?
भारतीय आध्यात्मिक साहित्य में अनेक बार कहा गया कि अंतिम सत्य का अनुभव शब्दातीत है।
किन्तु दर्शन का कार्य उस अनुभव की सम्भावित बौद्धिक व्याख्या करना है।
इसी कारण मोक्ष पर चर्चा केवल श्रद्धा का नहीं, दर्शन का भी विषय बनती है।
क्या सभी मोक्ष एक जैसे हैं?
नहीं -भारतीय परम्परा में मोक्ष की अनेक अवधारणाएँ हैं।
आगे इस अध्याय में हम विस्तार से देखेंगे—
- जीवन्मुक्ति,विदेहमुक्ति,कैवल्य,निर्वाण, अपवर्ग,सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य,सार्ष्टि, सायुज्य
इन सभी को एक-दूसरे का पर्याय मानना उचित नहीं।
इनकी दार्शनिक पृष्ठभूमि और आध्यात्मिक लक्ष्य भिन्न हैं।
आगे की दिशा
अब जब मोक्ष के मूल अर्थ स्पष्ट हो गए, तो अगला प्रश्न यह है
क्या वेदों में भी मोक्ष की यही अवधारणा मिलती है?
या मोक्ष का विचार उपनिषदों और बाद के दर्शनों में विकसित हुआ? यही हमारे अगले भाग का विषय होगा।
मुख्य विवाद:
क्या "मोक्ष" एक सार्वभौमिक दार्शनिक अवधारणा है, या विभिन्न भारतीय परम्पराओं ने इसे मूलतः भिन्न अर्थों में परिभाषित किया है?
आज की शोध-स्थिति:
तुलनात्मक भारतीय दर्शन के आधुनिक अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि "मोक्ष", "निर्वाण", "कैवल्य", "अपवर्ग" और "मुक्ति" पूर्णतः समानार्थी नहीं हैं। इनके बीच समानताएँ होने पर भी इनके दार्शनिक आधार और अंतिम लक्ष्य भिन्न हैं।
अब भी अनुत्तरित प्रश्न:
यदि सभी परम्पराएँ मुक्ति की बात करती हैं, तो क्या वे वास्तव में एक ही अनुभव का वर्णन कर रही हैं, या मनुष्य की स्वतंत्रता की अलग-अलग कल्पनाएँ प्रस्तुत कर रही हैं?
मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)
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