चिंतन — अध्याय–20 : मोक्ष क्या है? — भाग–3 : वैदिक दृष्टि में मोक्ष
चिंतन — अध्याय–20 : मोक्ष क्या है? — भाग–3 : वैदिक दृष्टि में मोक्ष
पिछले भाग में हमने देखा कि "मोक्ष" शब्द और उसकी अवधारणा भारतीय दर्शन में अनेक रूपों में विकसित हुई। अब प्रश्न यह है—
क्या वेदों में भी मोक्ष की स्पष्ट अवधारणा मिलती है?
इस प्रश्न का उत्तर सावधानी से देना आवश्यक है।
यदि हम बाद के वेदान्त, योग या भक्ति-परम्पराओं में विकसित "मोक्ष" की पूर्ण अवधारणा को सीधे ऋग्वेद पर आरोपित कर दें, तो यह ऐतिहासिक और दार्शनिक दोनों दृष्टियों से उचित नहीं होगा।
दूसरी ओर, यदि यह कहा जाए कि वेदों में मोक्ष का कोई संकेत ही नहीं है, तो यह भी अधूरा निष्कर्ष होगा।
अतः हमें यह समझना होगा कि वेदों में मोक्ष का बीज है, जबकि उसका व्यवस्थित दार्शनिक विकास उपनिषदों और बाद के दर्शनों में दिखाई देता है।
क्या वेदों में "मोक्ष" शब्द मिलता है?
ऋग्वेद में "मोक्ष" शब्द उस विकसित दार्शनिक अर्थ में प्रायः नहीं मिलता, जैसा बाद के वेदान्त में मिलता है।
किन्तु इसके स्थान पर कुछ ऐसे विचार मिलते हैं, जो आगे चलकर मोक्ष-दर्शन की आधारभूमि बने—
- अमृतत्व (अमरत्व)
- ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था)
- ब्रह्मलोक की आकांक्षा
- देवयान की धारणा
- बन्धन से मुक्ति की प्रार्थनाएँ
- सत्य और प्रकाश की ओर गमन
ये सभी संकेत बताते हैं कि वैदिक ऋषि केवल दीर्घायु नहीं चाहते थे; वे जीवन की किसी उच्चतर पूर्णता की भी खोज कर रहे थे।
अमृतत्व की खोज
ऋग्वेद में बार-बार "अमृत" और "अमृतत्व" की चर्चा आती है।
किन्तु यहाँ एक महत्त्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है।
वैदिक "अमृतत्व" को केवल शरीर की अनन्त आयु समझ लेना उचित नहीं।
अनेक वैदिक मन्त्रों में यह शब्द उस उच्चतर अस्तित्व या दिव्य स्थिति का प्रतीक है, जो नश्वरता के बोध से परे मानी गई।
अर्थात्—
ऋषियों का लक्ष्य केवल अधिक समय तक जीवित रहना नहीं था।
वे उस सत्य की खोज कर रहे थे जो परिवर्तनशील जीवन के पीछे स्थित है।
यही विचार आगे चलकर उपनिषदों में आत्मविद्या के रूप में विकसित होता है।
ऋत और मुक्ति
वेदों की सबसे महत्त्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक है—ऋत।
ऋत का अर्थ केवल प्राकृतिक नियम नहीं है।
यह ब्रह्माण्ड की नैतिक, आध्यात्मिक और अस्तित्वगत व्यवस्था का भी बोध कराता है।
मनुष्य जब ऋत के अनुरूप जीवन जीता है, तब वह स्वयं को व्यापक ब्रह्माण्डीय व्यवस्था से जुड़ा हुआ अनुभव करता है।
यद्यपि वेद यहाँ "मोक्ष" शब्द का प्रयोग नहीं करते, किन्तु यह विचार स्पष्ट है कि असत्य, अज्ञान और अव्यवस्था से सत्य और ऋत की ओर गमन मनुष्य की उच्चतर यात्रा है।
मृत्यु से अमृत की ओर
वैदिक और उपनिषदिक परम्परा में एक अत्यन्त प्रसिद्ध प्रार्थना है—
"मृत्योर्मा अमृतं गमय।"
अर्थ—
"मुझे मृत्यु से अमृत की ओर ले चल।"
यह वाक्य केवल मृत्यु के बाद अमर हो जाने की प्रार्थना नहीं है।
दार्शनिक दृष्टि से इसका आशय है—
नश्वरता के बोध से उस सत्य की ओर बढ़ना जो स्थायी है।
अज्ञान से ज्ञान की ओर।
सीमितता से व्यापकता की ओर।
इसीलिए यह मन्त्र भारतीय आध्यात्मिक चिन्तन का आधार बन गया।
वैदिक यज्ञ और मोक्ष
सामान्य धारणा है कि वेद केवल यज्ञकर्म पर आधारित हैं।
यह धारणा आंशिक रूप से सही है।
प्रारम्भिक वैदिक जीवन में यज्ञ का अत्यन्त महत्त्व था।
किन्तु यज्ञ केवल बाहरी अग्नि में आहुति देना नहीं था।
वह मनुष्य, प्रकृति और देवत्व के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रतीक भी था।
बाद में उपनिषदों ने इसी यज्ञ को आन्तरिक साधना की दिशा में रूपान्तरित किया।
इस प्रकार बाह्य कर्म से आन्तरिक ज्ञान की यात्रा भी वैदिक परम्परा के भीतर ही विकसित हुई।
क्या वेद संसार-त्याग सिखाते हैं?
यह भी एक सामान्य भ्रान्ति है।
वेद जीवन का निषेध नहीं करते।
वे समृद्धि, स्वास्थ्य, दीर्घायु, परिवार, ज्ञान और लोककल्याण की कामना करते हैं।
अतः वैदिक दृष्टि में उच्चतर जीवन और आध्यात्मिक उन्नति, सांसारिक उत्तरदायित्व के विरोधी नहीं हैं।
यही कारण है कि बाद की भारतीय परम्पराओं में भी गृहस्थ जीवन और आध्यात्मिक साधना को परस्पर विरोधी नहीं माना गया।
वैदिक दृष्टि की सीमा
इतिहास की दृष्टि से यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि वेदों में वह विकसित मोक्ष-दर्शन नहीं मिलता जो हमें अद्वैत वेदान्त, योग या भक्ति परम्पराओं में दिखाई देता है।
वेद संकेत देते हैं।
उपनिषद उन संकेतों का दार्शनिक विस्तार करते हैं।
इसलिए वैदिक साहित्य को उसके अपने ऐतिहासिक और दार्शनिक सन्दर्भ में ही समझना चाहिए।
अगले भाग की भूमिका
यदि वेदों में मोक्ष का बीज है,
तो वह उपनिषदों में किस रूप में विकसित हुआ?
क्या उपनिषदों के अनुसार मोक्ष कोई लोक है?
कोई अवस्था है?
या आत्मा और ब्रह्म की एकता का प्रत्यक्ष अनुभव?
यहीं से भारतीय दर्शन का एक नया अध्याय आरम्भ होता है।
और यही हमारे अगले भाग का विषय होगा।
मुख्य विवाद:
क्या वेदों में मोक्ष की स्पष्ट अवधारणा है, या बाद की उपनिषदिक और वेदान्त परम्पराओं ने वैदिक संकेतों का विस्तार करके मोक्ष-दर्शन का निर्माण किया?
आज की शोध-स्थिति:
आधुनिक वैदिक अध्ययन का सामान्य मत है कि ऋग्वेद और अन्य संहिताओं में मोक्ष का पूर्ण विकसित सिद्धान्त नहीं मिलता। किन्तु अमृतत्व, ऋत, सत्य और उच्चतर अस्तित्व की खोज जैसी अवधारणाएँ बाद के उपनिषदिक मोक्ष-दर्शन की आधारभूमि अवश्य तैयार करती हैं।
अब भी अनुत्तरित प्रश्न:
यदि वेदों का लक्ष्य जीवन को ऋत के अनुरूप बनाना था, तो क्या मोक्ष उसी यात्रा की अंतिम परिणति है, या यह बाद के दार्शनिक विकास की एक नई व्याख्या है?
मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)
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