चिंतन — अध्याय–20 : मोक्ष क्या है? — भाग–4 : उपनिषदों का मोक्ष — आत्मबोध या ब्रह्मानुभूति?

 चिंतन — अध्याय–20 : मोक्ष क्या है? — भाग–4 : उपनिषदों का मोक्ष — आत्मबोध या ब्रह्मानुभूति?

पिछले भाग में हमने देखा कि वेदों में मोक्ष का बीज रूप मिलता है, किन्तु उसका पूर्ण दार्शनिक विकास उपनिषदों में दिखाई देता है।

यहीं भारतीय दर्शन एक निर्णायक मोड़ लेता है।

प्रश्न अब केवल यह नहीं रह जाता कि मनुष्य दुःख से कैसे मुक्त हो।

प्रश्न यह बन जाता है—

"मैं कौन हूँ?"

उपनिषदों के अनुसार जब तक इस प्रश्न का समाधान नहीं होता, तब तक मोक्ष का प्रश्न भी अधूरा रहता है।

अतः उपनिषदों में मोक्ष किसी स्थान की प्राप्ति नहीं, बल्कि स्वरूप की पहचान है।

उपनिषदों में मोक्ष का मूल प्रश्न

उपनिषद बार-बार मनुष्य को बाहरी संसार से हटाकर स्वयं की ओर ले जाते हैं।

वे पूछते हैं—

जो देख रहा है, वह कौन है?

जो सोच रहा है, वह कौन है?

जो सुख-दुःख का अनुभव कर रहा है, वह कौन है?

यदि मनुष्य स्वयं को केवल शरीर मानता है, तो वह परिवर्तन के साथ बदलता रहेगा।

यदि वह स्वयं को केवल मन मानता है, तो विचारों के साथ बदलता रहेगा।

किन्तु क्या मनुष्य में कोई ऐसी सत्ता भी है जो इन परिवर्तनों की साक्षी है?

यही उपनिषदों का केन्द्रीय प्रश्न है।

आत्मा और ब्रह्म

उपनिषदों की सबसे प्रसिद्ध स्थापना है—

आत्मा और ब्रह्म का सम्बन्ध।

विभिन्न उपनिषदों में इसे अलग-अलग प्रकार से व्यक्त किया गया है।

महावाक्य—

"तत्त्वमसि" (तू वही है)

"अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्म हूँ)

"अयमात्मा ब्रह्म" (यह आत्मा ही ब्रह्म है)

"प्रज्ञानं ब्रह्म" (चैतन्य ही ब्रह्म है)

इनका उद्देश्य कोई दार्शनिक नारा देना नहीं है।

ये साधक को उसकी वास्तविक पहचान की ओर संकेत करते हैं।

यदि आत्मा का वास्तविक स्वरूप ब्रह्म से अभिन्न है, तो मोक्ष किसी नई वस्तु की प्राप्ति नहीं, बल्कि भूल का अन्त है।

क्या मोक्ष प्राप्त करना पड़ता है?

यहाँ उपनिषद एक अत्यन्त सूक्ष्म बात कहते हैं।

यदि आत्मा सदैव पूर्ण है,

तो मोक्ष कोई नई उपलब्धि कैसे हो सकता है?

इस दृष्टि से मोक्ष प्राप्त नहीं किया जाता।

उसका आवरण हटाया जाता है।

अज्ञान हटता है।

ज्ञान प्रकट होता है।

जैसे बादलों के हटने पर सूर्य नया उत्पन्न नहीं होता, केवल दिखाई देने लगता है।

उसी प्रकार आत्मा का स्वरूप भी उपनिषदों के अनुसार सदैव विद्यमान है।

मोक्ष उस सत्य की पहचान है।

क्या मोक्ष कोई स्थान है?

लोकप्रिय धार्मिक कल्पनाओं में मोक्ष को कभी-कभी किसी दिव्य लोक के रूप में समझा जाता है।

किन्तु उपनिषदों का प्रमुख स्वर इससे भिन्न है।

वे मोक्ष को किसी भौगोलिक स्थान की प्राप्ति नहीं मानते।

वह चेतना की अवस्था है।ज्ञान की परिपक्वता है। स्वरूप की अनुभूति है।

इसीलिए उपनिषदों में यात्रा बाहर नहीं, भीतर की ओर है।

ज्ञान और मोक्ष

उपनिषदों में बार-बार कहा गया है कि अविद्या बन्धन है और विद्या मुक्ति का मार्ग।

किन्तु यहाँ "ज्ञान" का अर्थ केवल पुस्तकीय जानकारी नहीं है।

किसी ग्रन्थ को पढ़ लेना आत्मबोध नहीं है।

किसी शास्त्र को कण्ठस्थ कर लेना भी मोक्ष नहीं है।

उपनिषदों का ज्ञान प्रत्यक्ष अनुभूति का ज्ञान है।

जिसमें जानने वाला, ज्ञेय और ज्ञान—तीनों का सम्बन्ध बदल जाता है।

यही कारण है कि उपनिषद केवल विचार नहीं देते।

वे साधना की दिशा भी बताते हैं।

क्या सभी उपनिषद एक ही बात कहते हैं?

मूल लक्ष्य समान है— आत्मबोध।

किन्तु उसकी अभिव्यक्ति में विविधता है।

कठोपनिषद् नचिकेता के माध्यम से मृत्यु और आत्मा की चर्चा करता है।

छान्दोग्य उपनिषद् "तत्त्वमसि" के माध्यम से शिक्षा देता है।

बृहदारण्यक उपनिषद् आत्मा के स्वरूप का गहन विश्लेषण करता है।

माण्डूक्य उपनिषद् चेतना की अवस्थाओं का अध्ययन करता है।

अर्थात्—मार्ग अलग हो सकते हैं,

किन्तु लक्ष्य आत्मस्वरूप की पहचान ही है।

क्या उपनिषद केवल अद्वैत सिखाते हैं?

यह प्रश्न भी महत्त्वपूर्ण है।

यद्यपि अद्वैत वेदान्त ने उपनिषदों की एक अत्यन्त प्रभावशाली व्याख्या प्रस्तुत की,

किन्तु विशिष्टाद्वैत, द्वैत, भेदाभेद और अन्य वेदान्त परम्पराओं ने भी इन्हीं उपनिषदों की अलग-अलग व्याख्याएँ की हैं।

इसलिए यह कहना कि उपनिषद केवल एक ही दार्शनिक मत का समर्थन करते हैं, उचित नहीं होगा। उपनिषद मूल स्रोत हैं।

उनकी विभिन्न व्याख्याएँ बाद की दार्शनिक परम्पराओं में विकसित हुईं।

आत्मबोध और ब्रह्मानुभूति

अब प्रश्न उठता है— क्या आत्मबोध और ब्रह्मानुभूति दो अलग अवस्थाएँ हैं?

अद्वैत वेदान्त कहता है—दोनों अन्ततः एक ही हैं।

अन्य वेदान्त परम्पराएँ आत्मा और परमात्मा के सम्बन्ध को भिन्न प्रकार से समझती हैं।

अतः यह विषय केवल आध्यात्मिक अनुभव का ही नहीं,

दार्शनिक व्याख्या का भी विषय है।

इसी कारण उपनिषदों का अध्ययन आज भी समाप्त नहीं हुआ है।

उपनिषदों का सबसे बड़ा योगदान

यदि एक वाक्य में कहा जाए, तो उपनिषदों ने मोक्ष की दिशा बदल दी।

उन्होंने मनुष्य से कहा— मुक्ति बाहर नहीं मिलेगी।

पहले यह जानो कि तुम वास्तव में कौन हो।

यही उपनिषदों की सबसे बड़ी क्रान्ति है।

मोक्ष को उन्होंने भविष्य की घटना नहीं,

वर्तमान में सम्भव आत्मबोध की दिशा बना दिया।

अगले भाग की भूमिका

उपनिषदों के बाद भारतीय दर्शन अनेक धाराओं में विकसित हुआ।

सांख्य ने कैवल्य की बात की।

योग ने चित्तवृत्ति-निरोध की।

न्याय ने अपवर्ग की।

वेदान्त ने ब्रह्मज्ञान की।

क्या ये सभी एक ही मोक्ष की अलग-अलग व्याख्याएँ हैं,

या वास्तव में इनके लक्ष्य भिन्न हैं?

यही हमारे अगले भाग का विषय होगा।

मुख्य विवाद:

क्या उपनिषदों के अनुसार मोक्ष आत्मा और ब्रह्म की पूर्ण एकता का अनुभव है, या विभिन्न वेदान्त परम्पराओं ने इसकी भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं?

आज की शोध-स्थिति:

समकालीन उपनिषद-अध्ययन यह स्वीकार करता है कि उपनिषद आत्मबोध को केन्द्रीय स्थान देते हैं। किन्तु उनके महावाक्यों की व्याख्या अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत तथा अन्य वेदान्त परम्पराओं में अलग-अलग हुई है। इसलिए उपनिषदों की एकमात्र सर्वस्वीकृत दार्शनिक व्याख्या उपलब्ध नहीं है।

अब भी अनुत्तरित प्रश्न:

यदि आत्मा का वास्तविक स्वरूप सदैव मुक्त है, तो फिर मनुष्य स्वयं को बन्धन में अनुभव क्यों करता है?

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)

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