चिंतन — अध्याय–20 : मोक्ष क्या है? — भाग–5 : भारतीय दर्शनों में मोक्ष
चिंतन — अध्याय–20 : मोक्ष क्या है? — भाग–5 : भारतीय दर्शनों में मोक्ष
पिछले भाग में हमने देखा कि उपनिषदों ने मोक्ष को आत्मबोध और ब्रह्मविद्या के साथ जोड़ा। परन्तु भारतीय दर्शन एकरूप नहीं है। उपनिषदों के बाद विभिन्न दार्शनिक परम्पराओं ने मनुष्य, जगत, आत्मा और बन्धन की अलग-अलग व्याख्याएँ कीं। स्वाभाविक रूप से मोक्ष की उनकी अवधारणाएँ भी भिन्न हो गईं।
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात समझनी आवश्यक है—
भारतीय दर्शन में मोक्ष का लक्ष्य लगभग सभी आस्तिक दर्शनों में स्वीकार किया गया है, किन्तु मोक्ष का स्वरूप और साधन सभी में समान नहीं हैं।
इसी विविधता ने भारतीय दर्शन को समृद्ध बनाया है।
सांख्य दर्शन : कैवल्य
सांख्य दर्शन के अनुसार संसार का मूल कारण प्रकृति है और चेतन सत्ता पुरुष है।
बन्धन का कारण यह नहीं कि पुरुष वास्तव में बँधा हुआ है, बल्कि यह कि वह स्वयं को प्रकृति के साथ अभिन्न मान बैठता है।
जब विवेक उत्पन्न होता है और पुरुष अपने वास्तविक स्वरूप को प्रकृति से भिन्न पहचान लेता है, तब कैवल्य की अवस्था प्राप्त होती है।
यहाँ मोक्ष का अर्थ किसी स्थान पर पहुँचना नहीं, बल्कि भ्रम का अन्त है।
योग दर्शन : चित्तवृत्ति-निरोध
पतञ्जलि का योगदर्शन सांख्य के दार्शनिक आधार को स्वीकार करता है, किन्तु साधना की स्पष्ट पद्धति प्रस्तुत करता है।
योगसूत्र का प्रसिद्ध वाक्य है—
"योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।"
योग के अनुसार चित्त की वृत्तियाँ ही मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप से दूर रखती हैं।
जब ये वृत्तियाँ शान्त होती हैं, तब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित होता है।
अतः योग में मोक्ष केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, बल्कि अनुशासित साधना और प्रत्यक्ष अनुभव का परिणाम है।
न्याय और वैशेषिक : अपवर्ग
न्याय और वैशेषिक दर्शन तर्क, प्रमाण और यथार्थ ज्ञान पर विशेष बल देते हैं।
इनके अनुसार बन्धन का कारण मिथ्या ज्ञान और उससे उत्पन्न राग-द्वेष आदि हैं।
जब यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है, तब दुःखों का पूर्ण अन्त होता है।
इसी अवस्था को अपवर्ग कहा गया है।
यहाँ मोक्ष मुख्यतः दुःख से अंतिम निवृत्ति के रूप में समझा गया है।
पूर्वमीमांसा : कर्म और मुक्ति
पूर्वमीमांसा का मुख्य केन्द्र वेदविहित कर्म है।
प्रारम्भिक मीमांसकों ने मोक्ष पर अपेक्षाकृत कम बल दिया।
उनका प्रमुख उद्देश्य धर्म और यज्ञकर्म की व्याख्या था।
बाद के मीमांसकों ने मोक्ष पर विचार किया, किन्तु उनकी अवधारणा वेदान्त से भिन्न रही।
यह तथ्य बताता है कि भारतीय दर्शन में मोक्ष का प्रश्न सभी परम्पराओं में समान रूप से विकसित नहीं हुआ।
वेदान्त : ब्रह्मज्ञान
वेदान्त में मोक्ष का स्वरूप सबसे व्यापक रूप से विकसित हुआ।
किन्तु स्वयं वेदान्त के भीतर भी अनेक मत हैं।
अद्वैत वेदान्त
आदि शंकराचार्य के अनुसार मोक्ष ब्रह्मज्ञान है।
आत्मा और ब्रह्म में कोई वास्तविक भेद नहीं।
अज्ञान के कारण भेद का अनुभव होता है।
ज्ञान होने पर वही बन्धन समाप्त हो जाता है।
विशिष्टाद्वैत
रामानुजाचार्य आत्मा और ब्रह्म के सम्बन्ध को अभिन्न नहीं, बल्कि विशिष्ट सम्बन्ध के रूप में समझते हैं।
मोक्ष ईश्वर की प्राप्ति और उसके अनन्त सान्निध्य की अवस्था है।
द्वैत
मध्वाचार्य के अनुसार जीव और ईश्वर सदैव भिन्न हैं।
मोक्ष का अर्थ ईश्वर के निकट आनन्दपूर्ण स्थिति प्राप्त करना है, न कि ईश्वर में पूर्ण अभेद।
इस प्रकार वेदान्त स्वयं अनेक दार्शनिक दिशाओं में विकसित हुआ।
क्या सभी दर्शनों का लक्ष्य एक ही है?
यदि केवल बाहरी रूप देखें, तो सभी "मुक्ति" की बात करते हैं।
किन्तु गहराई से देखने पर स्पष्ट होता है कि—
- सांख्य का लक्ष्य कैवल्य है।
- योग का लक्ष्य समाधि और कैवल्य है।
- न्याय का लक्ष्य अपवर्ग है।
- वेदान्त का लक्ष्य ब्रह्मज्ञान या ईश्वर-प्राप्ति है।
शब्द अलग हैं।
साधन अलग हैं।
दर्शन का आधार भी अलग है।
फिर भी एक समानता अवश्य है—
मनुष्य अपनी वर्तमान सीमित अवस्था से आगे बढ़ सकता है।
यही भारतीय दर्शन की साझा प्रेरणा है।
क्या एक ही मत को अंतिम सत्य कहा जा सकता है?
दार्शनिक ईमानदारी का उत्तर है—नहीं।
प्रत्येक दर्शन अपनी मान्यताओं, तर्कों और प्रमाण-पद्धति के आधार पर मोक्ष की व्याख्या करता है।
किसी एक मत को सार्वभौमिक वैज्ञानिक सत्य घोषित करना उचित नहीं।
उसी प्रकार किसी अन्य मत को बिना अध्ययन के अस्वीकार कर देना भी उचित नहीं।
भारतीय दर्शन की शक्ति उसकी विविधता में है।
भारतीय दर्शन का समन्वित संकेत
यदि इन सभी दर्शनों का एक साझा सूत्र खोजा जाए, तो वह यह हो सकता है—
मनुष्य जिस बन्धन को वास्तविक मानता है, उसी की पहचान और उससे मुक्ति की प्रक्रिया को प्रत्येक दर्शन अपने ढंग से समझाता है।
अतः मोक्ष का स्वरूप इस बात पर निर्भर करता है कि संबंधित दर्शन बन्धन को कैसे परिभाषित करता है।
अगले भाग की भूमिका
अब तक हमने आस्तिक भारतीय दर्शनों की चर्चा की।
किन्तु भारतीय बौद्धिक परम्परा यहीं समाप्त नहीं होती।
बौद्ध दर्शन आत्मा को स्थायी नहीं मानता।
जैन दर्शन जीव की स्वतंत्र सत्ता स्वीकार करता है।
फिर दोनों "मुक्ति" की बात कैसे करते हैं?
क्या निर्वाण और मोक्ष एक ही हैं?
यही हमारे अगले भाग का विषय होगा।
मुख्य विवाद:
क्या भारतीय दर्शनों में वर्णित कैवल्य, अपवर्ग और ब्रह्मज्ञान अंततः एक ही लक्ष्य के भिन्न नाम हैं, या वे वास्तव में अलग-अलग दार्शनिक आदर्श प्रस्तुत करते हैं?
आज की शोध-स्थिति:
तुलनात्मक भारतीय दर्शन के आधुनिक अध्ययनों का सामान्य निष्कर्ष है कि विभिन्न दर्शनों में मोक्ष की अवधारणा में कुछ समान तत्व अवश्य हैं, किन्तु उनके तात्त्विक आधार, साधना-पद्धति और अंतिम लक्ष्य में महत्त्वपूर्ण भिन्नताएँ भी हैं। इसलिए उन्हें पूर्णतः समान मानना दार्शनिक रूप से उचित नहीं माना जाता।
अब भी अनुत्तरित प्रश्न:
यदि सभी दर्शन मुक्ति की बात करते हैं, तो क्या वे एक ही सत्य को अलग-अलग भाषाओं में व्यक्त कर रहे हैं, या प्रत्येक दर्शन वास्तव में मनुष्य की स्वतंत्रता का एक भिन्न स्वरूप प्रस्तुत करता है?
मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)
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