चिंतन — अध्याय–24 : माया क्या है? — भाग–10 : मनोविज्ञान, अहंकार और माया — मानसिक प्रक्षेपण, स्मृति, इच्छा और पहचान का विज्ञान
चिंतन — अध्याय–24 : माया क्या है? — भाग–10 : मनोविज्ञान, अहंकार और माया — मानसिक प्रक्षेपण, स्मृति, इच्छा और पहचान का विज्ञान
अब तक हमने माया को वैदिक, उपनिषदिक, वेदान्तिक, बौद्ध, जैन, शैव तथा वैज्ञानिक दृष्टियों से समझने का प्रयास किया। इन सभी अध्ययनों से एक तथ्य स्पष्ट होता है कि मनुष्य संसार को जैसा अनुभव करता है, वह केवल बाह्य वस्तुओं का परिणाम नहीं है। उस अनुभव में उसके मन, स्मृति, भावनाएँ, इच्छाएँ, संस्कार, भय और अहंकार भी समान रूप से सहभागी होते हैं।
यहीं से माया का एक नया आयाम सामने आता है। यह केवल बाहरी जगत की समस्या नहीं, बल्कि मानव-मन की संरचना का भी प्रश्न है।
क्या मन वास्तविकता को वैसा ही देखता है जैसी वह है?
आधुनिक मनोविज्ञान का उत्तर है—नहीं।
मनुष्य किसी भी घटना को केवल देखता नहीं, बल्कि उसकी व्याख्या भी करता है। यही व्याख्या उसके अनुभव का निर्माण करती है।
यदि दो व्यक्ति एक ही घटना के साक्षी हों, तो सम्भव है कि दोनों उसकी बिल्कुल भिन्न स्मृति रखें। इसका कारण यह है कि प्रत्येक व्यक्ति का मन अपने पूर्व अनुभवों, मान्यताओं और अपेक्षाओं के आधार पर वास्तविकता को अर्थ देता है।
इस प्रकार मन केवल संसार का दर्पण नहीं है; वह संसार का व्याख्याकार (Interpreter) भी है।
मानसिक प्रक्षेपण (Psychological Projection)
मनोविज्ञान में एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है—प्रक्षेपण (Projection)।
मनुष्य कई बार अपने भीतर की भावनाओं, इच्छाओं, भय और असुरक्षाओं को दूसरों पर आरोपित कर देता है।
जो व्यक्ति स्वयं भयग्रस्त है, उसे संसार अधिक शत्रुतापूर्ण दिखाई देता है।
जो व्यक्ति भीतर से प्रेमपूर्ण है, वही संसार उसे अधिक सौन्दर्यपूर्ण और सहृदय प्रतीत होता है।
बाह्य जगत वही रहता है, किन्तु अनुभव बदल जाता है।
भारतीय दर्शन इसे ही विभिन्न रूपों में चित्त की वृत्तियाँ, संस्कार अथवा अविद्या कहता है।
स्मृति : अतीत का अदृश्य प्रभाव
मनुष्य वर्तमान में जीता हुआ प्रतीत होता है, परन्तु उसका अधिकांश व्यवहार अतीत की स्मृतियों से संचालित होता है।
बाल्यकाल के अनुभव, पारिवारिक संस्कार, सामाजिक धारणाएँ, सफलताएँ, असफलताएँ—ये सब उसके वर्तमान निर्णयों को प्रभावित करते हैं।
आधुनिक मनोविज्ञान यह स्वीकार करता है कि स्मृति कोई स्थिर रिकॉर्ड नहीं होती। प्रत्येक स्मरण के साथ उसमें परिवर्तन सम्भव है।
अर्थात् हम केवल अतीत को याद नहीं करते; कई बार उसे पुनर्निर्मित (Reconstruct) भी करते हैं।
यही कारण है कि मनुष्य कई बार अपनी ही निर्मित मानसिक दुनिया में जीने लगता है।
इच्छा और माया
उपनिषदों में कहा गया है—"यथा कामो भवति तत्क्रतुर्भवति।"
(बृहदारण्यक उपनिषद् ४.४.५)
अर्थ—मनुष्य जैसी इच्छा करता है, वैसा ही उसका संकल्प बनता है; और जैसा संकल्प होता है, वैसा ही उसका जीवन बनता है।
इच्छा स्वयं समस्या नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब मनुष्य अपनी पहचान को इच्छाओं से जोड़ लेता है।
तब वस्तुएँ साधन नहीं रहतीं; वे स्वयं का विस्तार बन जाती हैं।
यही स्थिति आसक्ति को जन्म देती है।
माया का एक सूक्ष्म रूप यही है कि मनुष्य यह मान लेता है—
"मेरे पास जो है, वही मैं हूँ।"
अहंकार : सबसे सूक्ष्म माया
भारतीय दर्शन में अहंकार का अर्थ केवल अभिमान नहीं है।
अहंकार वह मानसिक संरचना है जो "मैं" और "मेरा" की भावना का निर्माण करती है। शरीर मेरा, विचार मेरे, धन मेरा, परिवार मेरा, प्रतिष्ठा मेरी।
धीरे-धीरे यह "मेरा" इतना प्रबल हो जाता है कि मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है।
यही कारण है कि उपनिषद बार-बार पूछते हैं—"मैं कौन हूँ?"
क्योंकि जब तक इस प्रश्न का उत्तर केवल शरीर, मन, पद या सम्बन्धों तक सीमित रहेगा, तब तक माया बनी रहेगी।
पहचान (Identity) का निर्माण
आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मनुष्य की पहचान (Identity) जन्म से तैयार नहीं होती।
वह धीरे-धीरे बनती है—
- परिवार से।
- समाज से।
- भाषा से।
- संस्कृति से।
- शिक्षा से।
- स्मृतियों से।
- उपलब्धियों और असफलताओं से।
इन सबके आधार पर मनुष्य एक कथा (Narrative) निर्मित करता है—"मैं कौन हूँ?"
यह कथा उपयोगी है, क्योंकि इसके बिना सामाजिक जीवन सम्भव नहीं।
किन्तु यदि यही कथा अंतिम सत्य मान ली जाए, तो वही माया बन जाती है।
भारतीय दर्शन और आधुनिक मनोविज्ञान का संवाद
भारतीय दर्शन कहता है कि मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर नाम, रूप और अहंकार से स्वयं को जोड़ लेता है।
मनोविज्ञान कहता है कि मनुष्य अपनी पहचान मानसिक प्रक्रियाओं और सामाजिक अनुभवों के आधार पर निर्मित करता है।
दोनों की भाषा अलग है, परन्तु दोनों इस बात पर सहमत हैं कि—
मनुष्य जैसा स्वयं को समझता है, वह आवश्यक नहीं कि उसका अंतिम स्वरूप भी वही हो।
यहीं माया का सबसे सूक्ष्म आयाम प्रकट होता है।
माया केवल बाहर दिखाई देने वाला संसार नहीं; माया वह भी है जो भीतर "मैं" का सीमित बोध उत्पन्न करती है।
माया का मनोवैज्ञानिक निष्कर्ष
जब मनुष्य अपने विचारों को ही सत्य मान लेता है, तब माया जन्म लेती है।
जब वह अपनी भावनाओं को ही वास्तविकता मान लेता है, तब माया जन्म लेती है।
जब वह अपनी सामाजिक पहचान को ही अपना सम्पूर्ण अस्तित्व मान लेता है, तब भी माया जन्म लेती है।
माया का सबसे गहरा रूप बाहर नहीं, बल्कि भीतर निर्मित होता है।
और जब भीतर माया उत्पन्न होती है, तो उसका परिणाम बाहर आसक्ति, मोह, भय, ईर्ष्या, संघर्ष और दुःख के रूप में दिखाई देता है।
इसीलिए अगला प्रश्न स्वाभाविक है—यदि माया मनुष्य के भीतर इतनी गहराई से कार्य करती है, तो वह उसके जीवन में दुःख, मोह, भय और आसक्ति को किस प्रकार जन्म देती है? और क्या यही दुःख का वास्तविक कारण है?
इन्हीं प्रश्नों का दार्शनिक विश्लेषण अगले भाग में "जीवन, दुःख और माया" के अन्तर्गत किया जाएगा।
मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)
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