चिंतन — अध्याय–24 : माया क्या है? — भाग–11 : जीवन, दुःख और माया — आसक्ति, मोह, भय और बन्धन का दार्शनिक विश्लेषण

 चिंतन — अध्याय–24 : माया क्या है? — भाग–11 : जीवन, दुःख और माया — आसक्ति, मोह, भय और बन्धन का दार्शनिक विश्लेषण

मनुष्य के जीवन में यदि किसी अनुभव की सर्वाधिक व्यापक उपस्थिति है, तो वह है दुःख। यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति सुख की खोज करता है, फिर भी जीवन में असन्तोष, भय, शोक, असुरक्षा, वियोग और मृत्यु का अनुभव बार-बार सामने आता है। यही कारण है कि भारतीय दर्शन की लगभग सभी परम्पराओं—वेदान्त, बौद्ध, जैन, योग और सांख्य—ने किसी न किसी रूप में यह प्रश्न अवश्य पूछा है कि मनुष्य दुःखी क्यों है?

इन सभी दर्शनों के उत्तर भिन्न हो सकते हैं, परन्तु एक बात पर वे लगभग सहमत हैं—दुःख का मूल कारण बाहरी संसार नहीं, बल्कि उसके प्रति हमारी आसक्ति और अज्ञान है। यही वह स्थान है जहाँ माया का सम्बन्ध सीधे मानव जीवन से जुड़ जाता है।

माया और आसक्ति

माया का सबसे प्रभावशाली रूप आसक्ति (Attachment) है।

आसक्ति का अर्थ किसी वस्तु या व्यक्ति से प्रेम करना नहीं है। प्रेम स्वतंत्रता देता है, जबकि आसक्ति बन्धन उत्पन्न करती है।

जब मनुष्य यह मान लेता है कि—

  • यह शरीर सदैव रहेगा।
  • यह धन सदा मेरा रहेगा।
  • यह सम्बन्ध कभी नहीं टूटेंगे।
  • यह पद और प्रतिष्ठा स्थायी हैं।

तब वह परिवर्तनशील वस्तुओं में स्थायित्व खोजने लगता है।

यहीं से माया अपना प्रभाव दिखाती है।

समस्या संसार का परिवर्तन नहीं है; समस्या यह है कि हम परिवर्तनशील को अपरिवर्तनशील मान लेते हैं।

मोह : वास्तविकता को न देख पाना

भारतीय ग्रन्थों में मोह का अर्थ केवल भावनात्मक लगाव नहीं है।

मोह का वास्तविक अर्थ है—वस्तु को उसके यथार्थ स्वरूप में न देख पाना।

जब मनुष्य किसी व्यक्ति, वस्तु, विचार या विश्वास के प्रति इतना आसक्त हो जाता है कि उसकी सीमाएँ दिखाई देना बन्द हो जाती हैं, तब मोह उत्पन्न होता है।

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—

"ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥"

(भगवद्गीता २.६२)

अर्थात् विषयों का निरन्तर चिन्तन आसक्ति उत्पन्न करता है, आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है, और कामना में बाधा आने पर क्रोध उत्पन्न होता है।

अगले श्लोक में कहा गया है—

"क्रोधाद्भवति सम्मोहः..."

अर्थात् क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, और मोह से स्मृति का भ्रम।

यह क्रम बताता है कि माया केवल दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि मनुष्य की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया भी है।

भय : माया की स्वाभाविक परिणति

जहाँ आसक्ति होगी, वहाँ भय भी होगा।

जिसे धन से अत्यधिक लगाव है, उसे धन खोने का भय रहेगा।

जिसे प्रतिष्ठा से अत्यधिक मोह है, वह अपमान से डरेगा।

जिसकी पहचान केवल शरीर तक सीमित है, उसके लिए मृत्यु सबसे बड़ा भय होगी।

बृहदारण्यक उपनिषद् कहता है—

"द्वितीयाद्वै भयं भवति।"
(बृहदारण्यक उपनिषद् १.४.२)

अर्थ—जहाँ द्वैत का अनुभव होता है, वहीं से भय उत्पन्न होता है।

यहाँ "द्वैत" का अर्थ केवल दो वस्तुओं का होना नहीं, बल्कि स्वयं को सम्पूर्ण अस्तित्व से पृथक् मान लेना है।

जब मनुष्य स्वयं को सीमित सत्ता समझता है, तब उसे हर ओर खतरा दिखाई देता है।

दुःख : वस्तुओं में नहीं, दृष्टि में

बौद्ध दर्शन कहता है कि संसार दुःखमय है।

वेदान्त कहता है कि दुःख का कारण अविद्या है।

योग कहता है कि क्लेश दुःख का कारण हैं।

सांख्य कहता है कि अविवेक दुःख का मूल है।

इन सभी मतों में एक साझा तत्व है—

दुःख वस्तुओं में नहीं, बल्कि उनके प्रति हमारी दृष्टि में है।

एक ही घटना किसी व्यक्ति को तोड़ देती है और वही घटना दूसरे व्यक्ति को परिपक्व बना देती है।

घटना समान है, अनुभव भिन्न है।

यही तथ्य बताता है कि दुःख केवल बाह्य परिस्थितियों का परिणाम नहीं है।

माया और सुख की खोज

मनुष्य का अधिकांश जीवन सुख की खोज में बीतता है।

किन्तु वह सुख प्रायः बाहरी वस्तुओं में खोजता है—

धन में।

पद में।

यश में।

सत्ता में।

इन्द्रिय-सुख में।

जब तक ये उपलब्ध रहते हैं, सुख का अनुभव होता है।

जैसे ही ये बदलते हैं, सुख भी समाप्त हो जाता है।

उपनिषदों का प्रश्न यही है—

यदि सुख किसी वस्तु पर निर्भर है, तो वह स्थायी कैसे होगा?

इसलिए भारतीय दर्शन स्थायी आनन्द का स्रोत बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मबोध में खोजता है।

क्या संसार छोड़ना आवश्यक है?

यहाँ एक सामान्य भ्रम उत्पन्न होता है कि यदि माया दुःख का कारण है, तो संसार का त्याग ही समाधान होगा।

भारतीय दर्शन का उत्तर इतना सरल नहीं है।

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्धभूमि से भागने के लिए नहीं कहते।

उपनिषद संसार का विनाश नहीं चाहते।

बुद्ध मध्यम मार्ग की शिक्षा देते हैं।

जैन दर्शन संयम का मार्ग बताता है।

अर्थात् समस्या संसार में नहीं, बल्कि संसार के प्रति अचेतन आसक्ति में है।

माया का अन्त वस्तुओं के नष्ट होने से नहीं, बल्कि दृष्टि के बदलने से होता है।

जीवन और माया का समन्वित निष्कर्ष

माया मनुष्य को संसार से नहीं बाँधती।

मनुष्य स्वयं अपनी आसक्तियों, इच्छाओं, भय और अहंकार के माध्यम से बन्धन निर्मित करता है।

संसार वही रहता है, किन्तु दृष्टि बदलते ही उसका अर्थ बदल जाता है।

जिस व्यक्ति के लिए संसार केवल उपभोग का साधन है, वह माया में गहराई तक उलझता जाता है।

जिसके लिए संसार सीखने, सेवा, साधना और आत्मबोध का अवसर है, उसके लिए यही संसार मुक्ति का मार्ग बन जाता है।

यही कारण है कि भारतीय दर्शन में माया शत्रु नहीं है; वह एक परीक्षा भी है, एक आवरण भी, और सही दृष्टि मिलने पर ज्ञान का द्वार भी।

अब सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न शेष है—

यदि माया बन्धन का कारण है, तो उससे मुक्ति कैसे सम्भव है? क्या केवल ज्ञान पर्याप्त है? या भक्ति, कर्म, योग, ध्यान, करुणा और आत्मानुशासन भी आवश्यक हैं?

इन्हीं प्रश्नों का समन्वित उत्तर अगले भाग में "माया से मुक्ति कैसे सम्भव है?" के अन्तर्गत प्रस्तुत किया जाएगा।


मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
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