चिंतन — अध्याय–24 : माया क्या है? — भाग–12 : माया से मुक्ति कैसे सम्भव है? — ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, राजयोग तथा बौद्ध और जैन मार्ग
चिंतन — अध्याय–24 : माया क्या है? — भाग–12 : माया से मुक्ति कैसे सम्भव है? — ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, राजयोग तथा बौद्ध और जैन मार्ग
यदि माया मनुष्य को सीमित अनुभव, आसक्ति, भय और अज्ञान में बाँधती है, तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है—क्या माया से पूर्णतः मुक्त हुआ जा सकता है?
भारतीय दर्शन का उत्तर है—हाँ, किन्तु यह मुक्ति किसी चमत्कार, बाहरी अनुष्ठान या केवल बौद्धिक जानकारी से प्राप्त नहीं होती। यह मनुष्य की दृष्टि, चेतना और जीवन-पद्धति में होने वाला गहन परिवर्तन है।
विभिन्न भारतीय परम्पराओं ने इस मुक्ति के लिए भिन्न-भिन्न मार्ग बताए हैं, किन्तु उनका लक्ष्य एक ही है—अज्ञान से ज्ञान, बन्धन से स्वतंत्रता और सीमित पहचान से वास्तविक स्वरूप की ओर यात्रा।
ज्ञानयोग : विवेक द्वारा माया का अतिक्रमण
अद्वैत वेदान्त के अनुसार माया से मुक्ति का सर्वोच्च साधन ज्ञान है।
यह ज्ञान पुस्तकीय सूचना नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप का प्रत्यक्ष अनुभव है।
उपनिषदों का महावाक्य—"तत्त्वमसि।"(छान्दोग्य उपनिषद् ६.८.७)अर्थात् "तुम वही हो।"
यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि सम्पूर्ण वेदान्त का सार है।
जब साधक यह अनुभव करता है कि उसका वास्तविक स्वरूप शरीर, मन और अहंकार से परे शुद्ध चेतना है, तब माया का प्रभाव समाप्त होने लगता है।
ज्ञानयोग का आधार है—
- विवेक (नित्य और अनित्य का भेद)
- वैराग्य
- शम, दम, उपरति आदि साधन
- आत्मचिन्तन
- श्रवण, मनन और निदिध्यासन
ज्ञान का अर्थ संसार का त्याग नहीं, बल्कि संसार को उसके यथार्थ स्वरूप में देखना है।
भक्तियोग : समर्पण द्वारा माया का अतिक्रमण
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—
"दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥"
(भगवद्गीता ७.१४)
अर्थात् मेरी इस दैवी माया को पार करना कठिन है, किन्तु जो मेरी शरण में आते हैं, वे इसे पार कर जाते हैं।
भक्ति का सार केवल पूजा-पद्धति नहीं है।
भक्ति का वास्तविक अर्थ है—
- अहंकार का विसर्जन।
- ईश्वर पर विश्वास।
- समर्पण।
- प्रेम।
- करुणा।
- कृतज्ञता।
जहाँ "मैं" कम होता है, वहाँ माया का प्रभाव भी कम होने लगता है।
कर्मयोग : निष्काम कर्म का मार्ग
कर्म स्वयं बन्धन नहीं है।
बन्धन का कारण है—फल की आसक्ति।
भगवद्गीता का प्रसिद्ध उपदेश है—
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।"
(भगवद्गीता २.४७)
अर्थात् तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल पर नहीं।
निष्काम कर्म का अर्थ कर्म छोड़ देना नहीं, बल्कि कर्म करते हुए भी उसके फल से अपनी पहचान को न जोड़ना है।
जब कर्म सेवा बन जाता है, तब वही कर्म माया का कारण न होकर मुक्ति का साधन बन जाता है।
राजयोग : चित्त का शुद्धीकरण
पतञ्जलि योगसूत्र के अनुसार मन की चंचलता ही अज्ञान का आधार है।
ध्यान, प्राणायाम, धारणा और समाधि के माध्यम से चित्त की वृत्तियाँ शांत होती हैं।
जब मन स्थिर होता है, तब वस्तुओं का वास्तविक स्वरूप अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।
इसलिए राजयोग माया को तर्क से नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष ध्यानानुभव से पार करने का मार्ग प्रस्तुत करता है।
बौद्ध मार्ग : जागरूकता और प्रज्ञा
बौद्ध दर्शन माया शब्द का अधिक प्रयोग नहीं करता, किन्तु उसका सम्पूर्ण साधनामार्ग अज्ञान से मुक्ति की दिशा में है।
आर्य अष्टाङ्गिक मार्ग—
- सम्यक दृष्टि
- सम्यक संकल्प
- सम्यक वाक्
- सम्यक कर्म
- सम्यक आजीविका
- सम्यक प्रयास
- सम्यक स्मृति
- सम्यक समाधि
—मनुष्य को ऐसी जागरूकता प्रदान करता है जिसमें वह वस्तुओं को अनित्य और परस्पर आश्रित रूप में देखना सीखता है।
यही प्रज्ञा दुःख और अज्ञान का अन्त करती है।
जैन मार्ग : संयम और आत्मशुद्धि
जैन दर्शन के अनुसार कर्मों का बन्धन ही आत्मा को सीमित करता है।
इसलिए मुक्ति का मार्ग है—
- सम्यक दर्शन
- सम्यक ज्ञान
- सम्यक चरित्र
तप, अहिंसा, अपरिग्रह, सत्य और संयम के माध्यम से आत्मा कर्म-बन्धनों से मुक्त होती है।
यह मार्ग बाहरी जगत से अधिक आन्तरिक अनुशासन पर बल देता है।
क्या केवल एक ही मार्ग सही है?
भारतीय दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह सभी साधकों के लिए एक ही मार्ग अनिवार्य नहीं बनाता।
जिस व्यक्ति की प्रवृत्ति चिन्तन की है, उसके लिए ज्ञानयोग उपयुक्त हो सकता है।
जिसका हृदय प्रेम से परिपूर्ण है, उसके लिए भक्तियोग सहज है।
जो कर्मशील है, उसके लिए कर्मयोग।
जो ध्यानप्रिय है, उसके लिए राजयोग।
इसी प्रकार बौद्ध, जैन और अन्य परम्पराएँ भी अपने-अपने स्वभावानुकूल साधनामार्ग प्रदान करती हैं।
मार्ग भिन्न हो सकते हैं, किन्तु लक्ष्य एक ही है—माया के आवरण से परे सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव।
माया से मुक्ति का वास्तविक अर्थ
माया से मुक्ति का अर्थ संसार का विनाश नहीं है।
माया से मुक्ति का अर्थ है—
- परिवर्तनशील में अपरिवर्तनशील को देखना।
- अहंकार में आत्मा को पहचानना।
- आसक्ति में स्वतंत्रता का अनुभव करना।
- विविधता में एकत्व का बोध करना।
जब यह दृष्टि विकसित होती है, तब मनुष्य संसार में रहते हुए भी उससे बँधता नहीं।
यही भारतीय दर्शन में जीवन्मुक्ति की अवस्था है।
किन्तु यहाँ एक अत्यन्त रोचक प्रश्न शेष है।
यदि माया केवल बन्धन है, तो फिर ईश्वर ने उसकी रचना ही क्यों की? यदि माया न होती, तो क्या अनुभव, सृष्टि, प्रेम, कला, करुणा और आध्यात्मिक विकास सम्भव होते?
क्या माया केवल समस्या है, या उसका कोई सकारात्मक और सृजनात्मक पक्ष भी है?
इन्हीं गहन प्रश्नों का विवेचन अगले भाग में "क्या माया आवश्यक है?" के अन्तर्गत किया जाएगा।
मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)
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