चिंतन — अध्याय–24 : माया क्या है? — भाग–13 : क्या माया आवश्यक है? — लीला, अनुभव और सृष्टि में माया की भूमिका

 चिंतन — अध्याय–24 : माया क्या है? — भाग–13 : क्या माया आवश्यक है? — लीला, अनुभव और सृष्टि में माया की भूमिका

अब तक हमने माया को अज्ञान, आवरण, बन्धन और दुःख के सन्दर्भ में समझा। स्वाभाविक रूप से ऐसा प्रतीत हो सकता है कि माया केवल एक नकारात्मक शक्ति है, जिससे जितनी शीघ्र मुक्ति मिल जाए उतना अच्छा। किन्तु भारतीय दर्शन का गहन अध्ययन एक आश्चर्यजनक तथ्य सामने लाता है—माया केवल बन्धन नहीं है; वही अनुभव का आधार भी है।

यदि माया न होती, तो क्या यह सृष्टि होती? क्या जीव, प्रकृति, सम्बन्ध, प्रेम, कला, संगीत, करुणा, साधना और आत्मबोध की यात्रा सम्भव होती? यही प्रश्न इस भाग का केन्द्र है।

यदि माया न होती तो क्या होता?

कल्पना कीजिए कि केवल एक ही अखण्ड, निराकार, निर्विशेष चेतना होती और उसमें किसी प्रकार का नाम, रूप, भेद, समय, स्थान या परिवर्तन न होता।

ऐसी अवस्था में—

  • न देखने वाला होता।
  • न देखने योग्य कुछ होता।
  • न जानने वाला होता।
  • न ज्ञेय होता।
  • न अनुभव होता।
  • न इतिहास होता।
  • न विकास होता।

अर्थात् अनुभव की सम्पूर्ण सम्भावना ही समाप्त हो जाती।

यही कारण है कि अनेक भारतीय परम्पराएँ माया को केवल अज्ञान नहीं, बल्कि अनुभव की अनिवार्य शर्त भी मानती हैं।

लीला का सिद्धान्त

विशेषतः विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत और कश्मीर शैव दर्शन में सृष्टि को ईश्वर की लीला कहा गया है।

लीला का अर्थ है—स्वाभाविक, आनन्दपूर्ण और स्वतन्त्र अभिव्यक्ति।

ईश्वर किसी अभाव को पूरा करने के लिए सृष्टि नहीं करता, क्योंकि उसमें कोई अभाव नहीं है।

सृष्टि उसकी पूर्णता की अभिव्यक्ति है।

इस दृष्टि से माया वह शक्ति है जिसके माध्यम से एक निराकार सत्य अनन्त नामों और रूपों में प्रकट होता है।

जैसे एक कलाकार अपनी कल्पना को चित्र में व्यक्त करता है, वैसे ही परम चेतना माया के माध्यम से सृष्टि को व्यक्त करती है।

विविधता का रहस्य

यदि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में केवल एक ही रूप होता, तो अनुभव का कोई अर्थ नहीं रहता।

रंगों की विविधता ही चित्रकला को सम्भव बनाती है।

स्वरों की विविधता ही संगीत को जन्म देती है।

भावों की विविधता ही साहित्य को जन्म देती है।

इसी प्रकार चेतना की विविध अभिव्यक्तियाँ ही जीवन को सम्भव बनाती हैं।

माया इस विविधता का माध्यम है।

इसलिए विविधता स्वयं समस्या नहीं है।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम विविधता को ही अंतिम सत्य मान लेते हैं।

माया : आवरण भी, अवसर भी

भारतीय दर्शन का यह अत्यन्त सूक्ष्म निष्कर्ष है कि माया का द्वैत स्वरूप है।

एक ओर वही अज्ञान का कारण बनती है।

दूसरी ओर वही ज्ञान का अवसर भी प्रदान करती है।

यदि अन्धकार न हो, तो प्रकाश का मूल्य कैसे ज्ञात होगा?

यदि प्रश्न न हों, तो उत्तरों का अर्थ क्या होगा?

यदि सीमाएँ न हों, तो स्वतंत्रता का अनुभव कैसे होगा?

इसी प्रकार यदि माया न हो, तो आत्मबोध की यात्रा भी सम्भव नहीं होगी।

इस दृष्टि से माया केवल आवरण नहीं; वह आत्मबोध की प्रयोगशाला भी है।

अनुभव और विकास

मनुष्य जन्म से पूर्ण ज्ञानी नहीं होता।

वह सीखता है।

भूल करता है।

संघर्ष करता है।

सफल होता है।

असफल होता है।

प्रेम करता है।

वियोग सहता है।

इन सभी अनुभवों के माध्यम से उसका व्यक्तित्व विकसित होता है।

यदि जीवन में कोई चुनौती ही न हो, तो विकास का प्रश्न भी समाप्त हो जाएगा।

इसलिए अनेक दार्शनिक परम्पराएँ संसार को केवल बन्धन नहीं, बल्कि चेतना के विकास का क्षेत्र मानती हैं।

माया और स्वतंत्र इच्छा

एक और महत्त्वपूर्ण प्रश्न है—यदि सब कुछ माया है, तो क्या मनुष्य के पास स्वतंत्र इच्छा (Free Will) है?

भारतीय दर्शन इस प्रश्न का एकरूप उत्तर नहीं देता।

कुछ परम्पराएँ मानती हैं कि सीमित स्तर पर मनुष्य को चुनाव की स्वतंत्रता है।

कुछ इसे कर्म के अधीन मानती हैं।

कुछ इसे ईश्वर की लीला का भाग कहती हैं।

किन्तु अधिकांश परम्पराएँ इस बात पर सहमत हैं कि मनुष्य अपनी दृष्टि बदल सकता है।

यही परिवर्तन माया से मुक्ति की दिशा में पहला कदम है।

माया का सकारात्मक पक्ष

जब माया को केवल अज्ञान के रूप में देखा जाता है, तब उसका आधा स्वरूप ही समझ में आता है।

किन्तु जब उसे—

  • सृजन की शक्ति,
  • अनुभव का माध्यम,
  • विविधता का आधार,
  • चेतना के विकास का क्षेत्र,
  • और आत्मबोध की यात्रा का प्रारम्भ

—इन सभी रूपों में देखा जाता है, तब माया का वास्तविक दार्शनिक महत्त्व स्पष्ट होता है।

माया विरोधी नहीं है।

वह एक परीक्षा भी है, एक विद्यालय भी और एक सेतु भी।

जो उसमें उलझ जाता है, उसके लिए वही बन्धन है।

जो उसे समझ लेता है, उसके लिए वही मुक्ति का मार्ग बन जाती है।

समन्वित निष्कर्ष

भारतीय दर्शन हमें माया से घृणा करना नहीं सिखाता।

वह हमें माया को पहचानना सिखाता है।

माया से भागना समाधान नहीं है।

माया के भीतर रहते हुए उसके वास्तविक स्वरूप का बोध करना ही साधना है।

यही कारण है कि ज्ञानी व्यक्ति संसार का त्याग नहीं करता; वह संसार के प्रति अपनी दृष्टि बदल देता है।

अब इस अध्याय का अंतिम दार्शनिक विस्तार शेष है। यह विचार केवल भारतीय दर्शन तक सीमित नहीं है। प्लेटो, कान्त, शोपेनहावर, अस्तित्ववादी दार्शनिकों तथा आधुनिक Simulation Hypothesis जैसे सिद्धान्तों में भी वास्तविकता और अनुभूति के सम्बन्ध पर गम्भीर चिन्तन मिलता है।

अगले भाग में हम वैश्विक दर्शन में माया के समान विचारों का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे और उसके बाद अंतिम भाग में सम्पूर्ण अध्याय का समन्वित निष्कर्ष प्रस्तुत करेंगे।


मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)

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