चिंतन — अध्याय–24 : माया क्या है? — भाग–15 : समन्वित निष्कर्ष — माया, ब्रह्म और मनुष्य की वास्तविक यात्रा

 चिंतन — अध्याय–24 : माया क्या है? — भाग–15 : समन्वित निष्कर्ष — माया, ब्रह्म और मनुष्य की वास्तविक यात्रा

इस अध्याय के प्रारम्भ में हमने एक सरल किन्तु अत्यन्त गहन प्रश्न पूछा था—"माया क्या है?" पहली दृष्टि में यह प्रश्न केवल वेदान्त का प्रतीत होता है, किन्तु सम्पूर्ण अध्ययन के बाद स्पष्ट हो जाता है कि यह प्रश्न वास्तव में मनुष्य, चेतना, अनुभव और वास्तविकता के सम्बन्ध का प्रश्न है।

माया को केवल "भ्रम" कह देना उसकी दार्शनिक गहराई को अत्यन्त सीमित कर देना होगा। भारतीय दर्शन की विभिन्न परम्पराएँ माया को अलग-अलग रूपों में देखती हैं, परन्तु सभी इस बात की ओर संकेत करती हैं कि मनुष्य जिस संसार का अनुभव करता है, वह अंतिम सत्य का सम्पूर्ण रूप नहीं है।

विभिन्न दर्शनों का समन्वित दृष्टिकोण

वेद और उपनिषद माया को ईश्वर की अद्भुत शक्ति तथा नाम-रूप की अभिव्यक्ति के रूप में संकेत करते हैं।

अद्वैत वेदान्त कहता है कि माया अनिर्वचनीय है। वही ब्रह्म पर नाम और रूप का अध्यास उत्पन्न करती है। ज्ञान होने पर उसका आवरण समाप्त हो जाता है।

विशिष्टाद्वैत माया को ईश्वर की वास्तविक शक्ति मानता है। जगत मिथ्या नहीं, बल्कि ईश्वर का शरीर है।

द्वैत वेदान्त जगत और ईश्वर दोनों की स्वतंत्र वास्तविकता स्वीकार करता है। यहाँ माया भ्रम नहीं, बल्कि ईश्वर की सृष्टि है।

सांख्य प्रकृति को वास्तविक मानता है, जबकि योग चित्तवृत्तियों के निरोध के माध्यम से वास्तविकता के प्रत्यक्ष अनुभव की बात करता है।

बौद्ध दर्शन अनित्य, अनात्म और प्रतीत्यसमुत्पाद के माध्यम से बताता है कि वस्तुओं की कोई स्वतंत्र शाश्वत सत्ता नहीं है।

जैन दर्शन अनेकान्तवाद के माध्यम से सिखाता है कि सत्य बहुआयामी है और किसी एक दृष्टि से उसे पूर्णतः नहीं समझा जा सकता।

कश्मीर शैव दर्शन माया को शिव की सृजनात्मक शक्ति मानता है, जिसके द्वारा एक चेतना अनेक रूपों में स्वयं को व्यक्त करती है।

विज्ञान और माया का संवाद

आधुनिक विज्ञान ने माया को सिद्ध नहीं किया है, किन्तु उसने यह अवश्य दिखाया है कि—

  • हमारी इन्द्रियाँ सीमित हैं।
  • मस्तिष्क अनुभव का निर्माण करता है।
  • पदार्थ हमारी सामान्य कल्पना से अधिक सूक्ष्म है।
  • समय और स्थान निरपेक्ष नहीं हैं।
  • प्रत्यक्ष अनुभव अंतिम वास्तविकता का सम्पूर्ण चित्र नहीं है।

इस प्रकार विज्ञान और दर्शन अलग-अलग मार्गों से चलकर एक समान प्रश्न के निकट पहुँचते हैं—"वास्तविकता वास्तव में क्या है?"

माया का मनोवैज्ञानिक स्वरूप

माया केवल बाहरी जगत नहीं है।

वह हमारे भीतर भी कार्य करती है—

  • जब हम शरीर को ही अपना सम्पूर्ण अस्तित्व मान लेते हैं।
  • जब अहंकार हमारी पहचान बन जाता है।
  • जब स्मृतियाँ वर्तमान पर अधिकार कर लेती हैं।
  • जब इच्छाएँ जीवन का केन्द्र बन जाती हैं।
  • जब आसक्ति, मोह और भय हमारी स्वतंत्रता को छीन लेते हैं।

इस प्रकार माया बाहरी दृश्य से अधिक भीतरी दृष्टि की समस्या है।

क्या माया शत्रु है?

इस अध्याय का सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि माया शत्रु नहीं है।

यदि माया न होती—

  • तो अनुभव न होता।
  • सम्बन्ध न होते।
  • प्रेम न होता।
  • करुणा न होती।
  • साधना न होती।
  • आत्मबोध की यात्रा भी सम्भव न होती।

माया वह क्षेत्र है जहाँ मनुष्य अज्ञान से ज्ञान, सीमितता से अनन्तता और अहंकार से आत्मबोध की ओर यात्रा करता है।

जो माया को अंतिम सत्य मान लेता है, वह बन्धन में पड़ जाता है।

जो माया के पार स्थित सत्य को पहचान लेता है, उसके लिए वही माया ज्ञान का सेतु बन जाती है।

माया से मुक्ति का वास्तविक अर्थ

माया से मुक्ति का अर्थ संसार का त्याग नहीं है।

मुक्ति का अर्थ है—

  • परिवर्तनशील में अपरिवर्तनशील का दर्शन।
  • अनेकता में एकत्व का अनुभव।
  • कर्म में निष्कामता।
  • सम्बन्धों में प्रेम, किन्तु आसक्ति नहीं।
  • जीवन में सहभागिता, किन्तु अहंकार नहीं।
  • संसार में रहकर भी उसके बन्धन से मुक्त रहना।

यही अवस्था उपनिषदों की आत्मविद्या, गीता के स्थितप्रज्ञ, योग के कैवल्य, बौद्ध दर्शन के निर्वाण, जैन दर्शन के कैवल्यज्ञान और वेदान्त की जीवन्मुक्ति का मूल भाव है।

अन्तिम दार्शनिक निष्कर्ष

तो क्या माया अज्ञान है?

हाँ, जब वह सत्य को ढक देती है।

क्या माया शक्ति है?

हाँ, जब वह ईश्वर की सृजनात्मक अभिव्यक्ति बनती है।

क्या माया अनुभव है?

हाँ, क्योंकि सम्पूर्ण जीवन उसी के माध्यम से प्रकट होता है।

क्या माया प्रकृति है?

अनेक दर्शनों में हाँ, क्योंकि वही नाम-रूपों का जगत है।

क्या माया परम सत्य है?

नहीं। अधिकांश भारतीय परम्पराओं के अनुसार माया परम सत्य नहीं, बल्कि परम सत्य की अभिव्यक्ति, आवरण या अनुभव का माध्यम है।

अतः माया का उद्देश्य मनुष्य को सदा भ्रमित रखना नहीं, बल्कि उसे उस प्रश्न तक पहुँचाना है जो सम्पूर्ण अध्यात्म का मूल है—

"मैं वास्तव में कौन हूँ?"

जिस दिन इस प्रश्न का उत्तर प्रत्यक्ष अनुभव बन जाता है, उसी दिन माया अपना कार्य पूर्ण कर देती है।

वह समाप्त नहीं होती; उसका रहस्य उद्घाटित हो जाता है।

और तब मनुष्य जानता है कि—

जिस सत्य को वह बाहर खोज रहा था, वह उसके अपने ही अस्तित्व की सबसे गहन परत में सदैव उपस्थित था।


समापन

इस प्रकार "माया क्या है?" केवल एक दार्शनिक अवधारणा नहीं, बल्कि मानव जीवन, चेतना, अनुभव और आत्मबोध की सम्पूर्ण यात्रा का केन्द्रीय सूत्र है। माया को समझना संसार का निषेध करना नहीं, बल्कि संसार को उसके उचित स्थान पर रखना है। जब यह दृष्टि विकसित होती है, तब न संसार से भागने की आवश्यकता रहती है और न उसमें डूब जाने की; तब जीवन स्वयं साधना बन जाता है, और साधना आत्मबोध का द्वार।


मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)

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