चिंतन — अध्याय–24 : सूक्ष्म और स्थूल जगत — भाग–7 : बौद्ध और जैन दर्शन की दृष्टि

 चिंतन — अध्याय–24 : सूक्ष्म और स्थूल जगत — भाग–7 : बौद्ध और जैन दर्शन की दृष्टि

भारतीय दर्शन की परम्परा में बौद्ध और जैन दर्शन ने सूक्ष्म और स्थूल जगत के प्रश्न को एक विशिष्ट दृष्टि से देखा। इन दोनों दर्शनों ने वैदिक और उपनिषदिक परम्पराओं से संवाद भी किया और अनेक बिन्दुओं पर उनसे मतभेद भी व्यक्त किए। फिर भी दोनों का लक्ष्य था—वास्तविकता की प्रकृति को समझना और मनुष्य के अनुभव का गहन विश्लेषण करना।

विशेष बात यह है कि न बौद्ध दर्शन और न ही जैन दर्शन "सूक्ष्म" और "स्थूल" को केवल आकार या दृश्य-अदृश्य के आधार पर परिभाषित करते हैं। उनके लिए यह प्रश्न अस्तित्व, परिवर्तन, द्रव्य, चेतना और अनुभव की प्रकृति से जुड़ा है।


बौद्ध दर्शन : क्षणिकता का संसार

बौद्ध दर्शन का एक प्रमुख सिद्धान्त है—क्षणिकवाद (क्षणभंगुरता)

इसके अनुसार संसार में कोई भी संयोजित वस्तु स्थायी नहीं है। प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक विचार और प्रत्येक अनुभव निरन्तर उत्पन्न होकर नष्ट होता रहता है।

इस दृष्टि से स्थूल जगत भी क्षण-क्षण बदल रहा है और सूक्ष्म मानसिक अवस्थाएँ भी।

इसलिए बौद्ध दर्शन स्थूल और सूक्ष्म के बीच किसी शाश्वत संरचना की अपेक्षा परिवर्तनशील प्रक्रिया पर अधिक बल देता है।


प्रतीत्यसमुत्पाद : परस्पर निर्भरता का सिद्धान्त

बौद्ध दर्शन का सबसे महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है—

प्रतीत्यसमुत्पाद (Dependent Origination)

अर्थात्—

"इदं अस्ति तस्मात् इदं भवति।"
यह है, इसलिए वह है।

इसका तात्पर्य है कि कोई भी वस्तु पूर्णतः स्वतंत्र नहीं है। प्रत्येक घटना अनेक कारणों और परिस्थितियों पर निर्भर होकर उत्पन्न होती है।

यह सिद्धान्त सूक्ष्म और स्थूल दोनों पर समान रूप से लागू होता है।

आज प्रणाली-विज्ञान (Systems Theory) और पारिस्थितिकी (Ecology) भी परस्पर निर्भरता के महत्व पर बल देते हैं, किन्तु प्रतीत्यसमुत्पाद और आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्तों को समान नहीं माना जाना चाहिए। दोनों की पद्धति और उद्देश्य भिन्न हैं।


पंचस्कन्ध : व्यक्ति का विश्लेषण

बौद्ध दर्शन व्यक्ति को पाँच स्कन्धों में विभाजित करता है—रूप,वेदना, संज्ञा,संस्कार, विज्ञान

यहाँ रूप स्थूल पक्ष का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान अनुभव के सूक्ष्म आयामों को व्यक्त करते हैं।

इस विश्लेषण का उद्देश्य यह दिखाना है कि जिसे हम "मैं" कहते हैं, वह अनेक घटकों का प्रवाह है, कोई स्थिर इकाई नहीं।


जैन दर्शन : जीव और द्रव्य

जैन दर्शन वास्तविकता को अनेक द्रव्यों में विभाजित करता है।

इनमें प्रमुख हैं—जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल

यहाँ जीव चेतन द्रव्य है और पुद्गल भौतिक द्रव्य।

जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीव स्वतंत्र है, किन्तु कर्म के कारण वह संसार में बन्धन का अनुभव करता है।

सूक्ष्म और स्थूल का सम्बन्ध यहाँ चेतन और भौतिक द्रव्य के परस्पर सम्बन्ध के रूप में समझा जाता है।


सूक्ष्म जीव की अवधारणा

जैन आगमों में अत्यन्त सूक्ष्म जीवों का भी उल्लेख मिलता है।

जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी और वनस्पति में भी जीवन की सम्भावना स्वीकार की गई है।

यद्यपि यह अवधारणा आधुनिक सूक्ष्मजीवविज्ञान (Microbiology) से भिन्न है, फिर भी यह उल्लेखनीय है कि जैन परम्परा ने जीवन के सूक्ष्म रूपों की सम्भावना पर बहुत प्राचीन काल में विचार किया।


अनेकान्तवाद : सत्य के अनेक आयाम

जैन दर्शन का सबसे मौलिक योगदान है—

अनेकान्तवाद।

इसके अनुसार किसी भी वस्तु या सत्य को केवल एक दृष्टि से नहीं समझा जा सकता।

प्रत्येक वस्तु के अनेक पक्ष होते हैं।

सूक्ष्म और स्थूल जगत का प्रश्न भी इसी सिद्धान्त के अन्तर्गत देखा जा सकता है। जो एक दृष्टि से सत्य प्रतीत होता है, वह दूसरी दृष्टि से अपूर्ण हो सकता है।

यह दृष्टिकोण आधुनिक बहुविषयी (Interdisciplinary) अध्ययन की भावना से कुछ हद तक साम्य रखता है, यद्यपि दोनों का ऐतिहासिक और दार्शनिक आधार अलग है।


बौद्ध और जैन दृष्टियों की तुलना

यदि दोनों परम्पराओं को साथ रखा जाए, तो कुछ रोचक भिन्नताएँ सामने आती हैं—

  • बौद्ध दर्शन परिवर्तन और क्षणिकता पर बल देता है।
  • जैन दर्शन द्रव्य की निरन्तरता और उसके परिवर्तित पर्यायों की चर्चा करता है।
  • बौद्ध दर्शन अनात्मवाद की ओर झुकता है।
  • जैन दर्शन स्वतंत्र जीव की सत्ता स्वीकार करता है।
  • दोनों ही बाह्य और आन्तरिक जगत का गम्भीर विश्लेषण करते हैं।
  • दोनों ही अनुभव, तर्क और अनुशासन को महत्त्व देते हैं।

इस प्रकार सूक्ष्म और स्थूल जगत का प्रश्न भारतीय बौद्धिक परम्परा में केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि गहन दार्शनिक विमर्श का विषय भी रहा है।


मुख्य विवाद:

क्या वास्तविकता का मूल स्वरूप परिवर्तनशील प्रक्रियाओं का प्रवाह है, जैसा बौद्ध दर्शन कहता है, या स्वतंत्र द्रव्यों का अस्तित्व है, जैसा जैन दर्शन प्रतिपादित करता है?

आज की शोध-स्थिति:

तुलनात्मक दर्शन, संज्ञान-विज्ञान और चेतना-अध्ययन में बौद्ध तथा जैन दर्शन के सिद्धान्तों पर व्यापक शोध हो रहा है। विशेष रूप से प्रतीत्यसमुत्पाद, अनेकान्तवाद और अनुभव-विश्लेषण को आधुनिक दार्शनिक चर्चाओं में महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। किन्तु इन सिद्धान्तों को आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्तों का प्रत्यक्ष विकल्प नहीं माना जाता।

अब भी अनुत्तरित प्रश्न:

क्या भविष्य में दर्शन और विज्ञान मिलकर ऐसी भाषा विकसित कर पाएँगे जो परिवर्तन, चेतना, पदार्थ और जीवन के सूक्ष्म तथा स्थूल आयामों को एक साथ समझा सके, या ये प्रश्न सदैव अनेक दृष्टियों से ही देखे जाएँगे?

— मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)

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