चिंतन — अध्याय–24 : माया क्या है? — भाग–9 : आधुनिक विज्ञान और माया — क्वांटम भौतिकी, सापेक्षता, तंत्रिका-विज्ञान और अनुभूत वास्तविकता
चिंतन — अध्याय–24 : माया क्या है? — भाग–9 : आधुनिक विज्ञान और माया — क्वांटम भौतिकी, सापेक्षता, तंत्रिका-विज्ञान और अनुभूत वास्तविकता
"माया" शब्द भारतीय दर्शन की देन है, जबकि आधुनिक विज्ञान अनुभवजन्य प्रमाण, गणितीय मॉडल और प्रयोगों पर आधारित है। दोनों की कार्य-पद्धति भिन्न है, इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि आधुनिक विज्ञान ने माया के सिद्धान्त को सिद्ध कर दिया है। फिर भी बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दी के अनेक वैज्ञानिक अनुसंधानों ने यह अवश्य स्पष्ट किया है कि मनुष्य जिस वास्तविकता का अनुभव करता है, वह वस्तुओं की सम्पूर्ण और अंतिम वास्तविकता नहीं होती।
यहीं विज्ञान और दर्शन के बीच एक रोचक संवाद प्रारम्भ होता है।
क्या विज्ञान भी प्रत्यक्ष अनुभव पर प्रश्न उठाता है?
प्राचीन काल में मनुष्य को पृथ्वी स्थिर और सूर्य गतिशील दिखाई देता था। प्रत्यक्ष अनुभव यही कहता था, परन्तु कोपरनिकस, गैलीलियो और केप्लर के अनुसंधानों ने सिद्ध किया कि हमारी इन्द्रियाँ सदैव अंतिम सत्य का बोध नहीं करातीं।
यह विज्ञान का पहला बड़ा संकेत था कि दिखाई देने वाली वास्तविकता और वस्तुगत वास्तविकता में अन्तर हो सकता है।
यही प्रश्न भारतीय दर्शन ने माया के माध्यम से बहुत पहले उठाया था।
क्वांटम भौतिकी : पदार्थ वास्तव में क्या है?
बीसवीं शताब्दी में क्वांटम यांत्रिकी ने पदार्थ की पारम्परिक धारणा को चुनौती दी।
परमाणु, जिसे कभी पदार्थ की ठोस इकाई माना जाता था, स्वयं इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और अन्य सूक्ष्म कणों से बना है। आगे चलकर ज्ञात हुआ कि ये कण भी केवल छोटे ठोस गोले नहीं हैं, बल्कि तरंग और कण दोनों के गुण प्रदर्शित करते हैं।
वेव–पार्टिकल द्वैत (Wave–Particle Duality) ने यह स्पष्ट किया कि प्रकृति हमारी सामान्य कल्पना से कहीं अधिक जटिल है।
इसी प्रकार हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता सिद्धान्त (Uncertainty Principle) बताता है कि सूक्ष्म स्तर पर किसी कण की स्थिति और वेग को एक साथ पूर्ण निश्चितता से नहीं जाना जा सकता।
इन सिद्धान्तों का अर्थ यह नहीं कि संसार अवास्तविक है, बल्कि यह कि वास्तविकता हमारी सामान्य बुद्धि की अपेक्षा कहीं अधिक सूक्ष्म और बहुआयामी है।
सापेक्षता का सिद्धान्त : समय और स्थान भी निरपेक्ष नहीं
अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपने सापेक्षता सिद्धान्त के माध्यम से यह स्थापित किया कि समय और स्थान स्वतंत्र तथा अपरिवर्तनीय नहीं हैं।
गति और गुरुत्वाकर्षण के अनुसार समय की गति बदल सकती है।
अर्थात् दो व्यक्तियों के लिए समय समान गति से नहीं बीतता।
जिस समय को मनुष्य पूर्णतः निश्चित मानता था, वह भी सापेक्ष (Relative) सिद्ध हुआ।
यह खोज इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि हमारी सामान्य अनुभूति ब्रह्माण्ड की अंतिम संरचना का पूर्ण वर्णन नहीं करती।
न्यूरोसाइंस : क्या मस्तिष्क वास्तविकता का निर्माण करता है?
आधुनिक तंत्रिका-विज्ञान (Neuroscience) ने यह दिखाया है कि हम बाहरी संसार को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखते।
हमारी आँखें केवल प्रकाश ग्रहण करती हैं। कान केवल ध्वनि-तरंगों को ग्रहण करते हैं। त्वचा केवल स्पर्श-संकेत प्राप्त करती है।
इन सभी संकेतों को मस्तिष्क संसाधित (Process) करता है और फिर एक संगठित अनुभव का निर्माण करता है।
अर्थात् हम वस्तुओं को नहीं, बल्कि मस्तिष्क द्वारा निर्मित अनुभव को देखते हैं।
इसी कारण दृष्टि-भ्रम (Optical Illusions), स्मृति-भ्रम (False Memories) और संज्ञानात्मक पक्षपात (Cognitive Biases) सम्भव होते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि बाह्य संसार अस्तित्वहीन है, बल्कि यह कि हमारी अनुभूति सदैव व्याख्यायित (Interpreted Reality) होती है।
रंग, ध्वनि और अनुभूति
हम किसी फूल को लाल देखते हैं।
किन्तु वैज्ञानिक दृष्टि से "लाल" वस्तु का गुण नहीं है।
फूल केवल एक विशेष तरंगदैर्घ्य के प्रकाश को परावर्तित करता है। उस प्रकाश की व्याख्या मस्तिष्क "लाल रंग" के रूप में करता है।
इसी प्रकार ध्वनि भी वस्तु के भीतर नहीं होती; वह वायु में उत्पन्न कम्पनों की मस्तिष्कीय अनुभूति है।
इस प्रकार संसार का अनुभव वस्तु और चेतना—दोनों के संयुक्त सहयोग से निर्मित होता है।
क्या विज्ञान माया को सिद्ध करता है?
यहाँ अत्यन्त सावधानी आवश्यक है।
कई लोकप्रिय लेखों में यह दावा किया जाता है कि "क्वांटम भौतिकी ने वेदान्त को सिद्ध कर दिया" या "विज्ञान ने माया को प्रमाणित कर दिया।"
ऐसे निष्कर्ष दार्शनिक और वैज्ञानिक—दोनों दृष्टियों से अनुचित हैं।
विज्ञान और वेदान्त के प्रश्न, विधियाँ और प्रमाण-पद्धतियाँ भिन्न हैं।
विज्ञान का उद्देश्य प्रकृति के नियमों का परीक्षण करना है।
वेदान्त का उद्देश्य चेतना और अंतिम सत्य का बोध कराना है।
फिर भी दोनों इस बात पर सहमत दिखाई देते हैं कि मनुष्य का प्रत्यक्ष अनुभव वास्तविकता का सम्पूर्ण चित्र नहीं है।
यही संवाद दोनों के बीच एक महत्त्वपूर्ण सेतु बनाता है।
विज्ञान और माया : एक समन्वित दृष्टि
यदि भारतीय दर्शन कहता है कि मनुष्य माया के कारण वस्तुओं को उनके अंतिम स्वरूप में नहीं देख पाता, तो आधुनिक विज्ञान यह बताता है कि हमारी इन्द्रियाँ और मस्तिष्क भी वास्तविकता का सीमित और चयनित संस्करण प्रस्तुत करते हैं।
दोनों की भाषा अलग है, निष्कर्ष अलग हैं, परन्तु दोनों हमें एक ही दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करते हैं—
"क्या जो हम अनुभव करते हैं, वही सम्पूर्ण सत्य है?"
इसी प्रश्न ने दर्शन को जन्म दिया, विज्ञान को आगे बढ़ाया और आध्यात्मिक साधना को भी अर्थ प्रदान किया।
किन्तु यदि हमारी अनुभूति का निर्माण स्वयं मन और मस्तिष्क करते हैं, तो फिर अहंकार, स्मृति, इच्छा, आसक्ति और पहचान किस प्रकार माया का निर्माण करते हैं? क्या माया केवल बाहरी जगत में है, या हमारे मन के भीतर भी?
इन्हीं प्रश्नों का गहन विश्लेषण अगले भाग में "मनोविज्ञान, अहंकार और माया" के अन्तर्गत किया जाएगा।
मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)
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