चिंतन — अध्याय–25 : साक्षी क्या है? — भाग–3 : अद्वैत वेदान्त में साक्षी चैतन्य

 चिंतन — अध्याय–25 : साक्षी क्या है? — भाग–3 : अद्वैत वेदान्त में साक्षी चैतन्य

यदि उपनिषदों ने "साक्षी" की अवधारणा के बीज बोए और भगवद्गीता ने उसे जीवन तथा कर्म के साथ जोड़ा, तो अद्वैत वेदान्त ने उसे एक सुव्यवस्थित दार्शनिक सिद्धान्त के रूप में विकसित किया। विशेष रूप से आदि शंकराचार्य ने "साक्षी चैतन्य" को आत्मा के वास्तविक स्वरूप के रूप में प्रस्तुत किया।

अद्वैत वेदान्त के अनुसार मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यह नहीं है कि वह संसार को नहीं जानता, बल्कि यह है कि वह स्वयं को ठीक प्रकार से नहीं जानता। वह शरीर को "मैं" मान लेता है, मन को "मैं" मान लेता है, विचारों, स्मृतियों, भावनाओं और अहंकार को भी अपना वास्तविक स्वरूप समझ लेता है। यही भ्रम अध्यास (Superimposition) कहलाता है।

इस भ्रम के पीछे जो अपरिवर्तित सत्ता है, वही साक्षी चैतन्य है।

अद्वैत वेदान्त का मूल सिद्धान्त

अद्वैत वेदान्त का आधार एक महावाक्य में व्यक्त किया जा सकता है—

"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।"

अर्थात्—

  • ब्रह्म ही परम सत्य है।

  • जगत व्यवहारिक सत्य है, परन्तु परम सत्य नहीं।

  • जीव का वास्तविक स्वरूप ब्रह्म ही है।

इसी सिद्धान्त के आधार पर साक्षी को समझा जाता है।

साक्षी कोई पृथक् सत्ता नहीं है। वही आत्मा है। वही आत्मा ब्रह्म है।

साक्षी चैतन्य क्या है?

अद्वैत वेदान्त में "साक्षी चैतन्य" का अर्थ है—

वह शुद्ध चेतना जो सभी अनुभवों को प्रकाशित करती है, किन्तु स्वयं किसी अनुभव का विषय नहीं बनती।

यह न सोचती है। न निर्णय करती है। न इच्छाएँ उत्पन्न करती है। न कर्म करती है।

फिर भी इन सबके बिना कोई भी मानसिक प्रक्रिया संभव नहीं।

जैसे सूर्य केवल प्रकाश देता है, उसी प्रकाश में संसार के सभी कार्य होते हैं; वैसे ही साक्षी चैतन्य के कारण मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ कार्य करती हैं।

साक्षी और अन्तःकरण

अद्वैत वेदान्त अन्तःकरण को चार भागों में विभाजित करता है— मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार

ये चारों परिवर्तनशील हैं।

कभी मन प्रसन्न है। कभी दुःखी। 

कभी बुद्धि स्पष्ट है। कभी भ्रमित।

कभी स्मृति प्रबल है। कभी दुर्बल।

अहंकार भी जीवनभर बदलता रहता है।

यदि ये सभी बदलते रहते हैं, तो इनके परिवर्तन का ज्ञान किसे है?

अद्वैत का उत्तर है— साक्षी चैतन्य।

साक्षी और अहंकार का अन्तर

यहाँ एक अत्यन्त सूक्ष्म अन्तर समझना आवश्यक है।

अधिकांश लोग "मैं" शब्द का प्रयोग अहंकार के अर्थ में करते हैं।

"मैं डॉक्टर हूँ।", "मैं लेखक हूँ।", "मैं सफल हूँ।", "मैं असफल हूँ।"

ये सभी अहंकार के कथन हैं।

परन्तु साक्षी इनमें से कोई नहीं है।

साक्षी केवल जानता है कि— अहंकार अभी सफलता का अनुभव कर रहा है।

या - अहंकार अभी दुःख का अनुभव कर रहा है।

इसलिए अद्वैत वेदान्त में अहंकार भी साक्षी का विषय है, साक्षी स्वयं नहीं।

अध्यास (Superimposition) का सिद्धान्त

आदि शंकराचार्य के दर्शन का सबसे प्रसिद्ध सिद्धान्त है— अध्यास।

उन्होंने अपने ब्रह्मसूत्र-भाष्य की भूमिका में लिखा कि मनुष्य आत्मा और अनात्मा का परस्पर अध्यारोप करता है।

यही समस्त अज्ञान का मूल है।

उदाहरण—

  • शरीर के गुणों को आत्मा पर आरोपित करना।

  • मन की अवस्थाओं को अपना वास्तविक स्वरूप मान लेना।

  • विचारों को स्वयं समझ लेना।

इसी कारण व्यक्ति कहता है— "मैं बूढ़ा हो गया हूँ।", "मैं दुःखी हूँ।" , "मैं असफल हूँ।" , 

अद्वैत कहता है— बूढ़ा शरीर हुआ है। दुःखी मन है। सफल अहंकार है।

साक्षी इनमें से कोई नहीं।

रस्सी और साँप का उदाहरण

अद्वैत वेदान्त का प्रसिद्ध उदाहरण है— अँधेरे में रस्सी को साँप समझ लेना।

जब तक प्रकाश नहीं होता, भय बना रहता है।

जैसे ही प्रकाश होता है— साँप कभी था ही नहीं। केवल भ्रम था।

ठीक इसी प्रकार— शरीर, मन और अहंकार को आत्मा मान लेना अज्ञान है।

आत्मज्ञान का प्रकाश होने पर यह भ्रम समाप्त हो जाता है।

साक्षी पहले भी था। अब भी है।

ज्ञान केवल भ्रम को हटाता है।

क्या साक्षी कर्म करता है?

अद्वैत का उत्तर है— नहीं।

कर्म शरीर करता है। निर्णय बुद्धि लेती है। इच्छाएँ मन में उत्पन्न होती हैं। कर्तापन अहंकार ग्रहण करता है।

परन्तु साक्षी इन सबका प्रकाशक है।

इसीलिए उपनिषद आत्मा को— अकर्ता और  अभोक्ता कहते हैं।

यहाँ यह समझना आवश्यक है कि व्यवहार में मनुष्य कर्म करता है और उसके परिणामों का अनुभव भी करता है; अद्वैत का कथन परमार्थिक स्तर पर आत्मा के स्वरूप के विषय में है, न कि सामाजिक उत्तरदायित्व के निषेध के रूप में।

तीन अवस्थाओं का साक्षी

अद्वैत वेदान्त जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति—तीनों अवस्थाओं का विश्लेषण करता है।

जाग्रत - शरीर सक्रिय है। मन संसार से जुड़ा है। साक्षी उपस्थित है।

स्वप्न - बाहरी इन्द्रियाँ विश्राम में हैं।मन स्वयं संसार रचता है।

साक्षी तब भी उपस्थित है।

सुषुप्ति - न भी शांत है। कोई विचार नहीं। फिर भी जागने पर व्यक्ति कहता है— "मैं अच्छी नींद सोया।" यदि कोई जानने वाला न होता, तो यह स्मरण कैसे संभव होता?

अद्वैत इस अनुभव को भी साक्षी के पक्ष में एक दार्शनिक संकेत मानता है।

साक्षी और ब्रह्म

अद्वैत वेदान्त का सबसे साहसिक निष्कर्ष यह है— व्यक्तिगत साक्षी और ब्रह्म दो नहीं हैं।

जब तक व्यक्ति स्वयं को शरीर-मन से जोड़कर देखता है, तब तक वह स्वयं को सीमित जीव मानता है।

जैसे ही अध्यास समाप्त होता है—

वही साक्षी ब्रह्मस्वरूप के रूप में प्रकट होता है।

इसी सत्य को महावाक्यों में व्यक्त किया गया है—

अहं ब्रह्मास्मि। (बृहदारण्यक उपनिषद)

तत्त्वमसि। (छान्दोग्य उपनिषद)

अयमात्मा ब्रह्म। (माण्डूक्य उपनिषद)

ये वाक्य किसी नए सत्य की रचना नहीं करते, बल्कि पहले से विद्यमान वास्तविकता का उद्घाटन करते हैं।

शंकराचार्य की दृष्टि में साक्षी

आदि शंकराचार्य के विभिन्न भाष्यों और प्रकरण-ग्रन्थों में साक्षी का स्वरूप निम्न प्रकार से प्रकट होता है—

  • वह स्वप्रकाश है।

  • उसे किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं।

  • वह कभी परिवर्तित नहीं होता।

  • वह सभी मानसिक वृत्तियों का ज्ञाता है।

  • वह न जन्म लेता है, न नष्ट होता है।

  • वही आत्मा है।

  • वही ब्रह्म है।

शंकराचार्य के अनुसार आत्मज्ञान का अर्थ किसी नई वस्तु को प्राप्त करना नहीं, बल्कि साक्षी के वास्तविक स्वरूप का प्रत्यक्ष बोध होना है।

अद्वैत वेदान्त की विशिष्टता

भारतीय दर्शन की अनेक परम्पराएँ आत्मा को स्वीकार करती हैं, परन्तु अद्वैत वेदान्त की विशिष्टता यह है कि वह—

  • साक्षी को शुद्ध चैतन्य मानता है।

  • आत्मा और ब्रह्म की अभिन्नता स्थापित करता है।

  • अज्ञान को बन्धन का कारण बताता है।

  • ज्ञान को मुक्ति का साधन मानता है।

इसी कारण अद्वैत में साक्षी केवल दार्शनिक अवधारणा नहीं, बल्कि मोक्ष का प्रत्यक्ष आधार बन जाता है।

दार्शनिक टिप्पणी

अद्वैत वेदान्त की साक्षी-व्याख्या भारतीय दर्शन के इतिहास में अत्यन्त प्रभावशाली रही है, किन्तु यह एकमात्र व्याख्या नहीं है। विशिष्टाद्वैत, द्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत और अचिन्त्यभेदाभेद जैसे वेदान्त मत आत्मा, ईश्वर और साक्षित्व के सम्बन्ध को भिन्न प्रकार से समझते हैं। इसलिए अद्वैत का निष्कर्ष सम्पूर्ण वेदान्त का सर्वसम्मत मत नहीं, बल्कि उसकी एक विशिष्ट दार्शनिक व्याख्या है।

अद्वैत वेदान्त ने साक्षी को मनुष्य के वास्तविक स्वरूप के रूप में प्रतिष्ठित किया। उसके अनुसार जो बदलता है, वह "मैं" नहीं हो सकता; जो सब परिवर्तनों का मौन साक्षी है, वही आत्मा है और वही ब्रह्म है।

किन्तु क्या सभी वेदान्ताचार्य इस निष्कर्ष से सहमत हैं?

क्या रामानुज, मध्व, निम्बार्क, वल्लभ और चैतन्य महाप्रभु भी साक्षी को इसी प्रकार समझते हैं?

अगले भाग में हम विशिष्टाद्वैत, द्वैत तथा अन्य वेदान्त परम्पराओं में साक्षी की अवधारणा का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे और देखेंगे कि भारतीय वेदान्त परम्परा के भीतर इस विषय पर कितनी समृद्ध विविधता विद्यमान है।

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
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