चिंतन — अध्याय–25 : साक्षी क्या है? — भाग–5 : सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक और मीमांसा की दृष्टि से साक्षी
चिंतन — अध्याय–25 : साक्षी क्या है? — भाग–5 : सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक और मीमांसा की दृष्टि से साक्षी
अब तक हमने वेद,
उपनिषद तथा वेदान्त की
विभिन्न परम्पराओं में साक्षी की
अवधारणा का अध्ययन किया।
किन्तु भारतीय दर्शन का क्षेत्र इससे
कहीं अधिक व्यापक है।
सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक और पूर्वमीमांसा—इन पाँच दर्शनों
ने भी आत्मा, चेतना,
ज्ञान और अनुभव पर
अत्यन्त सूक्ष्म चिन्तन किया है।
इन दर्शनों में अधिकांश स्थानों
पर "साक्षी" शब्द उतनी प्रमुखता
से प्रयुक्त नहीं होता जितना
अद्वैत वेदान्त में, किन्तु द्रष्टा,
पुरुष, आत्मा, ज्ञाता और चेतन सत्ता जैसे विचार उसी
मूल प्रश्न के विभिन्न उत्तर
प्रस्तुत करते हैं—
जो
जानता है, वह कौन है?
इन दर्शनों की विशेषता यह
है कि ये अनुभव,
तर्क, साधना और ज्ञान के
भिन्न-भिन्न मार्गों से इस प्रश्न
का समाधान खोजते हैं।
सांख्य
दर्शन में साक्षी — पुरुष ही द्रष्टा है
सांख्य
दर्शन के प्रवर्तक महर्षि
कपिल माने जाते हैं।
यह भारतीय दर्शन की सबसे प्राचीन
दार्शनिक प्रणालियों में से एक
है।
सांख्य
के अनुसार सम्पूर्ण अस्तित्व दो मूल तत्त्वों
पर आधारित है— पुरुष, प्रकृति
पुरुष
का स्वरूप
पुरुष—
शुद्ध चेतन है। अकर्ता है।
अभोक्ता है। अपरिवर्तनशील
है।केवल द्रष्टा है।
प्रकृति—
जड़ है। परिवर्तनशील है। सम्पूर्ण मानसिक और भौतिक जगत
की कारण है।
इस प्रकार सांख्य का पुरुष, अद्वैत के साक्षी चैतन्य से अनेक दृष्टियों
से मिलता-जुलता प्रतीत होता है।
किन्तु
एक महत्त्वपूर्ण अन्तर है।
अद्वैत
एक ही ब्रह्म को
स्वीकार करता है, जबकि
सांख्य असंख्य पुरुषों को स्वीकार करता
है। प्रत्येक जीव का अपना
पृथक् पुरुष है।
पुरुष
और प्रकृति का सम्बन्ध
सांख्य
के अनुसार बन्धन का कारण यह
है कि पुरुष स्वयं
को प्रकृति के साथ तादात्म्य
कर लेता है।
वास्तव
में— मन प्रकृति है।
बुद्धि प्रकृति है। अहंकार भी प्रकृति है।
शरीर भी प्रकृति है।
किन्तु
पुरुष स्वयं को इन्हीं के
साथ जोड़ लेता है।
यही अज्ञान है।
जब विवेक उत्पन्न होता है, तब
पुरुष समझता है— "मैं मन नहीं
हूँ।", "मैं बुद्धि नहीं
हूँ।", "मैं केवल द्रष्टा
हूँ।"
यही
विवेक मोक्ष का कारण बनता
है।
योग
दर्शन में द्रष्टा
पतञ्जलि
योगसूत्र ने सांख्य के
दार्शनिक आधार को साधना
का व्यावहारिक स्वरूप दिया।
योगसूत्र
का अत्यन्त प्रसिद्ध सूत्र है— योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः। (योगसूत्र 1.2)
अर्थात्—
चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।
इसके
बाद पतञ्जलि कहते हैं—
तदा
द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्। (योगसूत्र 1.3)
भावार्थ-
तब द्रष्टा अपने वास्तविक स्वरूप
में स्थित होता है।
यहाँ
"द्रष्टा" वही चेतन सत्ता
है जो सामान्यतः चित्त
की वृत्तियों के साथ तादात्म्य
कर लेती है।
योग
में साक्षीभाव
योगदर्शन
में "साक्षी" शब्द की अपेक्षा
"द्रष्टा" अधिक प्रयुक्त होता
है।
योग
के अनुसार— चित्त बदलता है। वृत्तियाँ बदलती हैं। अनुभव बदलते हैं। किन्तु द्रष्टा नहीं बदलता।
जब साधक ध्यान में
बैठता है, तब उसका
उद्देश्य विचारों को बलपूर्वक रोकना
नहीं, बल्कि उनके साथ अपनी
पहचान को शिथिल करना
है।
धीरे-धीरे वह अनुभव
करता है कि— विचार
आ रहे हैं। भावनाएँ उठ
रही हैं। स्मृतियाँ प्रकट हो रही हैं।
किन्तु मैं उनसे भिन्न हूँ।
यही
साक्षीभाव की व्यावहारिक अभिव्यक्ति
है।
न्याय
दर्शन में आत्मा
न्याय
दर्शन मुख्यतः तर्क और प्रमाण
का दर्शन है।
महर्षि
गौतम के अनुसार ज्ञान
प्राप्त करने के साधन
हैं— प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द
न्याय
आत्मा को स्वीकार करता
है, किन्तु वह उसे अद्वैत
की तरह शुद्ध चैतन्य
नहीं मानता।
आत्मा—
ज्ञाता है। अनुभवकर्ता है। इच्छाएँ रखती है।
- सुख-दुःख का अनुभव करती है।
ज्ञान
आत्मा का गुण है,
आत्मा का स्वरूप नहीं।
यहाँ
न्याय का मत अद्वैत
से स्पष्ट रूप से भिन्न
हो जाता है।
वैशेषिक
दर्शन की दृष्टि
महर्षि
कणाद द्वारा प्रतिपादित वैशेषिक दर्शन पदार्थों के विश्लेषण पर
आधारित है।
यह आत्मा को एक स्वतंत्र
द्रव्य मानता है।
आत्मा—
नित्य है। अनेक हैं। ज्ञान का आधार है।
किन्तु
ज्ञान आत्मा का स्वाभाविक स्वरूप
नहीं, बल्कि उसका एक गुण
है।
इस प्रकार वैशेषिक भी आत्मा को
जानने वाली सत्ता मानता
है, किन्तु उसे अद्वैत के
साक्षी चैतन्य के समान नहीं
समझता।
पूर्वमीमांसा
की दृष्टि
पूर्वमीमांसा
का मुख्य विषय है— वेदों
की प्रामाणिकता, यज्ञ, धर्म, कर्म इस
कारण इसका मुख्य केन्द्र
साक्षी या आत्मा नहीं,
बल्कि कर्तव्य है।
फिर
भी मीमांसा आत्मा को स्वीकार करती
है।
आत्मा—
नित्य है। कर्मों का भोक्ता है।
स्मृति और अनुभव का आधार है।
मीमांसकों
के लिए आत्मा का
अस्तित्व आवश्यक है, क्योंकि कर्मफल
का सिद्धान्त उसी पर आधारित
है।
किन्तु
उन्होंने साक्षी चैतन्य की स्वतंत्र दार्शनिक
अवधारणा विकसित नहीं की।
क्या
इन दर्शनों का द्रष्टा वेदान्त के साक्षी के समान है?
उत्तर
सरल नहीं है।
कुछ
समानताएँ हैं—
- सभी आत्मा या पुरुष को शरीर से भिन्न मानते हैं।
- सभी किसी चेतन ज्ञाता को स्वीकार करते हैं।
- सभी अनुभव के पीछे किसी स्थायी सत्ता की आवश्यकता स्वीकार करते हैं।
किन्तु
महत्त्वपूर्ण भिन्नताएँ भी हैं—
- सांख्य अनेक पुरुष मानता है।
- योग साधना पर बल देता है।
- न्याय आत्मा को ज्ञाता मानता है, पर शुद्ध चेतना नहीं।
- वैशेषिक आत्मा को द्रव्य मानता है।
- मीमांसा कर्मप्रधान दृष्टि रखती है।
- अद्वैत आत्मा को ही शुद्ध साक्षी चैतन्य और ब्रह्म मानता है।
तुलनात्मक
सारणी
|
दर्शन |
चेतन
सत्ता |
क्या
वह साक्षी है? |
विशेषता |
|
सांख्य |
पुरुष |
हाँ,
द्रष्टा |
अनेक
पुरुष |
|
योग |
द्रष्टा |
हाँ |
साधना
द्वारा स्वरूप में स्थित होना |
|
न्याय |
आत्मा |
ज्ञाता |
ज्ञान
आत्मा का गुण |
|
वैशेषिक |
आत्मा |
ज्ञाता |
आत्मा
स्वतंत्र द्रव्य |
|
पूर्वमीमांसा |
आत्मा |
अनुभवकर्ता |
कर्म
और धर्म पर बल |
|
अद्वैत |
आत्मा
= ब्रह्म |
शुद्ध
साक्षी |
अद्वैत
चैतन्य |
दार्शनिक
समीक्षा
इन पाँच दर्शनों का
अध्ययन यह स्पष्ट करता
है कि भारतीय दर्शन
में "देखने वाले" की खोज अनेक
दिशाओं से हुई है।
सांख्य
ने विवेक के माध्यम से।
योग ने साधना के माध्यम से।
न्याय ने तर्क के माध्यम
से। वैशेषिक ने तत्त्वमीमांसा के
माध्यम से। पूर्वमीमांसा ने कर्म के
माध्यम से। अद्वैत ने आत्मज्ञान के
माध्यम से।
यद्यपि
उनकी भाषा और निष्कर्ष
भिन्न हैं, परन्तु सभी
इस बात से सहमत
हैं कि मनुष्य केवल
शरीर और मन तक
सीमित नहीं है।
समकालीन
प्रासंगिकता
इन दर्शनों का महत्त्व आज
भी बना हुआ है।
जब आधुनिक मनुष्य अपने विचारों, भावनाओं
और सामाजिक भूमिकाओं से अत्यधिक तादात्म्य
कर लेता है, तब
सांख्य का विवेक, योग
का द्रष्टाभाव, न्याय का तार्किक परीक्षण,
वैशेषिक का विश्लेषण और
मीमांसा का उत्तरदायित्व—सभी
मिलकर उसे अधिक संतुलित
दृष्टि प्रदान कर सकते हैं।
इस प्रकार "साक्षी" केवल एक आध्यात्मिक
अवधारणा नहीं, बल्कि आत्मचिन्तन, नैतिकता और जीवन-दृष्टि
का भी आधार बन
सकती है।
भारतीय
दर्शन की आस्तिक परम्पराओं
में साक्षी या द्रष्टा की
अवधारणा अनेक रूपों में
विकसित हुई। किन्तु एक
प्रश्न अभी भी शेष
है—
यदि
आत्मा ही नहीं है, जैसा कि बौद्ध दर्शन के कुछ मत कहते हैं, तब साक्षी कौन है?
और यदि आत्मा है,
जैसा कि जैन दर्शन
मानता है, तो उसका
साक्षित्व किस प्रकार समझा
जाए? इसी प्रकार कश्मीर
शैव दर्शन में प्रकाश और विमर्श की अवधारणाएँ साक्षी
को एक नई गहराई
प्रदान करती हैं।
अगले
भाग में हम बौद्ध,
जैन और कश्मीर शैव दर्शन में साक्षी की
अवधारणा का तुलनात्मक अध्ययन
करेंगे और देखेंगे कि
भारतीय दार्शनिक परम्परा इस प्रश्न के
कितने विविध और गहन उत्तर
प्रस्तुत करती है।
मुकेश
श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन
आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)
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