चिंतन — अध्याय–25 : साक्षी क्या है? — भाग–7 : साक्षी, आत्मा और चेतना

 चिंतनअध्याय–25 : साक्षी क्या है? — भाग–7 : साक्षी, आत्मा और चेतना

भारतीय दर्शन में "साक्षी", "आत्मा" और "चेतना" तीन ऐसे शब्द हैं जिनका प्रयोग अनेक बार एक-दूसरे के स्थान पर कर दिया जाता है। परिणामस्वरूप यह भ्रम उत्पन्न हो जाता है कि ये तीनों पूर्णतः समानार्थी हैं। वस्तुतः ऐसा नहीं है।

कुछ दर्शन इन तीनों को एक ही सत्य के भिन्न नाम मानते हैं, जबकि कुछ दर्शन इनके बीच स्पष्ट भेद स्थापित करते हैं। आधुनिक मनोविज्ञान और चेतना-अध्ययन (Consciousness Studies) भी "Consciousness", "Self", "Awareness" और "Observer" जैसे शब्दों के बीच अंतर करने का प्रयास करते हैं।

इसलिए इस भाग का उद्देश्य किसी मत का समर्थन करना नहीं, बल्कि यह समझना है कि

  • साक्षी क्या है?, आत्मा क्या है?, चेतना क्या है?,  क्या ये तीनों समान हैं या भिन्न?

यही प्रश्न भारतीय दर्शन के सबसे गहन विमर्शों में से एक है।

साक्षी क्या है?

पिछले भागों में हमने देखा कि साक्षी वह हैजो देखता है। जो जानता है। जो अनुभवों का निरीक्षण करता है। जो स्वयं अनुभव की वस्तु नहीं बनता।

साक्षी को किसी विशेष विचार, भावना या मानसिक प्रक्रिया के रूप में नहीं समझा जाता, बल्कि वह उन सभी का मौन ज्ञाता है।

यदि मन में क्रोध उत्पन्न होता है, तो साक्षी क्रोध नहीं है; वह क्रोध का जानने वाला है।

यदि शरीर बीमार होता है, तो साक्षी बीमारी नहीं है; वह उसके अनुभव का ज्ञाता है।

आत्मा क्या है? - भारतीय दर्शन में "आत्मा" शब्द का अर्थ प्रत्येक दर्शन में समान नहीं है।

वेदान्त - आत्मा शुद्ध, नित्य, अविनाशी और स्वप्रकाश चेतना है।

सांख्य - आत्मा के स्थान पर "पुरुष" शब्द का प्रयोग होता है।

न्यायवैशेषिक - आत्मा एक स्वतंत्र द्रव्य है, जिसमें ज्ञान गुण के रूप में प्रकट होता है।

जैन दर्शन - आत्मा (जीव) चेतन सत्ता है, जो कर्मावरण से आच्छादित है।

बौद्ध दर्शन - स्थायी आत्मा को स्वीकार नहीं किया जाता।

स्पष्ट है कि आत्मा की अवधारणा दार्शनिक परम्परा के अनुसार बदलती रहती है।

 

चेतना क्या है? - चेतना वह है जिसके कारण अनुभव सम्भव होते हैं।

किन्तु यहाँ भी मतभेद हैं।

अद्वैत वेदान्त - चेतना ही आत्मा है। आत्मा ही साक्षी है।

सांख्य - चेतना पुरुष का स्वरूप है।

आधुनिक विज्ञान - चेतना को प्रायः जागरूक अनुभव (Subjective Experience) के रूप में परिभाषित किया जाता है। अर्थात्देखना, सुनना, सोचना, महसूस करना, दर्द अनुभव करना, आनन्द अनुभव करनाये सभी चेतन अनुभव हैं।

किन्तु आधुनिक विज्ञान अभी यह निश्चित नहीं कर पाया है कि चेतना स्वयं क्या है।

 

क्या साक्षी और चेतना समान हैं?

यह प्रश्न सरल प्रतीत होता है, परन्तु अत्यन्त सूक्ष्म है।

अद्वैत वेदान्त - हाँ। - साक्षी ही शुद्ध चेतना है।

योग दर्शन - द्रष्टा चेतन है, परन्तु चित्त उससे भिन्न है।

बौद्ध दर्शन - स्थायी साक्षी की अपेक्षा सजग जागरूकता अधिक महत्त्वपूर्ण है।

आधुनिक मनोविज्ञान - Observer Self और Conscious Experience में भेद किया जाता है।

अतः यह कहना कि "साक्षी और चेतना सर्वत्र समान हैं" दार्शनिक रूप से उचित नहीं होगा।

 

क्या साक्षी और आत्मा समान हैं?

इस प्रश्न का उत्तर भी सभी दर्शनों में एक जैसा नहीं है।

अद्वैत - साक्षी = आत्मा = ब्रह्म

विशिष्टाद्वैत - जीव आत्मा है। परमात्मा सर्वसाक्षी हैं।

द्वैत - आत्मा और परमात्मा दोनों भिन्न हैं। सर्वोच्च साक्षी केवल ईश्वर हैं।

जैन - आत्मा ज्ञाता-द्रष्टा है।

बौद्ध - स्थायी आत्मा का निषेध।

अतः "साक्षी" और "आत्मा" का सम्बन्ध दर्शनानुसार बदलता है।

क्या चेतना आत्मा का गुण है या स्वरूप?

यह भारतीय दर्शन का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विवाद है।

अद्वैत - चेतना आत्मा का स्वरूप है। जैसे सूर्य का स्वरूप प्रकाश है।

न्यायवैशेषिक - चेतना आत्मा का गुण है। जैसे फूल का गुण सुगन्ध है।

सांख्य - पुरुष स्वयं चेतन है। प्रकृति अचेतन है।

इस विवाद का प्रभाव साक्षी की व्याख्या पर भी पड़ता है।

साक्षी और आत्मबोध

यदि साक्षी केवल दार्शनिक अवधारणा भर हो, तो उसका जीवन में विशेष महत्त्व नहीं रहेगा।

किन्तु भारतीय परम्परा साक्षी को आत्मबोध का प्रवेशद्वार मानती है।

आत्मबोध का अर्थ हैस्वयं को शरीर, मन, विचार और सामाजिक पहचान से परे समझना।

यह समझ बौद्धिक घोषणा नहीं, बल्कि अनुभवजन्य परिपक्वता है।

जब व्यक्ति यह देखना प्रारम्भ करता है कि

  • विचार आते-जाते हैं। भावनाएँ बदलती रहती हैं। शरीर निरन्तर परिवर्तित होता है। भूमिकाएँ जीवनभर बदलती रहती हैं। तब उसके भीतर यह प्रश्न जागता हैजो यह सब देख रहा है, वह स्वयं क्या है?

यही प्रश्न आत्मबोध की शुरुआत है।

 

क्या साक्षी व्यक्तिगत है या सार्वभौमिक?

यह प्रश्न भारतीय दर्शन की सबसे गहन बहसों में से एक है।

अद्वैत - एक ही सार्वभौमिक साक्षी है। व्यक्तित्व केवल उपाधि है।

सांख्य - प्रत्येक पुरुष स्वतंत्र है।

जैन - प्रत्येक जीव अलग है।

द्वैत - प्रत्येक आत्मा अलग है।

ईश्वर सर्वोच्च हैं। इस प्रकार "साक्षी" का व्यक्तिगत या सार्वभौमिक होना दर्शन के मूल सिद्धान्तों पर निर्भर करता है।

आधुनिक चेतना-अध्ययन की दृष्टि

आज चेतना-अध्ययन में कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न पूछे जा रहे हैं

  • क्या Self मस्तिष्क की रचना है?
  • क्या जागरूकता बिना "मैं" की भावना के सम्भव है?
  • क्या Meta-awareness ही Witness Consciousness है?
  • क्या निरीक्षक (Observer) और अनुभव (Experience) को अलग किया जा सकता है?

इन प्रश्नों पर अभी वैश्विक सहमति नहीं है।

किन्तु इतना स्पष्ट है कि भारतीय दर्शन ने इन प्रश्नों पर हजारों वर्ष पूर्व गंभीर चिन्तन किया था।

 

दार्शनिक समन्वय

यदि विभिन्न परम्पराओं का समन्वित अध्ययन किया जाए, तो निम्न निष्कर्ष सामने आते हैं

  • साक्षीअनुभवों का ज्ञाता या निरीक्षक।
  • आत्माचेतन सत्ता (अधिकांश भारतीय दर्शनों में, बौद्ध को छोड़कर)
  • चेतनाजानने और अनुभव करने की मूल क्षमता या सत्ता।

कई दर्शनों में ये तीनों एक हो जाते हैं। कई में इनके बीच भेद स्थापित किया जाता है।

इसलिए इनके अर्थ को समझने के लिए सदैव यह देखना आवश्यक है कि किस दार्शनिक परम्परा की चर्चा हो रही है।

 

समकालीन जीवन में महत्त्व

यदि मनुष्य अपने विचारों और भावनाओं से स्वयं को पूरी तरह एकाकार मान लेता है, तो प्रत्येक परिवर्तन उसे भीतर तक विचलित कर सकता है।

इसके विपरीत, यदि वह उनमें सजगता से अंतर देखना सीखता है, तो वह जीवन की परिस्थितियों को अधिक स्पष्टता और संतुलन से समझ सकता है।

यह संतुलन किसी विशेष दर्शन को स्वीकार करने पर निर्भर नहीं है; बल्कि अपने अनुभवों का ईमानदार अवलोकन करने की क्षमता पर निर्भर करता है।

साक्षी, आत्मा और चेतनाये तीनों शब्द भारतीय दर्शन की आत्मा हैं। कहीं वे एक ही सत्य के तीन नाम हैं, कहीं तीन अलग-अलग अवधारणाएँ। यही विविधता भारतीय दार्शनिक परम्परा की शक्ति है।

किन्तु अभी एक अत्यन्त व्यावहारिक प्रश्न शेष है

यदि साक्षी मन नहीं है, तो मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार का उसके साथ सम्बन्ध क्या है?

क्या मन साक्षी को देख सकता है?

या साक्षी मन को देखता है?

क्या बुद्धि साक्षी तक पहुँच सकती है?

क्या अहंकार स्वयं को जान सकता है?

इन्हीं प्रश्नों का विस्तृत अध्ययन अगले भाग में किया जाएगा।


मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)

 

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