चिंतन — अध्याय–26 : सत्य क्या है? — भाग–12 : मनोविज्ञान

 चिंतन — अध्याय–26 : सत्य क्या है? — भाग–12 : मनोविज्ञान, Neuroscience और Cognitive Science की दृष्टि से सत्य

अब तक हमने सत्य का अध्ययन दर्शन, वेदान्त, तर्कशास्त्र और विज्ञान की दृष्टि से किया। किन्तु अब प्रश्न और अधिक निकट आ जाता है—

क्या मनुष्य वास्तव में सत्य को देखता है?

या वह केवल वही देखता है जिसे उसका मस्तिष्क देखने के लिए तैयार होता है?

हम सामान्यतः मानते हैं कि हमारी आँखें संसार को वैसा ही देखती हैं जैसा वह है।

किन्तु आधुनिक मनोविज्ञान, तंत्रिका-विज्ञान (Neuroscience) और संज्ञान-विज्ञान (Cognitive Science) बताते हैं कि वास्तविकता और अनुभव के बीच एक अत्यन्त जटिल प्रक्रिया कार्य करती है।

मनुष्य पहले देखता नहीं है, बल्कि उसका मस्तिष्क पहले अर्थ निर्मित करता है और फिर अनुभव का बोध होता है।

इसलिए सत्य की खोज केवल बाहरी जगत् की यात्रा नहीं, बल्कि अपनी मानसिक संरचना को समझने की यात्रा भी है।

क्या मस्तिष्क वास्तविकता को सीधे देखता है?

इस प्रश्न का उत्तर आधुनिक विज्ञान देता है— नहीं 

हमारा मस्तिष्क बाहरी संसार की प्रत्यक्ष प्रति (Copy) नहीं बनाता।

इन्द्रियों से प्राप्त संकेत— प्रकाश, ध्वनि, स्पर्श, गन्ध, स्वाद— मस्तिष्क तक पहुँचते हैं।

मस्तिष्क उन्हें अपने पूर्व अनुभव, स्मृति, भाषा और अपेक्षाओं के आधार पर अर्थ देता है।

अर्थात्— हम वास्तविकता नहीं देखते; हम वास्तविकता की अपनी मानसिक व्याख्या देखते हैं।

यह निष्कर्ष दर्शन के उस पुराने प्रश्न को नया वैज्ञानिक आधार दे है कि—

प्रतीति (Appearance) और वास्तविकता (Reality) सदैव एक नहीं होते।

Perception : अनुभूति की रचना

Perception केवल देखना नहीं है। यह एक सक्रिय मानसिक प्रक्रिया है।

उदाहरण के लिए— यदि किसी चित्र में कुछ अधूरी रेखाएँ हों, तो मस्तिष्क स्वयं उन्हें पूरा कर देता है।

यदि किसी वाक्य में एक-दो अक्षर गायब हों, तो भी हम उसे पढ़ लेते हैं।

अर्थात्— मस्तिष्क केवल सूचना ग्रहण नहीं करता, बल्कि रिक्त स्थानों को भरता भी है।

इसी कारण दो व्यक्ति एक ही घटना को अलग-अलग ढंग से अनुभव कर सकते हैं।

Predictive Brain : मस्तिष्क पहले अनुमान लगाता है

आधुनिक Cognitive Science का एक प्रभावशाली सिद्धान्त है—

Predictive Processing

इसके अनुसार— मस्तिष्क पहले संसार के बारे में अनुमान (Prediction) बनाता है,

फिर इन्द्रियों से प्राप्त सूचना के आधार पर उसे संशोधित करता है।

अर्थात्— हम पहले अपेक्षा करते हैं, फिर अनुभव करते हैं।

इसी कारण पूर्व अनुभव, संस्कृति, शिक्षा और विश्वास हमारी अनुभूति को प्रभावित करते हैं।

सत्य की खोज में यह तथ्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसका अर्थ है—

हम जो देखते हैं, उसमें हमारी अपेक्षाएँ भी सम्मिलित होती हैं।

Cognitive Bias : मानसिक पूर्वाग्रह

मनोविज्ञान ने अनेक ऐसे मानसिक पूर्वाग्रहों (Biases) की पहचान की है जो सत्य की हमारी समझ को विकृत कर सकते हैं।

Confirmation Bias

मनुष्य प्रायः उन्हीं तथ्यों को स्वीकार करता है जो उसके पहले से बने विश्वासों का समर्थन करते हैं।

विरोधी प्रमाणों की उपेक्षा कर देता है।

Availability Bias - जो घटना हाल ही में सुनी या देखी गई हो, उसे अधिक सामान्य या अधिक सत्य मान लिया जाता है।

Authority Bias - यदि कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति कुछ कह दे,

तो बिना परीक्षण उसे सत्य मान लेने की प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है।

Group Bias - समूह की मान्यता को ही सत्य समझ लेना।

इसी कारण सामाजिक भ्रम और अफवाहें तेजी से फैलती हैं। इन सभी पूर्वाग्रहों का निष्कर्ष एक ही है—

मनुष्य केवल सत्य से प्रभावित नहीं होता; वह अपनी मानसिक संरचना से भी प्रभावित होता है।

False Memory : क्या स्मृति भी भ्रमित कर सकती है?

हम सामान्यतः मानते हैं कि स्मृति अतीत का सटीक अभिलेख है।

किन्तु आधुनिक अनुसंधान बताते हैं— स्मृति कैमरे की रिकॉर्डिंग नहीं होती।

हर बार जब हम किसी घटना को याद करते हैं,  तो मस्तिष्क उसे पुनः निर्मित (Reconstruct) करता है।

इसी कारण समय के साथ स्मृतियाँ बदल सकती हैं।

कभी-कभी व्यक्ति पूरी ईमानदारी से ऐसी घटना का वर्णन करता है,

जो वास्तव में वैसी हुई ही नहीं थी।

यह जानबूझकर बोला गया असत्य नहीं,

बल्कि False Memory हो सकती है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि व्यक्तिगत अनुभव भी त्रुटिरहित नहीं होता।

भावनाएँ और सत्य

क्या क्रोध में लिया गया निर्णय उतना ही सत्य होता है जितना शान्त मन में लिया गया?

मनोविज्ञान का उत्तर है— नहीं।

भय, क्रोध, लोभ, आसक्ति, घृणा, अत्यधिक उत्साह— ये सभी हमारी निर्णय-क्षमता को प्रभावित करते हैं।

इसीलिए भारतीय दर्शन ने चित्तशुद्धि और समत्व पर इतना बल दिया।

योग का "चित्तवृत्ति निरोध", 

बौद्ध धर्म की "सम्यक स्मृति",

गीता का "समत्व योग"—

इन सबका एक मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है।

स्थिर मन सत्य को अधिक स्पष्ट देख सकता है।

क्या चेतना केवल मस्तिष्क की उपज है?

यह प्रश्न आज Neuroscience और Consciousness Studies का सबसे कठिन प्रश्नों में से एक है।

कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि चेतना मस्तिष्क की जटिल जैविक प्रक्रियाओं से उत्पन्न होती है।

कुछ दार्शनिक इसे पर्याप्त नहीं मानते।

वे पूछते हैं— यदि मस्तिष्क केवल पदार्थ है,

तो अनुभव (Experience) कैसे उत्पन्न होता है?

इसे आधुनिक दर्शन में Hard Problem of Consciousness कहा जाता है।

आज तक इसका सर्वमान्य समाधान उपलब्ध नहीं है।

इसलिए यह कहना कि विज्ञान ने चेतना का अंतिम सत्य खोज लिया है,

वर्तमान ज्ञान की स्थिति के अनुसार उचित नहीं होगा।

ध्यान और मस्तिष्क

पिछले कुछ दशकों में ध्यान (Meditation) पर व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन हुए हैं।

इन अध्ययनों से संकेत मिलता है कि नियमित ध्यान—

  • ध्यान-क्षमता को बढ़ा सकता है।

  • तनाव को कम कर सकता है।

  • भावनात्मक संतुलन में सहायता कर सकता है।

  • मस्तिष्क की कुछ कार्यात्मक प्रक्रियाओं में परिवर्तन से जुड़ा पाया गया है।

किन्तु यह सावधानी आवश्यक है कि इन निष्कर्षों के आधार पर आध्यात्मिक अनुभूतियों की सम्पूर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती।

विज्ञान उनके जैविक सहसंबंधों (Correlates) का अध्ययन करता है,Cउनके आध्यात्मिक अर्थ का नहीं।

भारतीय दर्शन और आधुनिक मनोविज्ञान : एक संवाद

यदि हम दोनों को साथ रखें, तो रोचक समानताएँ दिखाई देती हैं।

भारतीय दर्शन कहता है— मन विक्षिप्त होगा, तो सत्य विकृत दिखाई देगा।

मनोविज्ञान कहता है— Biases और भावनाएँ निर्णय को प्रभावित करती हैं।

योग कहता है— चित्त शुद्ध करो।

Neuroscience कहता है— ध्यान मानसिक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है।

दोनों की भाषा अलग है, किन्तु दोनों मनुष्य की अनुभूति की सीमाओं को स्वीकार करते हैं।

फिर भी यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ये पूर्णतः समान सिद्धान्त नहीं हैं। भारतीय दर्शन का उद्देश्य आत्मबोध और मुक्ति भी है, जबकि आधुनिक मनोविज्ञान और तंत्रिका-विज्ञान मुख्यतः अनुभव, व्यवहार और मस्तिष्कीय प्रक्रियाओं का अध्ययन करते हैं।

समन्वित दृष्टि

आधुनिक विज्ञान हमें यह सिखाता है कि सत्य की खोज केवल बाहरी प्रमाणों से नहीं होती।

हमें अपने भीतर भी देखना पड़ता है— 

क्या मेरे निर्णय पर कोई पूर्वाग्रह प्रभाव डाल रहा है?

क्या मेरी स्मृति विश्वसनीय है?

क्या मेरी भावनाएँ मेरे विवेक को प्रभावित कर रही हैं?

क्या मैं वही देख रहा हूँ जो है, या वही जो मैं देखना चाहता हूँ?

यहीं आधुनिक मनोविज्ञान और प्राचीन भारतीय आत्मनिरीक्षण एक-दूसरे के निकट आ जाते हैं।

दोनों कहते हैं—सत्य तक पहुँचने से पहले स्वयं को समझना आवश्यक है।

इस भाग का निष्कर्ष

मनोविज्ञान, Neuroscience और Cognitive Science यह स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य वास्तविकता का निष्क्रिय दर्शक नहीं, बल्कि अनुभव का सक्रिय निर्माता भी है। अनुभूति, स्मृति, भावनाएँ और मानसिक पूर्वाग्रह सत्य की हमारी समझ को प्रभावित करते हैं। इसलिए सत्य की खोज केवल बाहरी प्रमाणों की नहीं, बल्कि आन्तरिक सजगता की भी माँग करती है। आधुनिक विज्ञान और भारतीय दर्शन दोनों इस बात पर सहमत दिखाई देते हैं कि स्पष्ट, संतुलित और सजग मन सत्य के अधिक निकट पहुँच सकता है, यद्यपि दोनों इस निष्कर्ष तक भिन्न पद्धतियों से पहुँचते हैं।

अगले भाग की भूमिका

अब तक हमने सत्य को दर्शन, विज्ञान, भाषा और मनोविज्ञान की दृष्टि से समझा। किन्तु अब प्रश्न अत्यन्त व्यक्तिगत हो जाता है—

क्या आध्यात्मिक अनुभव सत्य का प्रमाण हो सकता है?

क्या आत्मानुभूति, ध्यान, समाधि और रहस्यानुभूति वस्तुनिष्ठ सत्य हैं, या केवल व्यक्तिगत अनुभव? क्या विभिन्न आध्यात्मिक परम्पराओं के अनुभव किसी एक सार्वभौमिक सत्य की ओर संकेत करते हैं?

अगले भाग में हम "सत्य और आध्यात्मिक अनुभव" का तुलनात्मक एवं समन्वित अध्ययन करेंगे।

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)

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