चिंतन — अध्याय–26 : सत्य क्या है? — भाग–5 : न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, सांख्य और योग की दृष्टि से सत्य

 चिंतन — अध्याय–26 : सत्य क्या है? — भाग–5 : न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, सांख्य और योग की दृष्टि से सत्य

अब तक हमने देखा कि वेद और उपनिषद सत्य को अस्तित्व (Being) तथा वेदान्त उसे परम वास्तविकता (Ultimate Reality) के रूप में देखता है। परन्तु भारतीय दर्शन की सभी परम्पराएँ सत्य की खोज एक ही मार्ग से नहीं करतीं।

एक अत्यन्त व्यावहारिक प्रश्न सामने आता है—

यदि सत्य है, तो मनुष्य उसे जाने कैसे?

क्या केवल श्रद्धा पर्याप्त है?

क्या केवल तर्क पर्याप्त है?

क्या अनुभव ही अंतिम प्रमाण है?

या सत्य तक पहुँचने के लिए ज्ञान, तर्क, अनुभव और साधना—सभी की आवश्यकता है?

इन्हीं प्रश्नों का उत्तर भारतीय दर्शन के पाँच महत्त्वपूर्ण दर्शन—न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, सांख्य और योग—अपने-अपने ढंग से देते हैं। इन दर्शनों का विशेष योगदान यह है कि इन्होंने सत्य की खोज की विधि (Methodology) विकसित की। यदि वेदान्त सत्य का लक्ष्य बताता है, तो ये दर्शन सत्य तक पहुँचने का मार्ग स्पष्ट करते हैं।

न्याय दर्शन : सत्य का आधार प्रमाण और तर्क

महर्षि गौतम द्वारा प्रतिपादित न्याय दर्शन का मूल उद्देश्य है—

यथार्थ ज्ञान के द्वारा सत्य की प्राप्ति।

न्याय के अनुसार मनुष्य का दुःख अज्ञान से उत्पन्न होता है, और अज्ञान का निवारण प्रमाणयुक्त ज्ञान से होता है।

न्याय दर्शन चार प्रमुख प्रमाण स्वीकार करता है—

  • प्रत्यक्ष (इन्द्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान)

  • अनुमान (तर्क द्वारा प्राप्त ज्ञान)

  • उपमान (सादृश्य द्वारा ज्ञान)

  • शब्द (विश्वसनीय प्रमाण या आप्तवचन)

यदि कोई ज्ञान इन प्रमाणों से सिद्ध हो, तो वह प्रमा (यथार्थ ज्ञान) कहलाता है।

यदि ज्ञान भ्रम, संदेह या कल्पना पर आधारित हो, तो वह सत्य नहीं माना जाता।

न्याय का महत्त्व इस बात में है कि उसने पहली बार व्यवस्थित रूप से पूछा—

"हम कैसे जानें कि जो हम जानते हैं, वह वास्तव में सत्य है?"

यह प्रश्न आज भी आधुनिक ज्ञानमीमांसा (Epistemology) का आधार है।

वैशेषिक दर्शन : वस्तुओं की वास्तविकता

महर्षि कणाद का वैशेषिक दर्शन सत्य को वस्तुओं की वास्तविक सत्ता में खोजता है।

इसके अनुसार संसार कल्पना नहीं है।

वस्तुएँ वास्तव में अस्तित्व रखती हैं।

वैशेषिक दर्शन ने सम्पूर्ण जगत् को सात प्रमुख पदार्थों में विभाजित किया—

  • द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, अभाव (बाद में)

यह वर्गीकरण केवल दार्शनिक जिज्ञासा नहीं था। इसका उद्देश्य था—

वस्तुओं को उनके वास्तविक स्वरूप में समझना।

वैशेषिक का सत्य अत्यन्त यथार्थवादी (Realist) है।

यह मानता है कि बाहरी जगत् हमारी चेतना से स्वतंत्र रूप से विद्यमान है।

मीमांसा दर्शन : सत्य और वेद की प्रामाणिकता

महर्षि जैमिनि का मीमांसा दर्शन सत्य के एक भिन्न आयाम को प्रस्तुत करता है।

उसका मुख्य प्रश्न है— धर्म क्या है?

किन्तु धर्म का निर्णय कैसे होगा?

मीमांसा का उत्तर है— वेद प्रमाण है।

मीमांसकों के अनुसार वेद अपौरुषेय हैं—अर्थात् किसी मनुष्य द्वारा रचित नहीं।

इसी कारण वे सत्य के सर्वोच्च प्रमाण माने गए।

मीमांसा का विशेष योगदान यह है कि उसने भाषा, वाक्य, अर्थ और प्रमाण पर अत्यन्त सूक्ष्म विश्लेषण किया।

उसके लिए सत्य केवल वस्तु का ज्ञान नहीं, बल्कि वाक्य का यथार्थ अर्थ भी है।

इस प्रकार भारतीय भाषाशास्त्र और व्याख्या-विज्ञान (Hermeneutics) के विकास में मीमांसा का असाधारण योगदान है।

सांख्य दर्शन : विवेक ही सत्य का द्वार

महर्षि कपिल का सांख्य दर्शन सत्य को दो मूल तत्त्वों के माध्यम से समझाता है— पुरुष, प्रकृति

संसार का समस्त परिवर्तन प्रकृति में होता है। पुरुष शुद्ध द्रष्टा है।

मनुष्य का दुःख इसलिए है क्योंकि वह प्रकृति और पुरुष का भेद नहीं जानता।

इसी अज्ञान को सांख्य अविवेक कहता है।

जब विवेक उत्पन्न होता है, तब मनुष्य सत्य को पहचानता है।

अतः सांख्य में सत्य का अर्थ है— वास्तविक और अवास्तविक का स्पष्ट भेद।

यहाँ सत्य किसी मत का नाम नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण दृष्टि है।

योग दर्शन : सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव

महर्षि पतञ्जलि का योग दर्शन सांख्य के दार्शनिक आधार को साधना की पद्धति प्रदान करता है।

योगसूत्र का प्रसिद्ध सूत्र है— योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।

अर्थात्— चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।

योग के अनुसार मनुष्य सत्य को इसलिए नहीं देख पाता क्योंकि उसका चित्त निरन्तर विक्षिप्त रहता है।

इच्छाएँ, भय, स्मृतियाँ, कल्पनाएँ, पूर्वाग्रह— ये सभी सत्य को ढँक देते हैं।

जब चित्त निर्मल होता है, तब द्रष्टा अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित होता है। तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्। (योगसूत्र 1.3) यही योग का सत्य है।

यह तर्क से अधिक अनुभव पर आधारित है।

सत्य और प्रमाण : भारतीय दर्शन की अनूठी देन

भारतीय दर्शन की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि उसने केवल सत्य की चर्चा नहीं की, बल्कि यह भी बताया कि सत्य का प्रमाण क्या होगा।

विभिन्न दर्शनों ने विभिन्न प्रमाण स्वीकार किए—

दर्शनप्रमुख प्रमाण
न्यायप्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द
वैशेषिकमुख्यतः प्रत्यक्ष और अनुमान
सांख्यप्रत्यक्ष, अनुमान, आप्तवचन
योगप्रत्यक्ष अनुभव एवं आप्तवचन
मीमांसावेद एवं शब्द-प्रमाण

यद्यपि इनमें मतभेद हैं, फिर भी एक बात समान है— सत्य बिना प्रमाण के स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।

यह दृष्टि भारतीय दर्शन को अत्यन्त बौद्धिक और विवेचनात्मक बनाती है।

क्या तर्क ही सत्य तक पहुँचा सकता है?

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है।

यदि तर्क इतना शक्तिशाली है, तो क्या वह अकेले ही सत्य तक पहुँचा सकता है?

न्याय कहता है— तर्क आवश्यक है।

योग कहता है— तर्क पर्याप्त नहीं।

सांख्य कहता है— विवेक आवश्यक है।

मीमांसा कहती है— शब्द-प्रमाण भी आवश्यक है।

वेदान्त कहता है— अंततः अनुभूति भी आवश्यक है।

इस प्रकार भारतीय दर्शन किसी एक साधन को अंतिम नहीं मानता।

वह मनुष्य की समग्र क्षमता—इन्द्रिय, बुद्धि, तर्क, भाषा, अनुभव और चेतना—सभी का समन्वय करता है।

आधुनिक ज्ञानमीमांसा से संवाद

आधुनिक दर्शन में भी यही प्रश्न उठता है— ज्ञान का स्रोत क्या है?

Empiricism (अनुभववाद) कहता है— ज्ञान इन्द्रियों से आता है।

Rationalism (बुद्धिवाद) कहता है— ज्ञान बुद्धि से आता है।

Phenomenology अनुभव की संरचना का अध्ययन करती है।

Analytic Philosophy भाषा और तर्क का विश्लेषण करती है।

आश्चर्य की बात यह है कि भारतीय दर्शन इन सभी प्रश्नों पर दो हजार वर्ष से भी अधिक पहले गम्भीर चिन्तन कर चुका था।

यह समानता किसी की श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए नहीं, बल्कि यह दिखाने के लिए महत्त्वपूर्ण है कि सत्य की खोज मानव सभ्यता की साझा बौद्धिक यात्रा रही है।

इस भाग का निष्कर्ष

न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, सांख्य और योग—इन पाँचों दर्शनों ने सत्य को अलग-अलग कोणों से देखा, किन्तु उनका उद्देश्य एक ही था—यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति। न्याय ने प्रमाण और तर्क का आधार दिया, वैशेषिक ने वस्तुगत वास्तविकता का विश्लेषण किया, मीमांसा ने शब्द और वेद की प्रामाणिकता पर बल दिया, सांख्य ने विवेक को सत्य का द्वार बताया और योग ने प्रत्यक्ष अनुभूति को सत्य का चरम साधन माना। इन सबको मिलाकर देखा जाए तो भारतीय दर्शन यह सिखाता है कि सत्य केवल विचार नहीं, बल्कि सही ज्ञान प्राप्त करने की एक अनुशासित प्रक्रिया भी है।

अगले भाग की भूमिका

भारतीय दर्शन की आस्तिक परम्पराओं के बाद अब प्रश्न उन दर्शनों की ओर जाता है जिन्होंने सत्य को एक भिन्न दृष्टि से समझा। बौद्ध दर्शन ने अनित्यता और द्विसत्य सिद्धान्त की चर्चा की, जैन दर्शन ने अनेकान्तवाद और स्याद्वाद के माध्यम से सत्य की बहुआयामी प्रकृति को स्पष्ट किया, जबकि कश्मीर शैव दर्शन ने सम्पूर्ण अस्तित्व को चेतना की अभिव्यक्ति माना। इन तीनों परम्पराओं ने सत्य के विमर्श को नई गहराई प्रदान की।

अगले भाग में हम "बौद्ध, जैन तथा कश्मीर शैव दर्शन में सत्य" का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे।


मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
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